श्रीमद्भगवद् गीता ईश्वरों के ईश्वर पराग परब्रह्म श्रीकृष्ण की पावन वाणी होने के कारण हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र और प्रेरणादायक ग्रंथों में से एक है। प्रस्थानत्रयी में गीता जी का स्थान अग्रगण्य है। यह भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच के पवित्र संवाद का संकलन है। परमात्मा की वाणी होने के कारण इसका प्रत्येक शब्द गंगाजल से भी अधिक पवित्र, विमल, अमल एवं धवल है। इस ग्रंथ की महत्ता का इसी तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व की 578 से अधिक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। अकेले अंग्रेजी में ही इस ग्रंथ के 300 से अधिक अनुवाद उपलब्ध हैं। गीताप्रेस गोरखपुर से अभी तक 15 भाषाओं में गीता जी के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। आज भी गीता जी पर न केवल नये-नये भाष्य एवं टीकाएं लिखी जा रही हैं, अपितु सतत् रूप से नूतन अनुसंधान भी हो रहे हैं। गीता जी की दिव्यता एवं महनीयता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका अनुष्ठान, पारायण, अखंड-पाठ, प्रवचन, व्याख्या, विवेचन, भाष्य, टीका, मीमांसा, अनुवाद, अनुसंधान आदि में से किसी न किसी रूप में समूचे विश्व में कहीं न कहीं प्रतिपल अध्ययन किया जा रहा है। इसमें मानव मन की सभी जटिलताओं, समस्याओं, गुत्थियों, उलझनों, द्वन्द्वों, जीवन के मूलभूत प्रश्नों और उनके समाधानों का विस्तार से वर्णन हुआ है। गीता जी लोक चिकित्सा विशेषकर अविद्याजन्य मोह, संभ्रम एवं अवसाद सहित सभी मनोविकारों की चिकित्सा का विश्व का एक अद्वितीय ग्रंथ है। कर्म के कौशल की यह अद्भुत काव्य कृति है। इस ग्रंथ में निष्काम कर्म की दिव्य औषधि द्वारा भवरोग (सांसारिक आवागमन) की जो सरल चिकित्सा अखिल ब्रह्मांड नायक श्रीकृष्ण की वाणी में अभिव्यक्त हुई है, वह अपने आप में बेजोड़ एवं अनुपमेय होने के साथ-साथ युगों-युगों तक प्रासंगिक रहेगी। कुल मिलाकर गीता जी में दुनियां की हर समस्या का समाधान है।
ब्रह्मलीन पंडित रमेश उपाध्याय ब्रह्मनिष्ठ, श्रोत्रिय एवं संदेह निवारक एक ख्याति प्राप्त सफल आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ धर्म, दर्शन, ज्योतिष, अंक विज्ञान, तंत्र, मंत्र, कर्मकांड, धर्मशास्त्र, संस्कृत, हिन्दी, इतिहास आदि के निष्णात विद्वान थे।
आप लेखक होने के साथ-साथ एक सफल आशु कवि एवं भविष्यवक्ता भी थे। उनके द्वारा "गीतायन" नाम से गीता जी का किया गया काव्यानुवाद हिन्दी पाठकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। ऐसा इसलिए कि उपाध्याय जी द्वारा गीता जी का हिन्दी में पद्यानुवाद करने का उद्देश्य इस महान ग्रंथ की शिक्षाओं को व्यापक रूप में जन-जन तक पहुँचाना था। इस अनुवाद में पूज्य उपाध्याय जी ने गीता जी की मूल आत्मा, उसकी भावना, उसके गूढ़ रहस्यों और उसके अर्थ की स्वाभाविकता को यथावत बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया है। क्लिष्ट संस्कृत श्लोकों में गुथित जो गूढ़ ज्ञान अनेकानेक भाष्यों, टीकाओं, मीमांसाओं, व्याख्याओं, विवेचनों, प्रवचनों और अनुवादों से भी ठीक से समझ में नहीं आता है, उसे पूज्य उपाध्याय जी ने अत्यंत सरल रूप में इस पद्यानुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस अनुवाद के माध्यम से उपाध्याय जी गीता जी की शिक्षाओं को नये सिरे से अत्यंत सरल रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, जिससे पाठकों को जीवन में इनकी आवश्यकता, उपयोगिता, प्रासंगिकता, गहराई और वास्तविक अर्थ को समझने में सहायता मिल सके। मुझे विश्वास है कि यह पद्यानुवाद गीता जी के प्रेमियों और नए पाठकों दोनों के लिये न केवल परम उपयोगी सिद्ध होगा, अपितु एक मूल्यवान संसाधन भी साबित होगा। इस अनुवाद में अनुवादक द्वारा वर्तमान आपा-धापी से युक्त व्यस्ततम जीवन की तनावपूर्ण पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से न केवल उनका व्यावहारिक निराकरण प्रस्तुत किया गया है, अपितु गीता जी में निहित संदेशों को आधुनिक भाषा और नूतन शैली में समझाने का सुष्ठ प्रयास भी किया गया है। मुझे सम्यक उम्मीद है कि यह काव्यानुवाद न केवल पाठकों को गीता जी के रहस्यों को ठीक से समझने में पूर्ण सहायक सिद्ध होगा, अपितु सभी के जीवन में गुणवत्तापूर्ण सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास भी करेगा।
वैसे यह मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक सत्य है कि गद्य पंक्तियों की तुलना में काव्य पंक्तियां मन पर अधिक स्थायी और गहन प्रभाव छोड़ती हैं। जन-सामान्य और बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी काव्य पंक्तियों को आसानी से समझ लेता है। काव्य पंक्तियां जनमानस की स्मृति में दीर्घ समय तक बनी रहती हैं। यही कारण है कि भारतीय लोकजीवन में गद्य से अधिक काव्य को पढ़ा जाता है। यही कारण है कि श्रीमद्भगवद् गीता का "गीतायन" नाम से किया गया यह हिन्दी छंदानुवाद भारतीय एवं वैश्विक मानस पटल पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ सकेगा। श्रद्धेय उपाध्याय जी द्वारा किया गया यह अनुवाद साहित्य के क्षेत्र में न केवल एक उल्लेखनीय एवं प्रशंसनीय योगदान सिद्ध होगा, अपितु जनमानस इसे सरलता से हृदयंगम भी कर सकेगा।
गीता की शिक्षाओं में रुचि रखने वाले आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सामान्य पाठकों के मन पर इस पद्यानुवाद का व्यापक, सकारात्मक और स्थायी प्रभाव होगा। बहुत ही हर्ष का विषय है कि इस अनुवाद में मूल ग्रन्थ की आत्मा, भाव, अर्थ और संदेश सम्यक प्रकारेण सुरक्षित बन पड़ा है। इसके लिये प्रातः स्मरणीय मेरे सद्गुरुदेव ब्रह्मलीन उपाध्याय जी कोटि-कोटि बधाई के हकदार हैं। गुरु जी का समग्र जीवन गीता में वर्णित निष्काम कर्म, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, संन्यास, ध्यान योग, कर्तव्य पालन एवं परहित के लिए समर्पित रहा है। पूज्य गुरुदेव गीता जी की अग्रलिखित पंक्ति के जीवंत उदाहरण थे, जिसमें कहा गया है-
"शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टः अभिजायते"।
सद्गुरुदेव भगवान के श्रम सीकरों से लिखा गया यह "गीतायन" नामक पद्यानुवाद आज पुस्तक का रूप ले रहा है, इस बात की मुझे परम प्रसन्नता है। सहजता, सरलता, ऋजुता, सुगमता, स्वाभाविकता, तटस्थता, अपने सार्थक अनुप्रयोग एवं जन-मानस पर प्रभाव छोड़ने की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ काव्यानुवाद है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि "गीतायन" अपनी गुणवत्ता, सकारात्मक परिणामोन्मुखता, भाषा की सुबोधगम्यता, शैली की प्रवाहपूर्णता, सरल छंदात्मकता, विषय की स्पष्टता, व्यापक अनुप्रयोगिता एवं कर्म की कुशलता के महनीय संदेश के कारण निश्चय ही न केवल जन सामान्य पर विशद प्रभाव छोड़ेगा, अपितु उसके लिये अधिकाधिक उपयोगी, प्रासंगिक और श्रेयष्कर भी सिद्ध हो सकेगा।
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