पश्चिम के राजनीतिक विचारकों ने आज की सभ्यता के मूल्यों और राजनीतिक व्यवस्थाओं को जन्म दिया है। इन महान् चिन्तकों की दार्शनिक उपलब्धियाँ आज के बुद्धि-जगत् को सुरक्षित रखनी हैं ।
माध्यम की कठिनाई के कारपा आज की युवा पीढ़ी इस ज्ञान-भण्डार का उपयोग करने में अपने को अशक्त पा रही है। विश्वविद्यालयों के शिक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे द्विभाषी होने के कारण संक्रमण की इस समस्या को अच्छी स्तरीय पाठ्य-पुस्तकों द्वारा पूरी करेंगे ।
प्रस्तुत पुस्तक हिन्दी माध्यम से इसी दिशा में एक अच्छा प्रयास है। लेखक का परिश्रम सफल रहा है। उनकी शैली पुस्तक को बोधगम्य बनाती है । आशा है डॉ. प्रभुदत्त शर्मा का यह प्रयास हिन्दी माध्यम के नए लेखकों को प्रेरणा दे सकेगा ।
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