लेखक परिचय
डॉ. जगदीश प्रसाद यादव, ग्राम और पोस्ट- सांडा सानी, जिला बांदा (उ.प्र.) के निवासी हैं। इन्होंने अपनी शैक्षिक यात्रा में उच्चतर शिक्षा प्राप्त की है। 2022 में उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज से इतिहास में एम.ए., 2020 में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट से शिक्षा में पीएच.डी., 2016 में उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज से अंग्रेजी में एम.ए., 2011 में ए.पी.एस. विश्वविद्यालय, रीवा से एम.एड., 2010 में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से राजनीति विज्ञान में एम.ए., 2008 में जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से बी.एड. तथा 2007 में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की है। डॉ. यादव ने अनेक पात्रता परीक्षाएँ उत्तीर्ण की हैं, जिनमें यूपी टीईटी प्रथम (2011), केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा द्वितीय (2015), केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा प्रथम एवं द्वितीय पेपर (2021), बिहार एसटीईटी प्रथम पेपर (2023) तथा बिहार एसटीईटी द्वितीय पेपर (2023) शामिल हैं। शैक्षणिक शोध के क्षेत्र में भी डॉ. यादव की उल्लेखनीय सक्रियता रही है। अब तक उनके 9 शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, सेमिनारों तथा कार्यशालाओं में शोध-पत्रों का वाचन एवं शोध-पत्र प्रस्तुत कर अकादमिक विमर्श में सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की है। डॉ. यादव ने धीरेंद्र कुमार के साथ 'डी.एल.एड. प्रथम वर्ष हेतु (बिहार के पाठ्यक्रमानुसार)' पुस्तक का संपादन किया है, जिसका नाम 'बचपन और बाल विकास' (2020) है।
भूमिका
भारत की स्वतंत्रता केवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक पुनर्निर्माण की एक दीर्घकालिक प्रक्रिया का प्रारंभ भी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरा, जहाँ शिक्षा की स्थिति अत्यंत विषम और असंतुलित थी। व्यापक निरक्षरता, सीमित शैक्षिक अवसर, सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ तथा शिक्षा और जीवन के बीच बढ़ती दूरी स्वतंत्र भारत के समक्ष गंभीर चुनौतियों के रूप में उपस्थित थीं। ऐसे परिवेश में शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का प्रमुख साधन माना गया और उसे लोकतांत्रिक, समतामूलक तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण से जोड़ा गया। औपनिवेशिक काल की शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित की गई थी। इसका उद्देश्य भारतीय समाज का सर्वांगीण विकास नहीं, बल्कि सीमित संख्या में ऐसे व्यक्तियों को तैयार करना था जो औपनिवेशिक शासन की मशीनरी को संचालित कर सकें। स्वतंत्रता के पश्चात यह स्पष्ट हो गया कि इस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था न तो भारतीय समाज की आकांक्षाओं को पूरा कर सकती है और न ही सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक हो सकती है। इसलिए शिक्षा के पुनर्गठन की आवश्यकता को स्वतंत्र भारत की प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ। भारतीय संविधान ने शिक्षा को लोकतांत्रिक नागरिकता, समान अवसर और सामाजिक न्याय से जोड़ा। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शिक्षा को मानव संसाधन विकास का मूल आधार माना गया।
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