(क) संत दाद्याल का व्यक्तिगत परिचय
(१) जीवनवृत्त
१. सामग्री संत दादूदयाल के जीवनपूच की सामग्री पर्याप्त रूप में नहीं मिलती और जो उपलब्ध है यह भी वैसी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इन्होंने स्वयं अपने विषय में बहुत कम कहा है और इनके अनुवाथियों ने जो कुछ लिखा है यह भी या तो प्रासंगिक रूप में है और प्रशंसात्मक मात्र है अथवा वह ऐसी शैली में प्रकट भी किया गया है जिससे उसकी प्रामाणिकता पूर्णतः स्वीकृत नहीं हो पाती। इनके शिष्य जनगोपाल रचितः प्रसिद्ध ग्रंथ 'श्री दादू जन्मलीला परची' में दिया गया परिचय बहुत कुछ काल्पनिक और चमत्कारपूर्ण सा लगता है और दादूपंथी राघोदास के 'भक्तमाल' (सं० १७१७) में आए हुए विवरणो' में भी ऐतिहासिक तथ्यों की जगह अनेक पौराणिक प्रंसग ही मिलते हैं। जहातक पता है अभी आजतक ऐसी कोई भी लिखित सामग्री हाथ नहीं लगी, जिसके द्वारा हमारी सारी जिज्ञासाथ्रो' की पूर्ति हो सके और न कोई अन्य स्थानीय साधन भी मिल सका जिसे इनके किसी ऐतिहासिक परिचय का निश्चित आधार बनाया जा सके। ऐसी दशा में इनके जीवनवृत्त की बहुत सी बातो का अभी तक न्यूनाधिक संदिग्ध तथा मतभेदपूर्ण रह जाना कोई आश्चर्य की बात न होगी ।
२. जीवनकाल-इनके जीवनकाल के विषय में सभी सहमत जान पड़ते हैं और इसमें कदाचित् किसी को भी आपत्ति नहीं कि इनका जन्म फागुन सुदी ८ वृहस्पतिवार सं० १६०१ (सन् १५४४ ई०) को हुआ था तथा इनकी मृत्यु भी जेठ बदी ८ शनिवार सं० १६६० सन् १६०३ ई० को हुई थी। इस प्रकार एक ओर गो० तुलसीदास (सं० १५-१६८०) तथा राजस्थानी कवि पूधीराज राठोड (सं० १६०६-१६५७) और संत लालदास (सं० १५६७-१७०५) के समकालीन ठहरते हैं तो दूसरी ओर मुगल सम्राट् अकबर (सं० १५६६-१६६२) पूर्व महाराणा प्रताप (सं० १५६७-१६५४) के भी समसामयिक सिद्ध होते हैं और प्रसिद्ध है कि अकबर के साथ एक बार इनकी भेंट भी हुई थी। इनका मृत्युत्थान भी नराणा ग्राम समझा जाता है जहाँ से कुछ ही दूर अवस्थित 'भैराणे की खोल' में इनका शव रख दिया गया था। वहाँ अभी तक उसका स्मारक वर्तमान है और नराणे में दादूद्वारे का सर्वप्रमुख केंद्र भी प्रतिष्ठित है। फिर भी इनके जन्म-स्थान के संबंध में दो मत प्रकट किए गए हैं जिनमें से अहमदाबाद नगर के पक्ष में अधिक लोग हैं और स्व० सुधाकर द्विवेदी ने उसका जौनपुर होना अनुमान किया है'। दादूपंथ के अनुयायियों' का कहना है कि दादू-दयालजी एक छोटे से बालक के रूप में साबरमती नदी में बहते हुए किसी लोदीराम नामक नागर ब्राह्मण को मिले थे जिसकी स्त्री ने अपना दूध पिलाकर इनका भरण पोषण किया। 'परची' के रचयिता जनगोपालने लोदी वा लोधीराम को ही अहमदाबाद नगर का एक 'परम उदार सौदागर' भी बतलाया है। परंतु आचार्य क्षितिमोहन सेन के अनुसार अहमदाबाद अथवा उसके निकट भी रहनेवालों को इस बात का कोई पता नहीं है और न वहां आसपास में इसका कोई स्मारक ही वर्तमान है।
३. जाति-कुछ लोगों का अनुमान है कि दादूदयालजी वस्तुतः लोदीराम के औरस पुत्र रहे होंगे और उनकी पत्नी बसीवाई इनकी माँ रही होंगी जिस बात को सिद्ध करने के लिये कोई पुष्ट प्रमाण नहीं दिया जाता। इसके विपरीत बहुत से लोग इनको जाति का धुनिया होना ठहराते हैं और इसके लिये स्वयं इनके शिष्य संत रज्जबजी की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं जो इस प्रकार हैं
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