लोक अनेकार्थी शब्द है। लोक साहित्य, कलाओं एवं सामान्य व्यवहार में निम्न रूप में प्रयुक्त है- लोकगीत, लोककलाएँ और लोक संस्कृति आदि।
यहाँ 'लोक' शब्द परनिष्ठित, परिष्कृत और शिष्ट का विलोम है। 'लोक' शब्द सामान्यतः साहित्य में प्रायः हाशिए के लोग के लिए प्रयुक्त होता है। कबीरदास की रचनाधर्मिता के इर्द-गिर्द लोक का ताना बुना हुआ है, इस कारण कबीर की कविता लोक की आवाज है। इन्हीं लोक की दयनीय अवस्था का चित्र खींचते हुए कबीर कहते हैं-
इब न रहूँ माटी के घर में....
छिनहर घर, छिनहर टाटी, घन गरजत, कँपे मेरी छाती।
एंटोनियो ग्राम्शी ने लोकमत का स्वरूप स्पष्ट करते हुए लिखा है कि लोकमत अनुभवाश्रित, यथार्थपरक, समयसापेक्ष और भौतिकवादी होता है।
उसमें भोलापन, सहजता और भावावेग की प्रधानता होती है। लोकमत जिन्दगी की सच्चाई है, लेकिन उसे सामाजिक सत्य का निर्भात स्रोत समझना सही नहीं है। धर्म लोकमत का महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन लोकमत केवल लोकधर्म नहीं है। 'लोकमत' का यही अवधारणा कबीर की कविता में विविध अर्थ छवियाँ प्रस्तुत करती हैं।
लोक को केन्द्र में लाने के लिए भक्तिकाव्य ने लोक को परिभाषित किया। कौन-सा लोक-समाज? जहाँ श्रमजीवी सामान्य वर्ग है जीवन संघर्ष से गुजरता हुआ। कवितावली के उत्तरकाण्ड में तुलसीदास ने निम्न वर्ग का उल्लेख किया है चांडाल, कोल, भील आदि। इसी प्रकार कबीर ने भी जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। यह कवि की अपने समय की वास्तविकता है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भक्ति आन्दोलन को भारतीय चिन्तन परम्परा का स्वाभाविक विकास मानते हैं। डा० नामवर सिंह ने इस मत की व्याख्या करते हुए लिखा है कि मध्ययुग के भारतीय इतिहास का मुख्य अन्तर्विरोध शास्त्र और लोक के बीच का द्वन्द्व है, न कि इस्लाम और हिन्दू धर्म का संघर्ष।
भक्ति आन्दोलन शास्त्रीयता का विरोध करते हुए लोकधर्म के उत्थान कां आन्दोलन है। एक तरफ लोकधर्म में उस समय के किसानों-दस्तकारों की मिली-जुली भावनाओं की अभिव्यक्ति मिलती है, वहीं दूसरी तरफ दमनकारी व्यवस्था के अमानवीय मूल्य चित्रित होते हैं। यहीं मानवीय मूल्य कबीर और अन्य निर्गुण सन्तों के काव्य का मुख्य प्रेरणास्रोत है।
कबीर की कविता की ताकत इस जिद में है कि वे कविता कर रहे हैं, ऐसे जगत में जहाँ बहुत से लोग साधु का ज्ञान नहीं, उसकी जाति ही पूछते हैं, लेकिन सपना देखते हैं ऐसे अमरदेस का जहाँ मनुष्य का मोल, उसकी जाति के आधार पर नहीं, साधना के आधार पर होगा। उनकी कविता का सपना किसी एक जाति, बिरादरी, पंथ या महजब का सपना नहीं मनुष्य के साझे चैतन्य का सपना है। कबीर इसी साझे चैतन्य के माध्यम से लोक को प्रतिस्थापित करते हैं।
कबीरदास जिस लोकधर्म का विकास कर रहे थे, उसका मुख्य लक्ष्य है 'मानुष सत्य'। वहीं 'मानुष-सत्य' संपूर्ण भक्ति आन्दोलन का केन्द्रीय सत्य है, इसलिए चंडीदास ने कहा था-
शुनह मानुष भाई
शबार उपरे मानुष सत्य ताहार उपर नाई।
कबीर को यह सत्य किसी ग्रन्थै वेद या कुरान से नहीं मिला था। वह उन्हें अपने समय और समाज के मानव जीवन के अनुभव से मिला था, इसीलिए उसे वे "अनभै साँचा" कहते हैं। कबीर यह बिना जाने कि उनसे पहले कोई बुद्ध हुआ था, वह "अनभै साँचा" के माध्यम से बुद्ध के उपदेश को दुहराते प्रतीत होते हैं। बुद्ध ने कहा था, कोई बात इसलिए न मानो कि वह किताबों में लिखी है, कि वह तुम्हारे मत के अनुकूल है, कि कहने वाला 'सुवेश' है, अधिक पढ़ा-लिखा है, वयोवृद्ध है, तुम्हारा शास्ता या श्रद्धेय है। जब तुम मर्मविवेचन से स्वयं यह जान लो कि वह जो कुछ कह रहा है, उसमें तुम्हारा ही नहीं, दूसरों का भी कल्याण है, तभी उसे मानो।
कबीर भक्तिकाल के सम्भवतः अकेले संत कवि हैं, जिन्हें हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई और बौद्ध सभी अपना मानते हैं। यही कारण है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कबीर को "मुक्तिदूत" और भारत पथिक कहा था और उन्हें राजा राममोहन राय का 'अग्र पथिक' घोषित किया था। कबीर केवल अपने युग की नई चेतना के जागरण के प्रेरणास्रोत ही न थे, वे आधुनिक भारतीय नवजागरण के अग्रदूत भी हैं।
भक्ति आन्दोलन में विरोध और असहमति के प्रतिनिधि संत कबीरदास जीवन में जातिगत, वर्गगत, धार्मिक असमानता और बाह्याचार का विरोध ही नहीं करते हैं बल्कि उनमें एकता, समानता और प्रेमभावना का भी प्रसार करते हैं। दरअसल कबीर ने लोकवादी जीवन मूल्यों और अवधारणाओं को लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न किया है। उन्होंने समाज में प्रचलित रूढ़िवादी मान्यताओं का भी खंडन किया।
ताथै कहिये लोकाचार, वेद कतेब कथ्यै व्यौहार।
वे आंख मूंदकर जनप्रचलित विश्वासों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि मानवीय मूल्यों के आधार पर मूल्यांकन करते हैं। कबीर के समय लोकधर्म के रूप में प्रचलित था कि जो काशी में मरेगा वह मोक्ष पाएगा और मगहर में मरने वाला अगले जन्म में गदहा होगा। कबीर ने स्पष्ट शब्दों में प्रचलित लोक-विश्वास का खण्डन किया। वे कहते हैं-
लोका मति के भोरा रे
जैं कासी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कहा निहोरा रे।॥ टेक ॥ तब हम वैसे अब हम ऐसे, इहै जनम का लाहा।
ज्यूं जल मैं जल पैसि न निकसै, यूं दुरि मिल्या जुलाहा ।।
राम भगति पार जाकौ हित चित, ताकौ अचिरज काहा। गुर प्रसाद साध की संगति, जग जीते जाइ जुलाहा ।।
कहत कबीर सुनहु रे संतौ, भ्रमि परे जिनि कोई। जस काली तस मगहर ऊसर, हिरदै राम सति होई।
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