हर स्थान का अपना एक सांस्कृतिक वैभव होता है जिसके आधार पर उसकी पहचान होती है। यह सांस्कृतिक पहचान समय-समय पर हुये सामाजिक एवं सभ्यतागत परिवर्तनों का परिणाम होती है जोकि कई वर्षों के उतार-चढ़ाव एवं मूल्यों के आधार पर निर्मित होती है। इसी क्रम में उज्जैन का सांस्कृतिक वैभव भी अभूतपूर्व है। उज्जैन मध्यभारत में स्थित एक अति प्राचीन नगर है। ऐसा माना जाता है कि उज्जयिनी विश्व के उन प्राचीन केन्द्रों में आता है जहाँ मानव बस्तियाँ सर्वप्रथम बताई गई।' उज्जैन ने संस्कृति के कई पहलुओं को कई वर्षों तक संजोया है इसी कारण वह इस क्षेत्र की सर्वप्रमुख सांस्कृतिक नगरी है। यहाँ विभिन्न धर्म, जाति, रीतिरिवाज, लोकांचलों का प्रभाव आदि संस्कृति के विभिन्न पक्ष निहित हैं। उज्जयिनी का यही सांस्कृतिक स्वरूप नित नये अनुसंधानों को आमंत्रण देते रहते हैं। उज्जैन के सभी पक्षों पर न्यूनाधिक कार्य हो चुका है एवं हो रहा है किन्तु शेष सभी की तुलना में पुरातात्त्विक पक्ष पर किये गये कार्य अभी अपेक्षाकृत लघु प्रयासित हैं। साथ ही पिछले दो दशकों में हुये नवीन उत्खनन एवं सर्वेक्षण कार्यों ने उज्जैन के पुरातात्त्विक परिदृश्य पर पुनरावलोकन की आवश्कयता को और बढ़ा दिया है। पिछले कुछ उत्खननों एवं सर्वेक्षण में उज्जैन को महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक केन्द्र के रूप में पाया गया है। यहाँ पर महत्वपूर्ण एवं विश्वप्रसिद्ध ताम्रपाषाणिक केन्द्र पाये गये हैं ओर लगातार मिल रहे है। इन केन्द्रों की विशिष्टताओं को आरेखित करने का प्रयास किया जाना आवश्यक है साथ ही उज्जैन जिले के विभिन्न केन्द्रों के अन्र्तसम्बन्ध को समझने तथा उत्पत्ति के मूलकेन्द्र को ढूँढ़ने जैसे गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास भी अति आवश्यक है। इन्हीं बिन्दुओं को ध्यान में रखकर उज्जैन जिले के ताम्रपाषाणिक केन्द्रों के तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन को इस पुस्तक का प्रमुख लक्ष्य माना गया है। उज्जैन की सर्वाधिक विशिष्ट पुरातात्त्विक पहचान है यहाँ कई ताम्राश्मकालीन केन्द्रों का पाया जाना। ताम्राश्मकालीन संस्कृति जिसका लगभग आधी सदी पूर्व भारतीय पुरातत्त्वविदों को संज्ञान ही न था उसके तीन प्रमुख ताम्राश्म सांस्कृतिक अनुक्रम यहाँ पाये गये और यह क्षेत्र भारत के ताम्रश्य केन्द्रों का प्रमुख स्थल हो गया। उज्जैन के ताम्राश्म संस्कृतिश्म केन्द्रों में कायथा, नागदा, रूनिजा, महिदपुर एवं दंगवाड़ा प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी कई ऐसे स्थल हैं जहाँ सर्वेक्षण के दौरान ताम्राश्म अवशेष प्राप्त हुये हैं। इन सभी स्थलों के सांस्कृतिक चिन्हों का यदि तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाये तो कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। उन केन्द्रों की अलग-अलग रिर्पोट छपी है किन्तु उज्जैन के पुरातात्त्तिक इतिहास में इन सभी केन्द्रों को जोड़कर नहीं देखा गया है। ताम्राश्म संस्कृति की उत्पत्ति एवं समाप्ति तथा आपस के अन्र्तसम्बन्धो जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर इन केन्द्रों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर इस महत्वपूर्ण विषय का चयन किया है जिसे उज्जैन के गरिमामय सांस्कृतिक पुरातत्व को भी अनुशीलित किया जा सके।
भूगोल:- आधुनिक उज्जैन जिला क्षिप्रा नदी के तट पर 23°11' उत्तरी अक्षांश तथा 75°47′ पूर्वी रेखांश पर स्थित है। उज्जैन जिला मालवा के मूल पठार में स्थित है। मालवा विन्ध्यपर्वत की मेखलाकटि के क्षेत्र में बने पठार पर बसा है। उज्जैन की समुद्र की सतह से ऊँचाई साधारणतः 1688 फुट है। यहाँ पहले विशाल जंगल था जिसे महाकाल वन कहते थे। पुराणों के अनुसार महाकालवन 100 योजन के क्षेत्र में फैला हुआ था। आज भी यहाँ का क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ है। यहाँ औसतन 35 इंच वर्षा होती है। अपनी समशीतोष्ण जलवायु के लिये उज्जैन प्रसिद्ध है। उज्जैन का क्षेत्रफल लगभग 6,031 वर्ग किमी है जोकि यहाँ की 6 तहसीलों खाचरौद, महिदपुर, घट्टिया, तराना, बड़नगर एवं उज्जैन में विस्तारित है। गेहूँ, बाजरा, चना, ज्वार एवं सोयाबीन यहाँ कि प्रमुख फसलें हैं यहाँ की मुख्य नदी क्षिप्रा है जोकि चम्बल नदी की सहायक नदी है। शिप्रा उत्तरवाहिनी है एवं इसनें तीन ओर से उज्जायिनी को घेर रखा है। इसी कारण इसका नामकरण भी हुआ है क्योंकि क्षिप्रा का अर्थ ही होता है कटि आभूषण उज्जैन के के ताम्रपाषाणिक केन्द्रों की प्राप्ति प्रायः चम्बल अथवा नर्मदा नदियों अथवा उनकी सहायक नदियों के तट पर हुई है। उज्जैन जिले से प्राप्त प्रमुख केन्द्र नागदा एवं दंगवाड़ा, चम्बल नदी के तट पर कायथा, छोटी कालीसिंध नदी के तट पर एवं महिदपुर क्षिप्रा पदी के तट पर स्थित है।
इतिहासः- इतिहासः- उज्जयिनी का इतिहास अति प्राचीन एवं कई उतार-चढ़ाव लिये हुये है। वर्तमान उज्जैन प्राचीन अवन्ति की राजधानी है। अवन्ति जनपद की स्थापना का श्रेय यदुवंश की हैहय वंश की शाखा को जाता है। अवन्ति जनपद की दो राजधानी थी महिष्मती एवं उज्जयिनी उज्जयिनी का निर्माण हैहयों की एक शाखा ने किया था धीरे-धीरे उज्जैन का महत्व बढ़ता चला गया। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय के अनुसार छठी शताब्दी ई.पू. में उत्तर भारत में जो सोलह महाजनपद बताये थे उसमें अवन्ति का बड़ा महत्व था। कालान्तर में इस क्षेत्र पर तालजंघ बेताल तथा उसके वंशजों का वर्चस्व स्थापित हो गया। वीतिहोत्र वंश के अंतिम राजा की हत्या करके पुणिक ने अपने पुत्र प्रद्योत को अवन्ति का राजा बनाया। प्रकृति से क्रोधी होने के कारण इसे चण्ड प्रद्योत भी कहा जाता है। उसने अपनी शक्ति एवं राज्य की सीमा में अप्रतिम वृद्धि कर ली थी।
म.प्र. में स्थित मालवा पठार ताम्रपाषाण संस्कृति का एक विशिष्ट केन्द्र है। अधिकांश ताम्रपाषाण केन्द्र उज्जैन परिक्षेत्र में पाये जाते हैं। वहीं ताम्रपाषाण संस्कृति के कई रहस्य अभी तक अस्पष्ट हैं ऐसे में इस क्षेत्र के ताम्रपाषाणिक केन्द्रों के विश्लेषणात्मक अध्ययन करने की दृष्टि से इस पुस्तक की रचना की गई है। हिन्दी भाषी पुरातत्त्व के विद्यार्थियों के लिये यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी।
नाम डॉ. प्रीति पाण्डे जन्म 10 अगस्त 1977, कानपुर (उत्तरप्रदेश) पिता माता डॉ. प्रकाश अवस्थी श्रीमती पद्मा अवस्थी पति श्री सतीश पाण्डे पुत्र चि.अभेद्य पांडे शिक्षा एम.ए. (इतिहास), एम.ए. (प्रा.भा.इति.सं.एवं पुरातत्त्व) स्वर्ण पदक, पीएच.डी. श्री शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र.) प्रकाशित ग्रन्थ- 1. गुरू गोलवलकर एवं उनका चिन्तन (2014). 2. युगयुगीन कायथा (2019), 3. मालवा में गुजरात से विस्थापन की परम्परा (2021) संक्षिप्त परिचय - लगभग 100 राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध पत्रों का वाचन एवं प्रकाशन । अनुसंधान शोध संस्थानों में सदस्य । यू.जी.सी. नेट परीक्षा जूनियर रिसर्च फैलोशिप के साथ उत्तीर्ण। आई.सी.एच.आर. सहित कई संस्थानों के द्वारा प्रदत्त शोध कार्य संपादित किया। पोस्ट डॉक्टोरल फैलोशिप (यूजीसी) प्राप्त की (2015-2019) सम्प्रति - व्याख्याता, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययनशाला, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) समन्वयक, सिंधिया प्राच्य विद्या शोध प्रतिष्ठान, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)
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