<center><b>लेखक परिचय-1</b></center> भारतीय ज्ञान परम्परा, हाइब्रिड वॉरफेयर, सभ्यतागत संचार और रणनीतिक संचार डॉ. रविंद्र सिंह की विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं। 'संचार की भारतीय परम्परा' को पहचानने और परिभाषित करने में इनकी महती भूमिका रही है। इनका जन्म हिमाचल प्रदेश के नूरपुर की कोपड़ा पंचायत में हुआ। इनकी पढ़ाई डिग्री कॉलेज धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्र धर्मशाला और राजस्थान के जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं से सम्पन्न हुई। यह चर्चित किताब 'स्वामी विवेकानंद की संचार नीति' के लेखक और 'हिमाचल प्रदेश के जनजातीय समुदाय : इतिहास, संस्कृति एवं संचार' के सह-संपादक हैं। संचार से सम्बन्धित विषयों पर उनके 15 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इनके पास पत्रकारिता और अकादमिक जगत् का एक दशक से अधिक का अनुभव है। उन्होंने 2013 से लेकर 'दिव्य हिमाचल', हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के 'लाइव हिंदुस्तान', 'संवादसेतु', 'अमर उजाला', 'पंजाब केसरी' समाचार पत्र में रिपोर्टिंग और सम्पादन कार्य किया है। अमर उजाला में पत्रकारिता के दौरान धर्मशाला से इन्होंने निर्वासित तिब्बती सरकार और दलाईलामा से संबंधित विषयों पर रिपोटिंग की। 2023 में इन्होंने सोलन स्थित आईईसी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में सहायक आचार्य और विभागाध्यक्ष के रूप में सेवाएँ दीं। हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के जनजातीय अध्ययन केन्द्र में रिसोर्स पर्सन के रूप में सेवाएं प्रदान की हैं। वर्तमान में आप भारतीय जन संचार संस्थान, जम्मू में सहायक आचार्य के रूप में सेवारत हैं।<p>
<center><b>लेखक परिचय-2</b></center> हरिओम कोचर वर्तमान में अखण्ड भारत की परिकल्पना को ध्यान में रखकर जम्मू कश्मीर में आतंकवाद, इंसजेंसी, और काउंटर इंसजेंसी के विषयों पर केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश में शोध कार्य कर रहे हैं। वे महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज में स्नातकोत्तर हैं और इस विषय में प्रतिष्ठित नेट जे. आर.एफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं। इनके शोध पत्र कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी विशेषज्ञता विशेष रूप से आतंकवाद, युद्ध रणनीति और सुरक्षा अध्ययन के क्षेत्र में है, और वे इस विषय पर गहरी समझ और अकादमिक दृष्टिकोण रखते हैं। वर्तमान में, वे जम्मू कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद और काउंटर इंसजेंसी से संबंधित विषयों पर विस्तृत शोध कार्य कर रहे हैं, जो न केवल भारत बल्कि वैश्विक सुरक्षा पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। उनकी प्रतिवद्धता और ज्ञान के प्रति निष्ठा ने उन्हें एक प्रमुख शोधकर्ता के रूप में स्थापित किया है, और वे भविष्य में इस क्षेत्र में और अधिक उल्लेखनीय कार्य करने की दिशा में अग्रसर हैं।<p>
<center><b>प्रस्तावना</b></center> तिब्बत भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट का काम करता है। इतिहास में वह समय भी आया था, जब तिब्बत की सेना ने चीन के एक हिस्से पर भी कब्जा कर लिया था। समझौते के लिए चीन के राजा को तिब्बत के राजा के साथ अपनी बेटी की शादी करनी पड़ी। तिब्बत ऐसा देश है, जिस पर किसी दूसरे देश ने अपना आधिपत्य नहीं जमाया। अलबत्ता चीन और तिब्बत आपस में लड़ते रहते थे। परिणाम 'चित भी मेरी और पट भी मेरी' वाला कभी नहीं रहा। कभी चीन जीता, कभी तिब्बत जीता। तिब्बत और मंगोलिया द्वारा यदा-कदा चीन पर होने वाले आक्रमणों से घबराकर ही चीन ने अपनी सीमा पर एक बहुत मोटी दीवार ही बना ली थी। वह दीवार अब भी विद्यमान है और उसे दुनिया के अजूबों में गिना जाता है। तिब्बत महात्मा बुद्ध के रास्ते का पथिक है। जब भारत पर एटीएम यानि अरब, तुर्क और मुगलों के हमले शुरू हुए और उन्होंने यहां के विश्वविद्यालयों के ग्रन्थालय जलाने शुरू कर दिए, तो तिब्बत के बौद्ध भिक्षु यहां से पांडुलिपियों को बचाने के लिए तिब्बत में ले गए थे। उन्होंने इन ग्रन्थों का वहां भोटी भाषा में अनुवाद किया। तिब्बत के इन ज्ञान अनुरागी भिक्षुओं के कारण ही बहुत सी पांडुलिपियां नष्ट होने से बच गईं। तिब्बत पर संकट तब शुरू हुआ, जब चीन में माओ के नेतृत्व में हथियारबन्द कैडर ने लम्बे संघर्ष के बाद वहां की सरकार को खदेड़ दिया और उसे ताइवान तक ही सीमित कर दिया। यह घटना भारत से अंग्रेजों के चले जाने के लगभग दो साल बाद की है। यदि वैश्विक सन्दर्भ में इसे समझना हो तो कहा जा सकता है कि कम्युनिस्ट तत्वों द्वारा रूस के बाद सत्ता पलट की यह दूसरी घटना थी। लेकिन इसका एक दूसरा अर्थ भी था। <p>
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