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हे राम... हे राम... हे राम...- Hey Ram... Hey Ram... Hey Ram... (A Long Poem)

$26
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Specifications
Publisher: India Netbooks Private Limited, Noida
Author Sadashiv Kautuk
Language: Hindi Text
Pages: 125
Cover: Paperback
8.50x5.50 inch
Weight 180 gm
Edition: 2026
ISBN: 9788169624015
BA1542
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Book Description

 

 

दो शब्द


"बिछड़ गए तो क्या हुआ, दिलों से नहीं जा पाओगे। बापू ! नमन स्वीकारो, सदियों सदियों याद आओगे।"


असंभव को संभव करने वाले, उच्च विचार और चरित्र से महात्मा एवं राष्ट्रपिता कहलाने वाले, पूरे विश्व को अहिसा का संदेश देने वाले संत महात्मा गाँधीजी एक ऐसे प्रकाश पुंज है, जिन्होंने भगवान बुद्ध और महावीर के संदेश को कार्यरूप में परिवर्तित करके दुनिया को कर दिखाया है। एक समृद्ध मंत्र को चरितार्थ कर दिखाया है। सही मायने में उन्होंने यह चरितार्थ कर दिया है कि दुनिया में विचारों से बड़ी शक्ति कोई नहीं है। बड़ा से बड़ा हथियार मनुष्य को मार सकता है परन्तु विचारों को नहीं क्योंकि विचारों को मारने का हथियार आज तक नहीं बन पाया है। आज की नई पीढ़ी पठन सभ्यता से दूर होती जा रही है। मोटी-मोटी किताबें पढ़ने का किसी के पास समय नहीं है। इसलिए मैंने बापू की महानता को संक्षिप्त करते हुए कविता की चार-चार पंक्तियों में उद्धृत करने का प्रयास किया है। कविता ही एक ऐसा माध्यम है जो कम शब्दों में अधिक कह जाने का माद्दा रखती है। मैंने "हे राम हे राम-हे राम" संग्रह में बापू की अहिंसा-सच और निष्ठा को दर्शाने का प्रयास किया है। महात्मा गाँधी जी ने देश की आजादी पाने के लिए जो अहिंसक तरीका अपनाया, यह विश्व में पहला उदाहरण है वरना देवताओं ने भी हथियारों का सहारा यही बताता है कि हर राजा ने प्रत्येक योद्धा ने शस्त्रों के दम पर ही रक्त बहाकर या हत्याएँ करके ही सिंहासन या सियासत हथियाइ है। यह विश्व का पहला उदाहरण है कि बिना हथियार चलाए असहयोग-सत्याग्रह-भूख हड़ताल-अनशन आदि अहिंसक माध्यमों से बापू ने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर विवश कर दिया। उनके हथियारों के भी मुँह बंद कर दिये। उनकी क्रूरता सत्ता के मद को मोम की तरह पिघला कर नरम कर दिया। उन्हें अहसास हो गया कि गाँधीजी की आवाज अब अकेली नहीं है, उनकी आवाज गाँव-गाँव-शहर-शहर-गली-गली में गूंजने लगी है, जिसे अनसुना करना अब हथियारों के बस की बात नहीं है। इसीलिए अंग्रेजों की बंदुकों का मुँह बन्द हो गया था। अंग्रेजों के हौसले परास्त हो गए थे।


देश के करोड़ों लोगों की आवाज बंदूक-बम-गोला-बारूद पर भारी पड़ गई थी। गाँधीजी एक तूफान बन चुके थे। हर धर्म-हर विचारधारा और हर वर्ग का व्यक्ति बापू के विचारों से प्रभावित था। सारे लोग उनके परिवारों की चिन्ता छोड़कर गाँधीजी के साथ हो चले थे। गाँधी के काफिले में न कोई छोटा था, न कोइ बड़ा, न कोई नीचा था, न कोई ऊँचा। सबका एक ही धर्म था, एक ही उद्देश्य था वह था आजादी आजादी आजादी। हमारा स्वराज हो, हमारी धरती हमारे देश पर हमारा राज हो। बापू के विचारों से पूरा विश्व प्रभावित हुआ। इसीलिए विश्व में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हजारों प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। देश के हजारो लाखों लेखकों और विचारकों ने गाँधीजी पर एक लाख सात हजार किताबें लिखी गई है एवं विश्व के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते हैं एवं पूरे विश्व में उनके लाखों अनुयायी एवं उन्हें चाहने वाले प्रशंसक हैं। बापू ने अपने विचार थोपने का कभी प्रयास नहीं किया। जितना भी विश्व भर में आभा मण्डल है वह स्वतः स्वाध्याय पूर्ण है। आज भी हमारे देश के प्रधानमंत्री हो, राष्ट्रपति हो, बड़े पदों पर पदासीन हों, विदेश से आने वाले राष्ट्र नायक हो या कोई भी बड़ी शख्सियत हो भारत आने पर बापू की समाधि पर माथा टेकने जरूर आते हैं। हम अनुमान लगा सकते हैं कि गाँधीजी के विचारों में कितनी ताकत थी और आज भी है। यह हमारा सौभाग्य है कि साधारण मनुष्य से महात्मा बने और हमारी पवित्र धरा पर जन्म लिया। हर नौजवान ने बापू को पढ़ना चाहिए। बापू के विचारों का अनुसरण करना चाहिए। जिससे हमें अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा मिलती है। जीवन की पगडंडियों पर कदम दर कदम प्रकाश मिलता है। आज बारूद पर बैठी हुई दुनिया के सरपंचों को बापू के संदेश की बहुत-बहुत आवश्यकता है। आज-मानवता पर बड़ा खतरा मँडरा रहा है। हर देश हथियारों से शक्ति संपन्न होने के लिए बेतहाशा दौड़ लगा रहा है। सियासती महात्वाकांक्षाएँ बढ़ रही है। मनुष्य की जिन्दगी को कुछ नहीं समझा जा रहा है। ऐसे संकट ग्रस्त खतरनाक समय में बापू के विचारों से रूबरू होने की आज सख्त ज़रूरत है। समाज में भेदभाव-जात-पात, ऊँच-नीच गरीब अमीर आदि पनप रही विसंगतियों पर नियंत्रण पाने के लिए हमें बापू के फॉर्मूले को ही अपनाना चाहिए। हमारे देश की अखण्डता के लिए बापू ही एक ऐसी पुड़िया है, जो रोगी को रोग मुक्त कर सकती है।


मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि मुझे माँ शारदा ने आदेश दिया कि मैं भी एक साहित्यकार के नाते इस महान यज्ञ में समिधा आहुत करूँ। मुझे पता नहीं मैं बीते जन्म में क्या था। यदि में पिछले जन्म में भारत भू पर जन्मा होता तो निष्चित की बापू के आन्दोलन में मैं उपस्थित रहता या यह भी हो सकता है कि शायद मैं उनकी टोली में रहा होऊँ। मैं आशा करता हूँ कि मेरे इस छोटे से प्रयास से बापू के प्रति आपके मन में कोई अंकुरण हो, तो मैं अपने को भाग्यशाली समहूँगा। मुझे अपने साहित्यकार की इस लम्बी कविता पर समाज के कुछ शुभचिंतकों, गाँधीवादी विचारकों ने जो सकारात्मक और बेबाक विचारों से मेरा मनोबल बढ़ाया है। मैं उनका हृदय से आभारी हूँ। सर्वश्री डॉ. प्रताप सिंह सोढ़ीजी, श्री अनिल त्रिवेदीजी, श्री चन्द्रकांत झटाले जी (अकोला), श्री चिन्मय मिश्र जी, श्री श्रीधर बर्वे जी, डॉ. पुष्पेन्द्र दुबे जी, श्री राहुल निहोरे जी, श्री सुरेश पटेल जी एवं श्री शशिकांत गुप्ते जिन्होंने मेरे निवेदन को स्वीकार कर अपना अमूल्य समय दिया और इस लम्बी कविता पर दृष्टि डालकर मुझे उपकृत किया। मेरा इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है।

 

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