बौद्धधर्म श्रमण विचारधारा से संबद्ध एक मानवतावादी धर्म है जिसके संस्थापक तथागत गौतमबुद्ध ने छठी शताब्दी ई.पू. में अहिंसा और करुणा के सिद्धान्तों की महासरिता का उद्भावन किया और सांसारिक दुःखों से संतप्त जन सामान्य को चतुरार्यसत्य तथा प्रतीत्य समुत्पाद जैसे सकारात्मक दर्शन देकर उसे अन्धकाराच्छन्न महापथ पर नई ज्योति प्रदान की। कालान्तर में हीनयान और महायान जैसे सम्प्रदायों में वह विभक्त हुआ और पालि के साथ संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी प्राच्य भारतीय भाषाओं में अपार साहित्य का सृजन हुआ। चीनी, तिब्बती आदि भाषाओं ने भी इस बौद्ध साहित्य को सुरक्षित रखने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
बौद्धधर्म का पालि साहित्य थेरवादी परम्परा से संबद्ध है। उसके त्रिपिटक और त्रिपिटक पर रचित अट्ठथाओं, टीकाओं, अनुटीकाओं, वंस, व्याकरण, काव्य आदि विविध विधाओं के ग्रन्थ सांस्कृतिक सामग्री से आपूर हैं। भाषाविज्ञान, इतिहास, भूगोल, दर्शन, संस्कृतिक, साहित्य आदि जैसे शैक्षणिक क्षेत्रों में शोधकार्य के लिए इसमें वहुत सम्भावनायें सन्निहित हैं।
प्रोफेसर डॉ. भागचन्द्र जैन हमारे सन्मति प्राच्य शोध संस्थान के मानद निदेशक हैं। वे जैनदर्शन के साथ ही बौद्धदर्शन और पालि-प्राकृत, संस्कृत और पुरातत्त्व के भी निष्णात विद्वान हैं। अनेक विश्वविद्यालयों में कार्यरत रहे प्रोफेसर जैन को 2004 ई० में इस क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
आशा है, विद्वज्जगत् और छात्र जगत् के लिए यह पुस्तक निश्चित ही रुचिकर और उपयोगी होगी।
पालि प्राकृत का ही एक प्राचीनतम रूप है जो मगध की बोली के रूप में प्रचलित रहा है। तथागत बुद्ध ने इसी बोली में अपना उपदंश दिया था। कालान्तर में बौद्धधर्म ने अपने पैर फैलाए और वह थाईलैण्ड, श्रीलंका, बर्मा, कंबोडिया, लोऑस, इण्डोनेशिया, जावा, बाली, वियतनाम, चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, नेपाल, मंगोलिया आदि देशों में एक लोकप्रिय धर्म के रूप में स्थिर हो गया। इसलिए इन सभी देशों में पालि साहित्य भी रचा गया।
अभी तक पालि साहित्य का इतना विस्तृत अध्ययन नहीं हुआ। डॉ. भागचन्द्र जैन ने अपना समूचा जीवन पालि, प्राकृत और संस्कृत साहित्य के लेखन में लगा दिया। वे एक खोजी विद्वान हैं। उन्होंने पालि भाषा और साहित्य का गम्भीर अध्ययन कर समग्र रूप से इसे प्रस्तुत किया है जिसका प्रकाशन न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, नई दिल्ली की ओर से हो रहा है। आशा है, विद्वज्जगत् और छात्र जगत् के लिए यह पुस्तक हर दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होगी। इसलिए हम भाई सुभाषचन्द्र और दीपक कुमार जैन के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे। वे एक लोकप्रिय प्रकाशक हैं जिन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य को प्रकाशित कर भारतीय साहित्य और संस्कृति की अमूल्य सेवा की है।
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