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शिक्षा और समाज- Education and Society

$30
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Anand Tanuja
Language: Hindi Text
Pages: 180
Cover: Hardcover
9.00x6.00 inch
Weight 362 gm
Edition: 2017
ISBN: 9789384767662
BA0435
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Book Description

 

पुस्तक परिचय

'शिक्षा वह संस्था है जिसका केन्द्रीय तत्व ज्ञान का संग्रह है।' तत्वविद पी० आर० सरकार के अनुसार “शिक्षित वह है जिसने खूब सीखा है, अधिक से अधिक याद किया है और जीवन में उसका उपयोग किया है।"शिक्षा मानव जीवन को संपूर्ण रूप से आलोकित करनेवाला प्रकाशस्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। विश्व के किसी भी समाज का आदर्श उसकी शैक्षणिक-व्यवस्था एवं परंपराओं में प्रतिबिम्बित होता है। अतः समाज के किसी विशेष कालावधि की संस्कृति का ज्ञान उस समाज के शैक्षणिक परंपरा एवं शिक्षण-संस्थाओं से सहज ही प्राप्त होता है। प्राचीनकाल में शिक्षा का अपेक्षाकृत विशेष महत्व रहा होगा, क्योंकि वर्तमान की अपेक्षा उस समय उदीयमान संतति को सामाजिक परंपराओं में ढालने एवं तद्नुरूप आचरण हेतु प्रोत्साहित करने का प्रधान एवं संभवतः एकमात्र साधन शिक्षण संस्था ही थी। शिक्षा शब्द की उत्पत्ति 'शिक्ष' धातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है 'देना'।

लेखक परिचय

डॉ० आनन्द तनुजा
जन्म 08 जनवरी, 1977, मुंगेर (बिहार)
शिक्षा - एम० ए० (समाजशास्त्र) प्रथम श्रेणी, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, UGC NET परीक्षा उत्तीर्ण (2012), पी-एच० डी०, बी० एड०
प्रकाशन - विभिन्न राष्ट्रीय पत्रिकाओं में शोध-पत्र व समीक्षात्मक आलेख प्रकाशित उपलब्धि विभिन्न राष्ट्रीय सेमिनारों में शोध पत्रों की प्रस्तुति
मोबाइल न०- 9973032704
पता - कमलाकांत प्रसाद (डी० एस० पी)
विवेक बिहार कॉलोनी, (मछली तालाब के निकट) सोनू मार्केट, गोला रोड, दानापुर, पटना।

आभार

प्रस्तुत पुस्तक के लेखन में प्रेरणा के अन्यतम श्रोत श्रद्धेय डॉ० रविशंकर प्रसाद, प्रोफेसर विश्वविद्यालय समाजशास्त्र विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, डॉ० प्रमोद कुमार सिन्हा (पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय समाजशास्त्र विभाग) तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, रामू सर (मगध विश्वविद्यालय), डॉ० कृष्णवल्लभ सिंह (पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय समाजशास्त्र विभाग) ति० मां० भा० विश्वविद्यालय, प्रोफेसर डॉ० प्रेमशंकर झा के प्रति हृदय से आभार ज्ञापित करती हूँ जिनके मार्गदर्शन के बिना पूर्णता में पुस्तक लेखन दुरूह कार्य था। इसके साथ ही पुस्तकालय सहायक स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग ति० मां० भागलपुर विश्वविद्यालय डॉ० मिथिलेश कुमार यादव के प्रति भी आभार व्यक्त करती हूँ।
डॉ० गिरीश गौरव, सुमित कुमार इत्यादि के प्रति भी मैं आभार व्यक्त करती हूँ जिनसे समय-समय पर वांछित सहयोग प्राप्त होता रहा।
इस पुस्तक के लेखन में मैं अपने धर्मनिष्ठ पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद सिंह एवं ममतामयी माँ श्रीमती उर्मिला देवी के चरणों में शत-शत नमन निवेदित करती हूँ जिनका स्नेह एवं आशीर्वचन मुझे पुस्तक लिखने के दौरान प्राप्त होता रहा।
मैं अपने पति श्री कमलाकान्त प्रसाद संप्रति आरक्षी उपाधीक्षक (बिहार पुलिस सेवा) के प्रति भी आभार निवेदित करती हूँ जिनका प्रोत्साहन मुझे पुस्तक लेखन के दौरान मिलता रहा।
साथ ही साथ मैं अपनी दो संतानों अमृतराज एवं मधुमिता आनन्द को भी असीम स्नेह और धन्यवाद देना चाहूँगी क्योंकि इन्होंने पुस्तक लिखने के दौरान मुझे कभी भी परेशान नहीं किया बल्कि मुझे हर प्रकार से सहयोग प्रदान किया।

प्रस्तावना

मानव-समाज एक ओर अविभाज्य है, परन्तु इसको विभाजित करने की कुचेष्टा आत्मसुखवादियों के द्वारा तब से होती रही है जब से परिवार और समाज के निर्माण की चेष्टा का शुभांरभ हुआ। प्रागैतिहासिक युग के बाद ऐतिहासिक युग का श्रीगणेश हुआ। विद्वानों के अनुसार आर्य (अभारतीय) एवं अनार्य (भारतीय) के सम्मिश्रण के साथ ही परिवार और समाज निर्माण की नींव पड़ी। पशु-जीवन का रूपान्तरण मानव जीवन में होने लगा। मानव जीवन आदर्शाभिमुखी प्रवाह से अनुप्राणित हुआ।
विकास की लम्बी यात्रा के बाद भी आज तक एक ऐसे मानव समाज का निर्माण नहीं हो सका है जिसमें हर व्यक्ति और हर परिवार का जीना सार्थक हुआ हो। जीवन के इस दौर में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के लिए, एक परिवार दूसरे परिवार के लिए, एक समुदाय दूसरे समुदाय के लिए तथा एक राष्ट्र अन्य राष्ट्र के लिए दुख का कारण हो गया है। हर प्रकार का शोषण और अत्याचार सर्वत्र व्याप्त है। मानवता अत्याचार और उत्पीड़न से कराह रही है।
साहित्य जगत में भी दो धाराएँ चल रही हैं- एक वह धारा है जो "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय" की वाहिका है और दूसरी वह जो समाज को खंडित विखंडित कर आत्मसुख के लिए उसे दुर्बल बनाकर रखना चाहती है।
आदर्श समाज के निर्माण में शिक्षा की सर्वोपरि भूमिका है क्योंकि सुशिक्षा ही मनुष्य की पहचान है। शिक्षित का अर्थ केवल डिग्री या डिप्लोमा से युक्त व्यक्ति नहीं होता, वरन् ऐसे व्यक्तियों से होता है जो पर हितार्थ जीवन-यापन करते हुए परम तत्व को प्राप्त करने की साधना में रत रहते हैं।


 

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