पुस्तक परिचय
भारत में पत्रकारिता की शुरुआत हुए तीन सौ से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच इसने अनेक पड़ावों को पार किया। ब्रिटिश उपनिवेश काल में छपने वाले समाचार पत्र पहले-पहल इंग्लैंड से ही छपते थे और उनमें स्वदेश की खबरें छापने की मनाही थी। शायद इसका एक कारण यह था कि भारत समेत तमाम उपनिवेश ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उसके विस्तार और विजय का द्योतक थे जबकि स्वयं उनके अपने देश की स्थितियाँ तमाम विपर्यासों और अंतर्विरोधों से भरी हुई थीं। बहरहाल, एक लंबे समय के बाद पत्रकारिता के सरोकार उन मामलों तक पहुँचने लगे जो किसी देश, समाज, संस्कृति और राजनीति के आधारभूत घटक थे। हिन्दी पत्रकारिता में उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी का पूवार्द्ध विशेष महत्त्व रखता है। यही वह दौर था जब पत्रकारिता ने ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्ति में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बाबू बालमुकुंद गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, बालकृष्ण गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बनारसीदास चतुर्तदी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक यशस्वी पत्रकार इसी दौर में पैदा हुए। आजादी के बाद भारतीय हिन्दी पत्रकारिता का स्वर बदलने लगा। प्रिंट मीडिया के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व्यावसायिक घरानों के हाथों में चली गई। आज अपने एक लम्बे इतिहास के उतार-चढ़ाव भरे अध्यायों से गुजरने के बाद पत्रकारिता के समक्ष सामाजिक सरोकारों और व्यावसायिकता का एक गहरा द्वंद्व उपस्थित हो गया है। यह पुस्तक इन्हीं पत्रों पर दृष्टिपात करती है।
लेखक परिचय
डॉ. चेतन अरविंद मिश्र का जन्म 18 दिसम्बर, 1972 को इन्दौर (मध्य प्रदेश) में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में हुई, तत्पश्चात उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। अपना पत्रकारीय जीवन डॉ. चेतन ने प्रिंट मीडिया से शुरू किया। उन्होंने नई दुनिया के भोपाल संस्करण में कई वर्ष तक संवाददाता के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने 'ग्रामीण समाज में पत्रकारिता की भूमिका एवं हिन्दी में ग्रामीण पत्रकार' विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
भूमिका
भारत में पत्रकारिता की शुरुआत हुए तीन सौ से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। इस बीच इसने अनेक पड़ावों को पार किया। ब्रिटिश उपनिवेश काल में छपने वाले समाचार पत्र पहले-पहल इंग्लैंड से ही छपते थे और उनमें स्वदेश की खबरें छापने की मनाही थी। शायद इसका एक कारण यह था कि भारत समेत तमाम उपनिवेश ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उसके विस्तार और विजय का द्योतक थे जबकि स्वयं उनके अपने देश की स्थितियाँ तमाम विपर्यासों और अंतर्विरोधों से भरी हुई थीं। बहरहाल, एक लंबे समय के बाद पत्रकारिता के सरोकार उन मामलों तक पहुँचने लगे जो किसी देश, समाज, संस्कृति और राजनीति के आधारभूत घटक थे। हिन्दी पत्रकारिता में उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी का पूवार्द्ध विशेष महत्त्व रखता है। यही वह दौर था जब पत्रकारिता ने ब्रिटिश उपनिवेश से मुक्ति में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बाबू बालमुकुंद गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, बालकृष्ण गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, बालकृष्ण भट्ट, बनारसीदास चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक यशस्वी पत्रकार इसी दौर में पैदा हुए। आजादी के बाद भारतीय हिन्दी पत्रकारिता का स्वर बदलने लगा। उनके सामने एक विकासवादी मॉडल था जिसके इर्द-गिर्द उसे घूमना था। धीरे-धीरे पत्रकारिता औद्योगिक और व्यावसायिक घरानों के हाथों में चली गई। प्रिंट के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकल्प ने इस गिरफ्त को और मजबूत किया।
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