प्रतिकूल अवश्य प्रतीत इसीलिए उपचार देत हो सकता है। निदय एवं मन के विि एगी तथा यह दे की एवं पुति में अतुलित वृद्धि हो दल नहीं मंडराए तता हमें आतंकि समक्ष फीकी प केन्तु उसके श्री उत्तेजना न उत्तेजगा क हम अपने जीवन का अध्ययन करें तो ज्ञात होगा कि हमारा वर्तमान जीवन सुख-दुःख युक्त है। ऐसा किसी का जीवन नहीं है कि जिनमें दुःख ही दुःख हो। मानवमात्र सहज स्वभाव से सुख चाहता है, परन्तु विडम्बना यह है कि जिस सुख को वह पा रहा है वह टिकता नहीं। जिन वस्तुओं का वह उपयोग कर रहा है उसका न चाहने पर भी उनका विनाश या वियोग हो रहा है। रोग, बुढ़ापा, मृत्यु दुर्घटता आदि दुःखों का साथ सदा लगा रहता है। मानव इन सब दुःखों का अन्त करना चाहता है। दुःखरहित सुख कैसे मिले, यह समस्या सभी के जीवन की है। इसी समस्या का समाधान इस सुपुस्तक में खोजने का प्रयत्न किया गया है। मानव जब अपने सुख-दुःख का कर्ता-अकर्ता स्वयं ही है तो यह उसके वश की बात है कि वह चाहे तो दुःख से सदा के लिए छूट सकता है, इसमें किसी अन्य की सहायता अपेक्षित नहीं है। वह दुःखी रहता है तो इसका एकमात्र कारण स्वयं उसकी भूल है, प्रकृति या अन्य किसी का दिया गया दंड नहीं है। इस भूल को दूर कर मानव सदा के लिए दुःख से छुटकारा पा सकता है। कन्हैयालाल के संबंध में नुभूति का कि दुख यी रूप पर तुत दुःख से मुक्ति पाने के अनेक उपाय हो सकते हैं। जिस प्रकार रोग अनेक होते हैं और उनकी औषधियाँ व चिकित्सा प्रणालियों भी अनेक होती है, परन्तु उन सबमें निहित तत्त्व एक ही होता है और वह है की स्वास्थ्य की उपलब्धि। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने विभिन्न के विकार हैं और उन विकारों के अनुसार उनके निवारण हेतु अपना अलग साधन हो सकता है। अतः एक ही साधन सभी के लिये उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं है। अतः किसी साधन विशेष का आग्रह रखने की भूल है। अपने स्वभाव व रुचि के अनुकूल साधन व साधन प्रणाली को अपनाना उचित है। अनेक साधन प्रणालियों में दुःख-मुक्ति के लिए अपनाये गये निवृत्ति मार्ग या निषेध परक साधनाओं से जन-जीवन में अकर्मण्यता, जड़त, रिक्तता आ जाती है, किन्तु ऐसा अध्यात्मिक साधना से नहीं होता है, प्रत्युत जीवन में अनन्त कारुण्य, असीम माधुर्य सामर्थ्य, चैतन्य, कैवल्य व अक्षय रस की उपलब्धि होती है। जीवन बाहर से शान्त परन्तु अंतस्तल पर असीम गतिशील रहता है। धर्म या अध्यात्म के विषय में ऐसी धारणा प्रचलित है कि साधक एकाकी जीवन बिताता है, वह समाज से कट जाता है और संसार मे अलग-थलग पड़ जाता है, परन्तु सच्चाई इसके विपरीत है। होता यह है कि ऐसे व्यक्तियों का सारा जीवन लोक-कल्याणार्थ होता है। ऐसे ही व्यक्तियों के द्वारा समाज, राष्ट्र व संसार का निर्माण होता है तथा शारीरिक, मानसिक एवं वैचारिक रूप में सर्वांगीण विकास होता है। इस पुस्तक में बौद्धिक व शुष्क तात्त्विक विश्लेषण नहीं किया गया है। अपितु व्यक्ति की वर्तमान वस्तु-स्थिति के चित्रण से प्रारम्भ कर उसके जीवन में घटने वाली घटनाओं के सहारे क्रमशः आगे बढ़ते हुए क्षणिक विषय सुख के क्षेत्र को पारकर अक्षय-अखंड-अनंत सुख तक पहुँचने का अति सहज, सरल एवं सुगम मार्ग बताया गया है। सारा कथन स्वाभाविक व नैसर्गिक नियमों पर आधारित है। मानव जीवन के सामान्य अनुभवों से दूर किसी धर्म-दर्शन के पूर्व स्थापित सिद्धान्त व मान्यता को आधार बनाकर इसमें विवेचन नहीं है। सारा विवेचन स्वयं-सिद्ध निज ज्ञान सर्वदा सर्वत्र सबका समान होता है। अतः उसे सिद्ध करने के लिए किसी अन्य ग्रन्थ या महापुरूष की वाणी के प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती है, प्रत्युत सभी महापुरूषों की वाणी, धर्मों व दर्शनों में प्रतिपादित सिद्धान्त उसमें से स्वतः प्रस्फुटित होते हैं। इस पुस्तक में ऐसे सहज, सुगम साधन प्रस्तुत किए गए हैं
कन्हैयालाल लोढ़ा का जन्म धनोप (जिला-भीलवाडा, राजस्थान) में मार्गशीर्ष कृष्णा द्वादशी संवत् 1979 में हुआ। आप हिन्दी में एम.ए. हैं तथा साहित्य गणित, भूगोल, विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, अध्यात्म आदि विषयों में आपकी विशेष रूचि है। आपकी लघुवय से ही सत्य-धर्म के प्रति अटूट आस्था एवं दृढ़ निष्ठा रही है। आपने जैन-जैनेतर दर्शनों का तटस्थतापूर्वक गहन मंथन कर उससे प्राप्त नवनीत को 300 से अधिक लेखों के रूप में प्रस्तुत किया है। आपका चिन्तन पूर्वाग्रह से दूर एवं गुणग्राहक दृष्टि के कारण यथार्थता से परिपूर्ण होता है। विज्ञान और मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में जैन धर्म दर्शन पुस्तक पर आपको स्वर्गीय प्रदीप कुमार रामपुरिया स्मृति पुरस्कार', 'दुःख-मुक्ति सुख प्राप्ति पुस्तक पर 'आचार्य श्री हस्ती-स्मृति-सम्मान पुरस्कार सकारात्मक अहिंसा शास्त्रीय और चारित्रिक आधार पुस्तक पर गौतम गणधर पुरस्कार तथा 'साहित्य-साधना पर मुणोत फाउण्डेशन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। प्रस्तुत पातंजल योगसूत्र अभिनव निरूपण' कृति के अतिरिक्त आपकी निम्नलिखित प्रमुख कृतियाँ प्रकाशित है: दुःख-मुक्ति: सुख प्राप्ति, 2. जैन धर्म जीवन धर्म, 3. कर्म सिद्धान्त, 4. सेवा करें: सुखी रहें, 5. सैद्धान्तिक प्रश्नोत्तरी, 6. जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी, 7. दिवाकर रश्मियाँ, 8. दिवाकर देशना, 9. दिवाकर वाणी, 10. दिवाकर पर्वचिन्तन, 11. श्री जवाहराचार्य सूक्तियाँ, 12. वक्तृत्व कला, 13. वीतराग योग (लघु), 14. जैनागमों में वनस्पति विज्ञान, 15. जीव-अजीव तत्त्व, 16. पुण्य-पाप तत्त्व, 17. आखव संवर तत्त्व, 18. निर्जरा तत्त्व, 19. सकारात्मक अहिंसा, 20. सकारात्मक अहिंसा (शास्त्रीय और चारित्रिक आधार), 21. दुःख रहित सुख, 22. ध्यान शतक, 23. वीतराग योग, 24. कायोत्सर्ग, 25. जैन धर्म में ध्यान, 26. वीतराग ध्यान की प्रक्रिया, 27. Boundless Bliss 28. बन्ध तत्त्व, 29. मोक्ष तत्व, 30. विपश्यना ध्यान (मुद्रित है)। अखिल भारतीय जैन विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष होने के साथ आप श्वेताम्बर, दिगम्बर दोनों जैन सम्प्रदायों के आगम-मर्मज्ञ जैन विद्वान् हैं। आप एक उत्कृष्ट ध्यान साधक, चिन्तक, गवेषक हैं। प्रस्तुत पुस्तक आपके जीवन, चिन्तक एवं सत्य दृष्टि का एक प्रतिबिम्ब है
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