Amritamahotsava Granthamala- 103
पुरोवाक्
भारतीय ज्ञानपरम्परा में भगवान् बुद्ध का व्यक्तित्व केवल एक महापुरुष अथवा धर्मप्रवर्तक के रूप में ही नहीं, अपितु करुणा, प्रज्ञा तथा लोकमंगल की चेतना के अद्वितीय प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है। उन्होंने मानव जीवन में व्याप्त दुःख, उसके कारण तथा उसके निरोध के उपाय का गम्भीर अन्वेषण कर समस्त मानवता के लिए एक ऐसे मार्ग का उद्घाटन किया, जो आज भी समान रूप से प्रासंगिक एवं प्रेरणादायी है। बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन सत्य की खोज, आत्मानुशासन, लोकहित तथा मानव-कल्याण के आदर्शों से अनुप्राणित रहा है।
प्रस्तुत 'धर्मचक्रप्रवर्तनम्' नाटक भगवान् बुद्ध के जीवन-वृत्त के उन महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का कलात्मक एवं प्रभावशाली निरूपण करता है, जिनके माध्यम से उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की व्यापकता उद्घाटित होती है। सिद्धार्थ के जन्म से लेकर महाभिनिष्क्रमण, कठोर तपश्चर्या, बुद्धत्व-प्राप्ति, सारनाथ में प्रथम धर्मोपदेश, संघ-स्थापना तथा बहुजनहिताय निरन्तर धर्मप्रचार जैसे विविध प्रसंगों को नाटककार ने अत्यन्त रोचक एवं नाटकीय शैली में प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से बुद्ध के धर्मचक्र-प्रवर्तन को केवल सारनाथ की एक ऐतिहासिक घटना के रूप में न देखकर, सम्पूर्ण जीवन-पर्यन्त चले लोकमंगलमय धर्मकार्य के रूप में चित्रित करना इस कृति की उल्लेखनीय विशेषता है।
इस नाटक में भगवान् बुद्ध के समक्ष उपस्थित सामाजिक, धार्मिक एवं मानवीय चुनौतियों का भी यथार्थ चित्रण किया गया है। देवदत्त के विरोध, संघ-व्यवस्था के विकास, स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने जैसे प्रसंगों के माध्यम से तत्कालीन समाज की जटिलताओं एवं बुद्ध की उदार, विवेकपूर्ण तथा करुणामयी दृष्टि का सुन्दर परिचय प्राप्त होता है। इस प्रकार यह नाटक केवल एक धार्मिक आख्यान न होकर मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता तथा नैतिक जागरण का भी प्रभावी दस्तावेज बन गया है।
संस्कृत नाट्यपरम्परा में ऐतिहासिक एवं महापुरुष-आधारित रूपकों का विशेष स्थान रहा है। प्रस्तुत कृति उसी गौरवशाली परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी प्रतीत होती है। भाषा की सरसता, कथानक की सुसम्बद्धता तथा ऐतिहासिक स्रोतों के समुचित उपयोग ने इस नाटक को विशेष रूप से पठनीय एवं मंचनीय बनाया है। यह कृति विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, संस्कृत-साहित्य के अध्येताओं तथा बौद्ध-अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
मुझे विश्वास है कि 'धर्मचक्रप्रवर्तनम्' नाटक भगवान् बुद्ध के लोककल्याणकारी संदेश को व्यापक समाज तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा तथा पाठकों एवं दर्शकों के मन में करुणा, मैत्री, अहिंसा और सदाचार के आदर्शों को दृढ़ता प्रदान करेगा।
इस उत्कृष्ट कृति के प्रकाशन पर मैं प्रख्यात विद्वान् आचार्य श्रीवसन्त भट्ट जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित व्यक्त करता हूँ। प्रस्तुत ग्रन्थ आपके गहन वैदुष्य एवं दीर्घ अध्ययन-साधना का एक उत्कृष्ट परिचायक है। मुझे विश्वास है कि यह कृति विद्वत्समाज तथा सामान्य पाठकों, दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी एवं प्रेरणादायी सिद्ध होगी। आशा है कि भविष्य में भी आपके अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इसी प्रकार प्रकाशित होकर पाठकों के समक्ष आते रहेंगे तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के संवर्धन में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते रहेंगे।
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