भारत में 'ध्यान-सोपान' पुस्तक का प्रकाशन सिद्धयोग ध्यान के साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी प्रकार के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। एक सिद्धगुरु से प्राप्त यह बहुत ही दुर्लभव अनमोल उपहार है। यह पुस्तक केवल उन्हीं को सम्बोधित नहीं करती जिनमें मात्र बौद्धिक जिज्ञासा है, अपितु यह उनके लिए भी नए द्वार खोल देती है जिनमें यह साहस व ललक है कि वे अपने आपको प्रकाश के लोक में, प्रेम के लोक में, सत्य के लोक में निमग्न कर लें। स्वामी मुक्तानन्द ने जिस ध्यान का अभ्यास किया, जिसे सिद्ध किया व सिखाया, वह एक ऐसे मार्ग को प्रशस्त करता है जो हमारे अस्तित्व के अन्तिम लक्ष्य, आत्मसाक्षात्कार तक ले जाता है।
आदिकाल से ही मनुष्य की यह चाह रही है कि वह स्वयं भी शान्तिपूर्वक रहे और अपने आसपास के संसार के साथ भी शान्ति का सम्बन्ध स्थापित करे। वह इस बात के प्रति प्रयत्नशील रहा है कि वह इस ब्रह्माण्ड को जाने, जो रहस्यमय है और अधिकांशतः अज्ञात भी। अपनी इन्हीं उत्कंठाओं को जिज्ञासु प्रश्नों के रूप में व्यक्त करते रहे हैं और ऋषि-मुनियों ने ध्यान द्वारा, अपने ही अन्तर में इन प्रश्नों के उत्तर उद्घाटित कर मानवजाति को आश्वस्त किया है और आध्यात्मिक समाधान प्रदान किया है।
'ध्यान सोपान' में बाबा मुक्तानन्द की ध्यान विषयक मूल शिक्षाएँ निहित हैं। वे केवल यही नहीं बताते कि हमें ध्यान क्यों करना चाहिए, बल्कि ध्यान की वे तकनीकें भी सिखाते हैं जिनका उन्होंने स्वयं अभ्यास किया था। पुस्तक का एक उद्धरण है, "हम सिर्फ थोड़ा तनावमुक्त होने के लिए और थोड़ी-सी शान्ति का अनुभव करने के लिए ध्यान नहीं करते।
हम ध्यान करते हैं, अपनी अन्तर-सत्ता को उन्मीलित करने के लिए।" मानव जीवन का लक्ष्य है, ध्यान व अन्य आध्यात्मिक अभ्यासों द्वारा अन्तरात्मा का अनुसन्धान करना और यह जान लेना कि यह अन्तरात्मा ही भगवान है।
ध्यान के बारे में समझाते हुए बाबा जी रूपक के तौर पर कार के चार पहियों का प्रयोग करते हैं। पहला पहिया है, अन्तर आत्मा पर केन्द्रण; दूसरा है, मन्त्र, अर्थात् एक ऐसे शब्द या वर्ण का प्रयोग जो एकाग्र होने में सहायक होता है; तीसरा है, आसन या बैठने की मुद्रा जो शरीर को स्थिर व सहज रखने में सम्बल प्रदान करती है; और चौथा है, प्राणायाम, यानी श्वास-प्रश्वास की युग्म प्रक्रिया को सन्तुलित रखना।
तथापि, बाबा जी हमें बतलाते हैं कि ध्यान करने का सबसे सरल तरीका है कुण्डलिनी शक्ति की जागृति-वह शक्ति जो हर मनुष्य के अन्दर सुप्तावस्था में रहती है। इस जागृति के लिए यह आवश्यक है कि हमें एक आध्यात्मिक गुरु का अनुग्रह प्राप्त हो-एक ऐसे सद्गुरु का अनुग्रह जिनकी शक्ति स्वयं उनके श्री गुरु ने जाग्रत की हो और जिन्हें दूसरों को शक्तिपात देने का अधिकार प्राप्त हो; तब ध्यान कोई श्रमसाध्य या कठिन अभ्यास नहीं रह जाता, बल्कि यह उतना ही सहज-सरल हो जाता है जितनी सहजता से निद्रा आती है। "जब गुरु की शक्ति हमारे अन्दर सम्प्रेषित की जाती है और हमारी सुप्त अन्तर-शक्ति जाग्रत हो जाती है, तो ध्यान सहज रूप से स्वतः ही होने लगता है।
सिद्धयोग ध्यान एक जीवन पद्धति है जिसे हम अपने दैनन्दिन कार्यों को करते हुए भी अपना सकते हैं, फिर चाहे वह हमारा व्यवसाय हो या फिर कोई घरेलू काम-काज। यही कारण है कि सिद्धयोग ध्यान आधुनिक समय के लिए बिलकुल उपयुक्त है।
बाबा मुक्तानन्द ने जिस ध्यान क्रान्ति का सूत्रपात किया था, उसे आगे बढ़ाने में इस शक्तिपूरित पुस्तक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यही ध्यान क्रान्ति अब, सिद्धयोग परम्परा की वर्तमान गुरु, गुरुमाई चिद्विलासानन्द के मार्गदर्शन में फल-फूल रही है। श्री गुरुमाई ने इस ध्यान-क्रान्ति को एक सार्वभौमिक अभियान [मिशन] का रूप दिया है। वे साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन व ध्यान के रूपान्तरणकारी अनुभव प्रदान करती हैं जिससे लोगों के हृदय खुलते हैं ताकि वे अपनी अन्तर आत्मा से, दिव्य आनन्द के स्रोत से जुड़ सकें।
श्री गुरुमाई हमसे कहती हैं कि हम अपने अन्तरस्थ भगवान के दर्शन करें और फिर, उसी दिव्यता को मानवमात्र में देखें। इससे हम प्रेम, विनम्रता, बन्धुत्व और अपनी ही अन्तर्जात अच्छाई से परिपूर्ण हो जाएँगे। फिर हमारे आसपास का संसार रूपान्तरित होकर और भी बेहतर स्थान बन जाएगा।
३१ मार्च १९८८ को मैं श्री गुरुमाई से पहली बार मिला। तभी से मेरे जीवन पर उनका बहुत गहरा प्रभाव रहा है। मुझे हमेशा से ही उपनिषदों और हमारे सन्तजनों की शिक्षाओं में रुचि रही है, पर जबसे मैं श्री गुरुमाई से मिला हूँ तबसे आध्यात्मिकता मेरे दैनिक जीवन का एक आवश्यक अंग बन गई है। उनकी जिस बात ने मुझे गहराई तक छू लिया है, वह है लोगों को सिखाने का उनका तरीका जिससे लोगों में रूपान्तरणकारी परिवर्तन आ जाता है-अपने हृदय में औरों के प्रति प्रेम व सम्मान लिए वे और भी अच्छे मनुष्य बन जाते हैं।
यह रूपान्तरणकारी प्रक्रिया 'ध्यान-सोपान' को पढ़ने के साथ-साथ शुरू हो सकती है। इस पुस्तक के शब्द, सामान्यजन के लिए ध्यान की जटिलताओं को सरल-सुगम तो बनाते ही हैं, वे अपने आप में श्री गुरु की कृपा के वाहक भी हैं।
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