नाम : डॉ. राम प्रमोल कुमार पिता स्वगर्गीय श्री रामरूप पासवान माता: स्वर्गीय श्रीमती गौरी देवी जन्म तिथि 04-10-1971 जन्मस्थान ग्राम मोकिमपुर, ढाकपर बिलौर, थाना बाद, विला पटना, राज्य बिहार विद्यालय नेतरहाट आवासीय विद्यालय, पलामू, पूर्व बिहार (झारखण्ड) महाविद्यालय : रामजस महाविद्यालय, दिल्ली विश्व विद्यालय से संस्कृत में ची.ए. (आनर्स) तथा एम.ए. को परीक्षा उत्र्तीण विश्वविद्यालय व्यवसायिक उपाधि अध्यापन कार्य : उत्तरी परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.फिल. और पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त. यू.जी.सी. से चार बार नेट (NET) की परीक्षा उत्तीर्ण, शिक्षा स्नातक - L.B.S.S. Vidyapeeth : अगस्त 2000 से मार्च 2002 तक एन.सी.डब्ल्यू.इ.वी (N.C.WE.B. Delhi Unitersity) में अध्यापन कार्य किया. सितम्बर 2002 से 21 अगस्त 2009 तक के वि.एस. में अध्यापन कार्य किया. वर्तमान समय में हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में तदर्थ प्राध्यापक के रूप में कार्यरत. नवम्बर 2010 से मार्च 2011 तक अतिथि प्राध्यापक के रूप में हिन्दू महाविद्यालय और रामजस महाविद्यालय, DU में कार्य किया. मार्च 2011 से वर्तमान में निरंतर स्थायी प्राध्यापक के रूप में विश्व भारती विश्वविद्यालय (VBU) शांति निकेतन में कार्यरत.
उत्तर राम चरित का नाटकीय विश्लेषण" पांच के संदर्भ में भवभूति करुण रस के महान पुरोधा माने जाते है. भवभू िने सभ रसों के मूल में करूण रस को उत्कृष्टता उत्तर राम चरित में प्रमाणित कर दी है. एक ही करुण रस निमितों के भेद से भिन्न भिन्न होता हुआ मानों श्रृंगार, वात्सल्यादि के रूप में प्रतीत अलग अलग अवास्ततिक परिषायों का आश्रय होता है जैसे एक ही अभिन्न जल निमित्त भेद से भंवर, दुखद, हिम, तरंग, प्रवाहित जलसधाय का रूप होता है परन्तु यह सब जल वास्तव में जल ही है. रामायण की करूच रस, उद्योगन को महाकवि भवभूति ने सप्रग अंक के गर्भाक में गंगावतरण द्वारा सीता राम का सुखद मिलन कर काव्य रस की वेदना को संयोग कुंगार के द्वारा उतर रामबरिते भवभूतिः विशिष्टते' को सम्यक रूपेण चरितार्थ किया है. नाट्यचार्यों द्वारा उल्लेखित रूपक को प्रगति के लिए आवश्यक पांच अर्थप्रकृतियों बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी एवं कार्य तथा पांच अर्थप्रकृतियों- बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी एवं कार्य तथा पांच अवस्थाएं आरम्भ, यत्न, प्रायाशा, निषताप्ति और फलांगम, उनपिव- पांच प्रमुख संथियां - मुख संधि, प्रतिमुख, साँच, गर्म साँध, विमर्श साँध एवं निर्वहण संचियों का सम्यक निर्वहन अति उत्तम है. इन समस्त तत्वों का समावेशन नाटक की सफलता स्वर्थ सिद्ध करती है. नाट्यशास्त्र' 36-37 अध्याय और 6000 श्लोको में लिखा अद्भुत जीवंत ग्रंथ है जिसका अक्षरश पालन करके कवि भवभूति ने इस विद्या को अजर-अमर बना दिया है. चारों वेदों से ग्रहित चार तत्वों उगवेद से कथावस्तु, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान और अर्थवेद से अभिनय, सामवेद से गान और अर्थवेद से गृहित रस से निर्मित पंचमवेद नाट्यवेद सचमुच शुद्रों और स्वियों के साथ-साथ समस्त मानव जाति के लिए अत्यंत उपादेय हो गया है. 'उत्तर राम चरित नाटय के नाटकीय अंग प्रत्यंगों के वर्णन के साथ-साथ पंचमवेद रूपी उत्तर रामचरित स्वर्ग और मृत्युलोक के बीच कड़ी स्थापित करेगा - निसंदेह में ऐसा मानता हूँ. यही भरतमुनि का अभिप्राय और मानव जाति का कल्याण माना जायेगा. ग्रंथ से नाट्य प्रयोजन की सार्थकता सिद्ध होगी ही.
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