वेद केवल भारत के नहीं बल्कि समूचे संसार के साहित्य में विचार मूल्यों से सर्वश्रेष्ठ और प्राचीनत्व में आद्यस्थानीय हैं। वेद चार हैंः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों की संहिताएं बाद में बनाई गयीं। तदनंतर 'ब्राह्मण' ग्रंथों की निर्मिती हुई। ब्राह्मण ग्रंथों में, याज्ञिक क्रियाओं संपन्न करते समय किस मंत्र का या मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए, वह क्यों करना चाहिये आदि का स्पष्टीकरण और यज्ञ की स्तुति की गई है। प्रत्येक वेद शाखा का ब्राह्मण होता है। प्रत्येक शाखा के ब्राह्मण के अन्तिम अंश में आरण्यक होता है अथवा आरण्यक स्वतंत्र रूप में होता है। आरण्यकों में यज्ञ विषयक जानकारी दी गई है। कुछ समय के बाद यज्ञयागों का तन्त्र इतना बढ़ा और जटिल हुआ कि वह सब ध्यान में रखना मुश्किल हो गया। सब यज्ञों की जानकारी व्यवस्थित और अनुशासनबद्ध करने के लिये, यज्ञ की क्रिया और तभी उच्चारण के मंत्र ध्यान में रखने के उद्देश्य से 'सूत्र' ग्रंथों का निर्माण हुआ। सूत्र याने धागा, कोई भी सूचना, नियम, बहुत थोड़े शब्दों में देना यह भी सूत्र का अर्थ है। जैसे अनेक तंतुओं से, ताने बाने से, वस्त्र निर्मित करते हैं वैसे अनेक सूत्रों से यज्ञ विषयक मंत्र, क्रिया इत्यादि की जानकारी एकत्रित देने वाले ग्रंथ को भी सूत्र ही कहते हैं। कोई भी विज्ञान एकत्रित और अनुशासन युक्त स्वरूप में लिखकर वह शास्त्र ध्यान में रखने के लिये सूत्र ग्रंथों की निर्मिति हुई। इस तरह के अनेक शास्त्रों के सूत्रात्मक ग्रंथ केवल भारत में ही लिखे गये हैं, वास्तव में यह पद्धति भारतीय साहित्य की विशेषता है। यज्ञविषयक सूत्रबद्ध ग्रंथ 'श्रौतसूत्र' कहलाते हैं।
वेदों के षडंगों ++ में कल्पसूत्र नाम के वेदांग में श्रौतसूत्र का अंतर्भाव करते हैं। कल्प याने नियम अथवा सूचना। कल्पसूत्र के तीन प्रमुख भाग हैं: श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। वेद के प्रत्येक शाखा का कल्पसूत्र होता है। श्रौतसूत्रों में यज्ञयागों की गृह्यसूत्रों में संस्कारों की और धर्मसूत्रों में नीति की जानकारी सूत्ररूप में दी है।
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