पुस्तक परिचय
प्रस्तुत पुस्तक बुद्धकालीन आर्थिक जीवन एक शोध परक पुस्तक है। संपूर्ण पुस्तक में बौद्धकालीन आर्थिक जीवन पर विशाल सामग्री सप्रमाण उपलब्ध है। इसमें पालि साहित्य के सामान्य परिचय के साथ-साथ गौतमबुद्ध और महापरिनिर्वाण, विनयपिटक, सुत्तपिटक, अभिधम्मपिटक आदि के आधार पर तत्कालीन आर्थिक स्थिति का अनुशीलन किया गया है। यह अध्ययन कृषि एवं कृषक, कृषक, भूमि-भेद, भूमि-भव राजस्व, अर्थदण्ड, जंगल एवं खानें, राजस्व, अनुत्तराधिकारी संपत्ति प्रभृति उपशीर्षकों के अन्तर्गत सभी संबंधित विषयों की सारगर्भित एवं तार्किक मीमांसा प्रस्तुत की गई है। तत्कालीन समाज में पशुधन की भूमिका. पालि-साहित्य में वर्णित पशुओं के प्रति बौद्ध दृष्टिकोण, पशुओं का राजकीय संरक्षण, पशु-भोजन एवं गोचरभूमि, पशु-लक्षण तथा अरण्य एवं पालतू पशुओं पर खोजपरक एवं अनुसंधात्मक तथ्य, प्रस्तुत किये गये है। उद्योग और अर्थ का अन्योन्याश्रित संबंध है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यही कारण है कि इस अध्याय में तत्कालीन सामाजिक जीवन में प्रचलित विभिन्न उद्योगों का वर्गीकृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यथा-धातु उद्योग, धर्म उद्योग, वस्त्र उद्योग, मत्स्य उद्योग, पाक उद्योग, पुष्प उद्योग, काष्ठ उद्योग, हस्ति-दन्त उद्योग, मिट्टी-बर्तन उद्योग, मुर्गी पालन उद्योग, लवण उद्योग आदि। पालि-साहित्य में बौद्धकालीन जीवन और जीविकोपार्जन से संबंधित प्रचुर सामग्री है। बौद्धकालीन व्यापार से संबंधित सभी तथ्यों को रेखांकित किया गया है।
लेखक परिचय
डॉ० नरमदेश्वर कुमार का जन्म सन् 1974 में 9 दिसम्बर के हुआ। इनके माता का नाम स्व० सुशीला देवी तथा पिता श्री रामएकवाल सिंह, जो ग्रांम-पडरियावाँ, पो०- वजीरपुर, थाना-विक्रम, जिला-पटना (बिहार) के निवासी है। प्राथमिक शिक्षा इन्होंने गाँव से; मैट्रिक, पार्वती उच्च विद्यालय, विक्रम से, इंटर तथा स्नातक महंत मधुसूदन महाविद्यालय, विक्रम, स्नातकोत्तर पालि नवनालंदा महाविहार, नालंदा, पीएच० डी० की उपाधी मगध विश्वविद्यालय, बोध गया तथा द्वय स्नातकोत्तर मगही भाषा सहित्य में नालंदा खुला विश्वविद्यालय, पटना से प्राप्त की। डॉ० सी० पी० ठाकुर कॉलेज, नौबतपुर में व्याख्याता (पालि साहित्य) के पद पर कार्यरत है।
पुरोवाक्
प्रस्तुत ग्रन्थ के रचनाकार डॉ० नरमदेश्वर कुमार भारतीय प्राचीन भाषा पालि के उद्भट विद्वान हैं। भारतीय समाज के अतीत में जाकर कुछ ढूंढ़ निकालने की उत्कट अभिलाषा और प्रवल जिज्ञासा का ही परिणाम है कि इन्होंने पालि भाषा को ही अपने स्नातकोत्तर तथा डॉक्टरेट उपाधि के लिए चयनित किया। ध्यातव्य है कि बुद्धकालीन सभ्यता-संकृति तथा विभिन्न सामाजिक स्थितियों के चित्रण एवं विवेचना हेतु पालि भाषा का सम्यक् अध्ययन तथा परिशीलन आवश्यक है। प्रस्तुत ग्रन्थ को देखने से परिलक्षित होता है कि लेखक ने पालि वाङ्मय के साथ-साथ अन्य संदर्भित कृतियों का सम्यक् अनुशीलन कर अपनी अभिव्यक्ति को साकार किया है। इसके अतिरिक्त इस कथ्य को भी में भूल नहीं सकता कि ग्रन्थकार डॉ० नरमदेश्वर कुमार इतिहास की डगर के पथिक होने के साथ ही मगही भाषा के एक सशक्त एवं सफल कवि भी हैं। बाल्यावस्था से ही कवित्व इनके रग-रग में भरा है। इनका कवित्व वर्तमान के लोक-जीवन से लेकर अतीत की गहराइयों तक सरपट दौड़ लगाती दृष्टिगोचर होता है। इनकी फुटकर कवितायें जहाँ लेखक-जीवन का सहज साकार दर्शन कराती हैं, वहीं इनका "तथागत" अतीत के सुखद, कारुणिक एवं गम्भीर प्रसंगेन का काव्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करता है। अपनी ऐतिहासिक तथा काव्य रचनाओं के कारण पालि भाषाविदों एवं मगही रचनाकारों के मध्य आप सशक्त रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित एवं समादृत हैं। इनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका सहज-सरल जिज्ञासु भाव अनायास ही मिलने जुलने वालों का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
भूमिका
प्रस्तुत पुस्तक बुद्धकालीन आर्थिक जीवन एक शोध पुस्तक है। संपूर्ण पुस्तक में बौद्धकालीन आर्थिक जीवन पर विशाल सामग्री सप्रमाण उपलब्ध है। शास्त्रों में आर्थिक जीवन को मनुस्य के पूरे जीवन का मूलाधार माना गया है। अर्थ की कसौटी पर कसकर ही किसी समय की सभ्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। सुदृढ़ आर्थिक जीवन किसी भी देश की सभ्यता को विकसित करने में सहायक सिद्ध होता है। प्रस्तुत पुस्तक उपसंहार सहित सात अध्यायों में विभक्त है। इसमें बौद्धकालीन आर्थिक जीवन के सभी पहलुओं का विस्तृत एवं वारीक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। प्रथम अध्याय विषय प्रवेश का है। इसमें पालि साहित्य के सामान्य परिचय के साथ-साथ गौतमबुद्ध और महापरिनिर्वाण, विनयपिटक, सुत्तपिटक, अभिधम्मपिटक आदि के आधार पर तत्कालीन आर्थिक स्थिति का अनुशीलन किया गया है। इस विवेचना में खोजपूर्ण सामग्रियों की प्रामाणिकता की परिपुष्टि के उपरान्त ही उन्हें विश्लेषण का आधार बनाया गया है। सामग्री-संचयन एवं सुनियोजित संतुलन एवं प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण ही इस अध्ययन का निचोड़ है। द्वितीय अध्याय में 'कृषि एवं राजस्व व्यवस्था' है। यह अध्ययन कृषि एवं कृषक, भूमि-भेद, राजस्व, अर्थदण्ड, जंगल एवं खानें, राजस्व, अनुत्तराधिकारी संपत्ति प्रभृति उपशीर्षकों के अन्तर्गत सभी संबंधित विषयों की सारगर्भित एवं तार्किक मीमांसा प्रस्तुत की गई है। चूँकि, कृषि किसान की आर्थिक जीवन की रीढ़ है, अतः कृषि एवं किसान से संबंधित सभी अपरिहार्य हो जाता है। यह अध्याय इस विषय का सांगोपांग विश्लेषण है। तीसरे अध्याय का शीर्षक है 'पुशपालन'।
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