इतिहास शब्द का सन्धिविच्छेद करें तो यह 'इति+ह+आस' के रूप में परिवर्तित हो जायेगा, जिसका अर्थ होगा- इति ऐसा, ह निश्चय से आस था। अर्थात् निश्चयपूर्वक ऐसा था। परन्तु सदियों और सहस्राब्दियों से काल के गर्भ में समाहित हो जाने के कारण इतिहास की इस परिभाषा पर पूर्णरूपेण हम खरे नहीं उतर पाते हैं। पुनरपि तथ्याधारित और सटीक अनुमान के आलोक में वास्तविक इतिहास के गर्भगृह में छिपी हुई उन वास्तविकताओं के निकट हम पहुँच सकते हैं, जो कालकवलित होकर भी हमारा मार्गदर्शन कर सकती हैं। लेकिन यह तभी सम्भव है, जब घोर परिश्रम और तपस्या से लेखक का ज्ञानचक्षु खुल गया हो। 'पुनिया गोत्र' पर लिखी इस पुस्तक के लेखक विद्वान् इतिहासकार महीपाल आर्य इस कसौटी पर सर्वात्मना खरे उतरते हैं। उन्होंने जो कुछ लिखा है वह सप्रमाण, गहन चिन्तन, गम्भीर शोध और महनीय गवेषणा तथा घोर परिश्रम पर आधारित है।
इनके अग्रज भ्राता स्व. प्रताप सिंह शास्त्री पत्रकार जी ने 'जाट इतिहास' समकालीन सन्दर्भ लेखन का जो अद्भुत कार्य किया था, उसको परिवर्धित, संशोधित और परिष्कृत करके प्रकाशित करने के लिये शास्त्री महीपाल आर्य अत्यधिक प्रशंसा और बधाई के पात्र हैं। उनके ग्रन्थ 'जाट इतिहास' (समकालीन सन्दर्भ) जाट गोत्रावली, जाट वंशावली के दोनों भागों को मैंने आद्योपान्त पढ़ा है। इससे पूर्व किसी भी इतिहासकार ने जाट समाज के इतने अधिक गोत्रों को इकट्ठा कर उनके निकास, उनके इतिहास, उनकी वर्तमान में अवस्थिति और उनके प्रमुख व्यक्तियों का उल्लेख कहीं ओर नहीं मिलेगा। साथ ही इन्होंने लगभग सभी खाप पंचायतों के इतिहास पर भी 'सर्वखाप के बलिदान' का इतिहास लिखकर बहुत प्रकाश डाला है।
प्राचीन काल में खाप पंचायत के रूप में गण तथा संघ-परम्परा थी। उससे भी पहले वैदिक काल में 'सभा और समिति नाम की दो संस्थायें थी। वे भी गण और खाप पंचायतों की तरह पूर्णतया लोकतांत्रिक तरीके से समाज में प्रतिष्ठित थी, और इसी के अनुरूप लोक में व्यवस्था करती थी। गाँव सबसे छोटी इकाई होती थी और ग्रामणी उसका मुखिया होता था। आज उसको प्रधान या सरपंच कहा जाता है। महीपाल आर्य जी ने "जाट इतिहास" पुनिया गोत्र के इतिहास पर जो कुछ लिखा है, वह महाभारत काल से भी पूर्व काल के इतिवृत्त का प्रतिनिधि है, जो उत्तर वैदिक काल तथा प्रातिशाख्य (अर्थात् तत्तत्, उस-उस शाखा से सम्बन्ध रखने वाला शास्त्र अथवा अध्ययन) समय में सजीव था। विस्तारभय से उसको उद्धृत करना अभीष्ट नहीं है। उसको सप्रमाण बाद में अन्यत्र लिखा जायेगा।
यहाँ यह लिखना सार्थक तथा समीचीन होगा कि महाभारत उसके उपरान्त प्रसिद्ध वैय्याकरण शाकटायन तथा पाणिनी (8वीं, 9वीं सदी ईशा पूर्व) ने भी गणों का नामोल्लेख पूर्वक स्पष्ट उल्लेख किया है। ग्रीक लेखकों के अनुसार सिकन्दर के आक्रमण के समय पश्चिमी भारत में यौधेय, कठ, क्षुद्रक, मालव, अम्बष्ठ, शिवि, पत्तल और सोभूति आदि गण थे। यौधेयों का गणराज्य इनमें सबसे बड़ा था। इस गण में क्रोशेय, धार्तेय, ज्यावानेय, त्रिगर्त, भरत, उशीनर और वार्तेय आदि गण भी सम्मिलित थे। इन्हीं गणों की सिकन्दर से हुई लड़ाई का वर्णन भी आपको इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा। शिवि गण में सम्मिलित पुनिया गोत्र बहुसंख्यक है तथा इनकी वीरता की गाथा जग-जाहिर है। अन्तिम श्वास तक पुनिया क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। उपरोक्त इन्हीं गणों में से हमारे समाज के बहुतेरे गोत्र निकले हैं।
जाट समाज के वर्तमान में लगभग साढ़े चार हजार गोत्र हैं। कभी समय था, जब हमारे पूर्वज मध्य एशिया के बड़े भू-भाग पर भी शासन करते थे। वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण जी. सम्राट् हर्षवर्धन, सम्राट् यशोधर्मा आदि हमारे समाज के वीर चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं, जिनका इतिवृत्त आप महीपाल आर्य व तेजपाल फोगाट द्वारा लिखित "आर्यावर्त के महानायक" पुस्तक में पढ़ सकते हैं।
आजादी के समय विभाजन की विभीषिका झेलकर जो खुखरायण भाई इधर आये उनमें दस भाई ऐसे हैं, जो चढ्ढा, सेठी, कोहली, साहनी, आनन्द, घई, भसीन, सभ्रवाल (सम्भरवाल) आदि के उपनाम से जाने जाते हैं। इन्होंने ही मुहम्मद गजनी (गजनवी) को हराकर गजनी की राजगद्दी पर बैठकर पर्याप्त समय राज किया था। लाहौर की गद्दी पर रामलाल जाट ने शासन किया, उसका गोत्र भी खोखर (खुखरायण) था। सुखरायण और खोखर एक दूसरे के पर्याय हैं। खोखरों ने खोखराकोट-रोहतक में मुहम्मद गौरी को हराकर उसका सब कुछ लूट लिया था। लगभग दो दशक पूर्व पाकिस्तान का हाई कमीश्नर मोहम्मद रियाज खोखर भारत आया था। इस समय वियतनाम में पाकिस्तान का राजदूत भी खोखर ही है। हरियाणा में आज भी दो गाँव कन्सोला और श्यामड़ी (एकपाना) खोखरों का है। इस गोत्र के 40 गाँव बागपत के आसपास हैं। पाकिस्तान में बहुतेरे लोगों ने अपना मजहब तो बदल लिया, लेकिन अपने नाम के साथ आज भी अपने गोत्र या उपनाम गर्व से खोखर ही लगाते हैं। अधिक क्या कहें अनेकों गण-गोत्र जो जाटों से ताल्लुक रखते हैं, बलिदानी इतिहास है। इसी प्रकार पुनिया गोत्रीय लोग बहुत प्राचीन हैं। इन्होंने भी विदेशी आक्रान्ताओं से टक्कर ली है। ये लोग शिवि गण (संघ) के अंग थे। सिकन्दर के आक्रमण के बाद पुनिया क्षत्रिय जन राजस्थान में चले गए तथा वहाँ इन्होंने कई वर्ष शासन किया। इससे पूर्व इनकी स्थिति ऋषिकेश, हरद्वार तथा पूना आदि में देखी जा सकती है। जगत ग्राम में प्राप्त शिलालेख इनकी शासकीय होने की पुष्टि प्रदान करता है। महाराजा, सूरजमल, महाराजा जवाहर सिंह की सेना में भी इन्होंने अपने अप्रतिम शौर्य का परिचय दिया था। महारानी तोमरिस दहिया और साईरस के बीच हुए युद्ध में इन्होंने तोमरिस दहिया को विजित करवाने में अपना बलिदान दिया था। राजस्थान में बीका राठौर के आने से पूर्व जाटों की मुख्य सत्ता उत्तरी-पूर्वी इलाके पर थी, जहाँ सात बड़े राज्य थे। उनमें गोदारा, पुनिया, सिहाग, सारण, बेनीवाल, सोहुवा, कसवां प्रमुख थे। जिन्होंने आपस में लड़कर अपने राज्य समाप्त कर लिये। छठी शताब्दी ई. से पूर्व पुनिया तथा तोखर गोत्रीय जाट मध्य एशिया और यूरोप में थे। जहाँ इन्होंने लगभग 500 वर्ष तक शासन किये जाने की इतिहासकारों ने पुष्टि की है। कालान्तर में अन्य जाट समुदायों की भान्ति पुनः भारत में वापिस भी लौटे हैं। ये लोग भारत के उत्तरी-पश्चिमी दरों से भारत में प्रविष्ट हुए थे। यही कारण है आज भी इनकी अच्छी-खासी उपस्थिति देखी जा सकती है।
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