बात उन दिनों की है जब भारत में कोरोना का पदार्पण हो चुका था। लोगों को यही लगा कि ऐसे ही कोई सामान्य सी बीमारी होगी, जैसे आयी है, वैसे ही चली जाएगी, और लोग अपने रोजमर्रा की जीवनचर्या में व्यस्त रहे। ऐसा किसी ने सोचा भी न था कि विश्व में ऐसा भयंकर भूचाल आएगा, जो कि अप्रत्याशित एवं अकल्पनीय होगा । संसार में ऐसी तबाही मची जिसने न सिर्फ विश्व की अर्थव्यवस्था की नींव को हिला दिया, मेडिकल सेवाओं की व्यवस्था को झकझोर दिया बल्कि सामाजिक परिवर्तन की ओर हमें ढकेल कर अग्रसर किया। कोरोना ने हम सभी को हर स्तर पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया। 4 वर्ष तक ऐसा लगा मानो पूरी दुनिया ही बदल गई थी, और लगने लगा कि फिर से हम पहले की तरह पुनः कभी नहीं रह पाएंगे। लोगों से मिलना-मिलाना, घूमना-फिरना, ऑफिस- कचहरी, रोजमर्रा के काम सब बदल गए थे, लेकिन 4 साल तक ऐसी ही स्थिति रहने के बाद भी अब धीरे-धीरे पुनः जीवन सामान्य होने लगा है। वैसे अब पहले की तरह भय की स्थिति नहीं है, परन्तु यह भी सत्य है कि हम सभी को निरंतर सचेत रहने की आवश्यकता है। हर घटना के पीछे कोई ना कोई कारण होता है। कोरोना का इस तरह से आना, पूरी दुनिया में उत्पात मचाना, तमाम तरह की व्यवस्थाओं को प्रभावित करना क्या अकारण ही था या फिर इन सारी बातों का कोई कारण है? क्या कोरोना हम सभी को कोई सीख देने आई थी ?
कोई शिक्षा जिसका उपयोग करके हम सभी इस विश्व और समाज को अधिक बेहतर बना सकते हैं?
साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, जिसे परावर्तन, परछाईं, और विवर्तन के रूप में भी देखा जा सकता है। आज के विज्ञान के युग में समाज केवल मानव तक ही नहीं सीमित रह गया है, बल्कि इसपर संसार के सभी तत्वों का प्रभाव पड़ता है। समाज का भी प्रभाव जाहिर रूप से इन सभी तत्वों पर पड़ता है। इनमें खनिज तत्व से लेकर वायरस, बैक्टीरिया, पेड़ पौधे, तथा पशु पक्षी भी आते हैं। वायरस का इस श्रृंखला में एक महान योगदान रहा है, क्योंकि ये जीव और निर्जीव के बीच की सीढ़ी माने जाते हैं।
ऐसे समृद्ध समाज को साहित्य भाव से निरूपित करना हमारा सौभाग्य है।
साहित्य भूत और भविष्य को समेट एक नए भाव को व्यक्त करता है, जो कि मनोरंजक हो जाता है, बल्कि ज्ञान की सीमा को परछाई बनाकर भविष्य का आभास कराता है। प्रस्तुत पुस्तक "चोरनी कोरोना हाज़िर हो" में हमने इन्हीं सारी बातों पर विचार करने का प्रयास किया है। चोरनी इसलिए नहीं कि उसने करोड़ों जान असमय चुरा लिया, बल्कि समाज के बहुत सारे रीति-रिवाज, साज-सम्बन्ध, व्यवसाय-व्यापार, और स्थिति-परिस्थिति को उथल पुथल करके छोड़ा है।
कोरोना के माध्यम से हम तमाम विषयों पर पुनर्विचारणीय 'भावों को उद्धृत करने का प्रयत्न किया है। आशा है इन कहानियों के माध्यम से हम सर्वप्रथम अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तन लाकर इस समाज, तत्पश्चात देश और विश्व के विकास और कल्याण में सहभागी बन सकते हैं। प्रस्तुत कहानियां कल्पनात्मक प्रतीत हो सकती हैं, परंतु ये सामयिक सच्ची घटनाओं के उद्गार हैं। हमें पूरा विश्वास है कि पाठकों को यह कहानी कहीं-ना-कहीं अपने जीवन से जुड़ी हुई प्रतीत होंगी। सामान्य शैली में लिखी गई यह कहानियां आप सभी को रोचक लगेंगी ऐसी हमें आशा है।
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