यह वही प्रसन्नता की बात है कि मेरे मित्र डॉ० दशरथ श्रीभा की यह महत्व-पूर्ण पुस्तक 'हिन्दी नाटक उद्भव और विकास' प्रकाशित हो रही है। पुस्तक मूल रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय की पी० एच-डी० उपाधि के लिए निवन्ध-रूप में प्रस्तुत की गई श्री। विश्वविद्यालय ने सन्तुष्ट होकर उन्हें यह उपाधि प्रदान की। जब यह बृहत्तर पाठक-समाज के सामने आ रही है। ओझाजी संरकृत और हिन्दी के गम्भीर विद्वान् है। केवल विद्वान् ही नहीं, रब-नात्मक रस-साहित्य के निर्माता भी है। उन्होंने कई उत्तम नाटक लिखे हैं। वे दीर्घकाल मे हिन्दी और संस्कृत साहित्य का अध्यापन करते रहे हैं। उनके अध्ययन और अनुभव, दोनों ही व्यापक हैं। परन्तु इन सबके ऊपर है ओझाजी का शील और सौजन्य । विद्या और शील के मणिकांचन योग ने उनके व्यक्तित्व को अद्भुत गरिमा दी है। उनके दुर्बल पशरीर में जो कल्पों और उपवासों से प्रतिवर्ष कुछ और क्षीण हो जाया करता है- विचित्र कार्यकारी क्षमता है। सबकी सहायता करने को प्रस्तुत, सबके लिए सदा कुछ न कुछ करने को बद्ध-परिकर ! प्रस्तुत पुस्तक में ओझाजी ने हिन्दी नाटकों की दीर्घकालीन परम्परा और उनकी विशाल पृष्ठभूमि का अध्ययन किया है। यद्यपि हिन्दी में नये ढंग के बहुत नाटक हाल में जिसे जाने लगे हैं, परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि हिन्दी नाटकों की परम्परा नई शुरू हुई है। हिन्दी के लोकनाट्य की परम्परा बहुत पुरानी है। संस्कृत-साहित्य से हम उसके अंश-मात्र से परिचित हो सकते हैं परन्तु पूरी लोक-परम्परा का ज्ञान हमें उस साहित्य के द्वारा नहीं हो सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि संस्कृत के साहित्यकार लोक-परम्परा के बहुत-से रूपकों और उपरूपकों का भी आकलन अपने ग्रन्थों में कर लेते थे- कई रूपक-भेदों के तो उदाहरण भी संस्कृत-साहित्य में नहीं मिलते, क्योंकि मूलतः वे लोकप्रचलित मनोरंजन-मात्र थे परन्तु फिर भी उससे पूरी लोक-परम्परा का ज्ञान नहीं होता, केवल इरा प्रकार की विशाल परम्परा का आभास मात्र मिल जाता है। ओझाजी ने परिश्रम के साथ उन संकेतों को ढूंढ़ा है और प्राकृत, अपभ्रंश आदि पूर्ववतीं और बंगला, गुजराती आदि पार्श्ववर्ती साहित्यों में पाए जानेवाले संकेतों के आधार पर प्राचीन नाटकीय 'परम्परा के छिन्न सूत्रों को खोज निकालने का प्रयास किया है। रास-लीला के उद्भव और विकास का उन्होंने नवीन रूप में अध्ययन किया और महत्त्वपूर्ण निष्कर्षों पर पहुंचे हैं। हिन्दी नाटकों के विकास के अध्ययन के लिए जिस प्रकार पुराने साहित्य के इंगित सहायक हैं, उसी प्रकार लोक-परम्परा के अनेक मनोरंजन नाट्यरूप भी सहायक है। ओझाजी ने सावधानी से दोनों परम्पराओं के सम्भावित प्रभावों के अध्ययन का प्रयास किया है। बिलकल आरम्भिक हिन्दी-नाट्य-परम्परा के सम्बन्ध में ओझा जी का कहना है कि : "तेरहवीं शताब्दी में एक ओर तो कण्हप-काल से चली आने वाली स्वांग की नाट्य-परम्परा थी, जिसके नाटक डोम और डोमिनियों द्वारा अभिनीत होते थे, दूसरी परम्परा रास की थी, जिसका अभिनय बहुरूपिए अथवा जिन-सेवक किया करते थे। पहली परम्परा समाज में उतनी समावृत न थी, जितनी दूसरी। यह दूसरी परम्परा ही मध्यमवर्ग और धार्मिक जनता का मनोरंजन तथा रुचि का परिमार्जन कर रही थी। बहु-रुपियों द्वारा नाटकों का अभिनय मन्दिरों के बाहर होता था, किन्तु जैन-मन्दिरों में अभिनयकर्ता जैन धर्म के सेवक हुआ करते थे। प्रमाण के लिए 'जम्बूस्वामी चरित' का उद्धरण देखिए- "बंचरिय बांधि विरहउ सरसु, गाहज्जइ संतिउ तारू जसु, नच्चिज्जइ जिणाजय सेवकहि, किउ रासउ अम्बादेव यहि । " इस उद्धरण से यह ज्ञात होता है कि अम्बा देवी रास का अभिनय जिन-सेवकों के नृत्य द्वारा प्रदशित किया जाता था। इस काल के लगभग चार सौ रास ग्रन्य उपलब्ध हो चुके हैं, जिनके परिशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इनका कथानक होता था- " (1) धार्मिक, (2) ऐतिहासिक, (3) पौराणिक, (4) आध्यात्मिक, (5) नैतिक, (6) लौकिक प्रेम-सम्बन्धी । "उपर्युक्त विभाग कथानक की दृष्टि से किया गया है। वस्तु-विभाग की दृष्टि से निम्नलिखित भेद किए जा सकते हैं- (1) धार्मिक, (2) ऐतिहासिक, (3) पौराणिक, (4) आध्यात्मिक, (5) नैतिक, (6) लौकिक प्रेम-सम्बन्धी । "उपर्युक्त विभाग कथानक की दृष्टि से किया गया है। वस्तु-विभाग की दृष्टि से निम्नलिखित भेद किए जा सकते हैं- "(1) एकांकी, (2) दो अधिकार के नाटक, (3) दो से अधिक खण्डों के नाटक, (4) मुख्यतः पाठ्यरास । " इन ग्रंथों में जो पद्धति सर्वत्र समान रूप से पाई जाती है, वह है संगीत की । सभी रास विविध छन्दों में राग-रागिनियों के निर्देशन के साथ मंगलाचरण और प्रशस्ति- समन्वित हैं। आश्चर्य तो यह है कि यही पद्धति बंगाल में प्रचलित यात्रा-नाटकों में, महा-राष्ट्र में अभिनीत दशावतारी नाटकों में तथा गुजरात में प्राप्त भवाई नाटकों में भी विद्यमान थी। ऐसा प्रतीत होता है कि देश का जनमत उस काल में गद्य की अपेक्षा संगीतमय काव्य के पक्ष में अधिक था। यद्यपि किसी-किसी रास में रंगमंच-निर्देश गद्य में मिलता है, किन्तु ऐसे स्थल नगण्य हैं।" हिन्दी-नाट्यकारों में ओझाजी ने विशेष रूप से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और प्रसादजी का अध्ययन किया है। सहृदय पाठक देखेंगे कि इस क्षेत्र में ओझाजी की दृष्टि में भी स्वकीयता है और नई सूचनाएं भी उन्होंने दी हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के वारे में अपनी आलोचना का उपसंहार करते हुए वे लिखते हैं: "भारतेन्दुजी के एक-एक नाटक का हम विस्तृत विवेचन कर आए हैं।
"इतना कहने में कोई संकोच नहीं कि प्रथम बार इतनी विशाल पृष्ठभूमि पर रखकर हिन्दी के नाटक देखे और जाँचे गए हैं। मेरा विश्वास है कि इस पुस्तक से हिन्दी नाटकों के अध्ययन को बहुत बल मिलेगा और यह हिन्दी-संसार के विद्यार्थियों के द्वारा आदर-सम्मान प्राप्त करेंगी। हिन्दी में लोक-नाट्य की परम्परा बहुत पुरानी है। ओझा जी ने परिश्रम के साथ प्राकृत, अपभ्रंश आदि पूर्ववर्ती और बंगला, गुजराती आदि पार्श्ववर्ती साहित्य में पाए जाने वाले संकेतों के आधार पर प्राचीन नाटकीय परम्परा के छिन्न सूत्रों को खोज निकालने का प्रयास किया है।"
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