परमतत्व या बहा एक परिचय: वेदान्त के विभिन्न सम्प्रदाय ब्रह्म को परमतत्व मान कर भिन्नता में एकत्व का सिद्धान्त स्थापित करते हैं। यह चराचर विश्व जो विभिन्नताओं से परिपूर्ण है, एकमात्र परमतत्व ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। इस पुस्तक का विषय "परम तत्व या ब्रह्म की अवधारणाएँ" है। इसी को केन्द्रीय भूमि में रखकर परमतत्व ब्रह्म सम्बन्धी विचार की व्याख्या एवं मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है अतः सर्वप्रथम मैं यह स्पष्ट करूँगी कि ब्रह्म क्या है? भारतीय दर्शन एक आध्यात्मवादी दर्शन है। तत्वशास्त्रीय दृष्टिकोण से परम तत्व के रूप में यहाँ एक ऐसे मूल तत्व को स्वीकार किया गया है, जो पूर्णतया आध्यात्मिक है। इसे ब्रह्म कहा गया है। ब्रह्म शब्द की उत्पति संस्कृत के बृह धातु से हुई है जिसका अर्थ है बढ़ना, फैलना या विकसित होना। सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म से ही विकसित होता है। इस प्रकार ब्रह्म शब्द का यह अर्थ लगाया गया कि वह (ब्रह्म) सूक्ति अथवा स्रोत के रूप में स्वयं प्रस्फुटित हो जाने वाली शक्ति है। आधुनिककाल के कुछ विद्वानों के मतानुसार इस शब्द का दार्शनिक अर्थ यह है कि यह सम्पूर्ण विश्व एक शक्ति अथवा आदि तत्व ब्रह्म के स्वाभाविक स्फुरण से अनायास ही अभिव्यक्त हो जाता है। ब्रह्म को छोड़कर अन्य किसी पदार्थ को पारमार्थिक दृष्टि से वास्तविक नहीं माना जा सकता है। परमतत्व का स्वरूप क्या है? उसमें द्वैत है या वह अद्वैत रूप है? जगत और जीवन से उसका क्या सम्बन्ध है? इन गूढ़ प्रश्नों का उत्तर विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न ढंग से दिया। इन्होंने परमतत्व को विभिन्न नामों से विभूषित किया जैसे पुरुष, ईश्वर, ब्रह्म इत्यादि। सम्पूर्ण भारतीय दर्शन के अध्ययन के आधार पर परमतत्य या ब्रह्म सम्बन्धी विचार को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है: 1. वेद आरण्यक ब्राह्मण उपनिषद गीता एवं पुराण में ब्रा की अवधारणा। 2. प्राचीन भारतीय दार्शनिकों के परमतत्व सम्बन्धी विचार। 3. परम्परागत भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों में परमतत्व की अवधारणा। परमतत्व संबंधी समस्या के समाधान की खोज हमें उस अतीत में पहुँचा देता है. जब सर्वप्रथम प्रकृति की रहस्यात्मक लीला को देख कर तपस्वी मनीषियों का उद्गार वैदिक मंत्रों के रूप में फूट पड़ा था। वेद भारतीय दर्शन में प्राचीनतम् धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ है यह भारतीय दर्शन का मूलस्रोत है। जिसके गर्भ से ही भारतीय दर्शन रूपी बीज का प्रस्फुटन हुआ, और आगे चलकर यह वृक्ष पल्लवित और पुष्पित हुआ। ऐसा लगता है कि ब्रह्म की अवधारणा गर्भस्थ रूप में वेद में ही विद्यमान थी। कालान्तर में यह विचार विकसित रूप में उपनिषदों में और फिर वेदान्त में अपने पूर्ण अभिव्यक्ति को प्राप्त हुआ। इतना ही नहीं वैदिक ऋचाओं में भी परमतत्व या ईश्वर सम्बन्धी विचार में क्रमिक परिवर्तन पाया जाता है। सर्वप्रथम परमतत्व की अवधारणा के रूप में हम इसमें प्रकृतिवादी मानवतावादी अनेकेश्वरवाद का विचार पाते हैं। यहाँ परमतत्व के रूप में अनेक देवी-देवताओं पर विश्वास किया गया। इसलिए इसे अनेकेश्वरवाद की संज्ञा दी गयी। वैदिक अनेकेश्वरवाद को प्राकृतिक अनेकेश्वरवाद कहा जाता है, क्योंकि यहाँ आश्चर्यजनक, आकर्षक, शक्तिशाली एवं मानव पहुंच के परे प्राकृतिक वस्तुओं एवं घटनाओं को देवताओं के रूप में स्वीकार किया गया है। यहाँ देवताओं को अनेक मानवीय गुणों से युक्त माना गया है, इसलिए इसे मानवतावादी अनेकेश्वरवाद कहा गया है। किन्तु विभिन्न देवताओं के परस्पर असम्बद्ध एवं स्वतंत्र होने से धार्मिक व्यक्ति को संतुष्टि नहीं हुई, इसलिए विभिन्न देवों के समष्टि रूप की कल्पना की गई। उदाहरणार्थ इन्द्र को मारुतों का पिता, अदित को आदित्यों की माता एवं इन्द्र को देवताओं का राजा के रूप में कल्पना किया गया। जे. एन. सिन्हा ने इस धार्मिक विश्वास को संगठित अनेकेश्वरवाद का नाम दिया। मैक्समूलर ने वैदिककाल में एक और अवस्था का उल्लेख किया और इसे हिनोथीज्य या अवसरवादी एकवाद का नाम दिया। इस धारणा के अनुसार किसी विशेष देव की अराधना करते समय वैदिक ऋषि उसे ही सर्वश्रेष्ठ देव मान लेते थे।
अब तक परमतत्व या ब्रह्म सम्बन्धी विचार पर अनेक ग्रन्थ लिखे गये हैं परन्तु अभी तक ऐसी समालोचनात्मक पुस्तक का अभाव रहा है जो शंकर और रामानुज के ब्रह्म सम्बन्धी विचार का तुलनात्मक अध्ययन सूक्ष्मता की गहराई से प्रकट करता हो, इस दिशा में यह पुस्तक एक लघु प्रयास है। यहाँ शंकर और रामानुज के अलावा अर्थ, वेद, आरण्यक, उपनिषद्, गीता एवं पुराण में वर्णित ब्रह्म की अवधारणा, प्राचीन दार्शनिकों एवं परम्परागत भारतीय दार्शनिक सम्प्रदायों में वर्णित परमतत्व की अवधारणा की चर्चा की गई है।
डॉ० आरती रानी साहा उपाचार्य एवं विभागाध्यक्ष, दर्शन शास्त्र राजेन्द्र मेमोरियल वीमेन्स कॉलेज, नवादा। जन्म तिथि 10.12.1963 स्नातक आर० पी० एम० कॉलेज, पटना सिटी, मगध विश्वविद्यालय, बोध गया। बी० एड० पटना विश्वविद्यालय पटना। एम० ए० एवं पी-एच० डी० पटना विश्वविद्यालय, पटना। स्थायी पता नारियल घाट दानापुर, पटना।
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