इस संग्रह में उन्नीस अरमेनियाई लेखकों की कहानियों संकलित हैं। सब के सब विभिन्न पीढ़ियों, दृष्टिकोणों व लेखन-शैलियों के लोग हैं। कुछेक निश्चित घटनाओं को अपना कथ्य बनाते हैं तो दूसरे जीवन के दार्शनिक मूल्यांकन का प्रयास करते हैं। यह एक संकलन है, कोई कहानियों की रचनावली नहीं। अरमेनियाई साहित्य में अरमेनियाई कहानियों की शैली का इतिहास कई सौ साल का है और इसके लेखक विश्व संस्कृति के इतिवृत्त में अमर हैं। इसलिए अरमेनियाई कहानियों की रचनावली तैयार करने के लिए कई खण्डोंवाले संस्करण की आवश्यकता होगी। बहरहाल, इस संकलन को प्रस्तुत करते समय कई ऐसे लेखकों को उद्धृत किया जा सकता है जो अपने समय में अरमेनियाई कथा-लेखन के इतिहास में युगान्तरकारी माने जाते थे लेकिन इस संकलन में शामिल नहीं किये गये हैं। उनमें सबसे पहला नाम खचातुर अवाकियान का है। 1830 से 1840 के दशक में लिखी उनकी कहानियाँ रोमाण्टिक, उपदेशात्मक और इसके साथ ही अरमेनिया की वास्तविक परम्परा के अनुरूप ही आलंकारिक थीं। निकट भविष्य में ही अरमेनियाई साहित्य में अग्रणी बन जानेवाली साहित्यिक शैली के रूप में कहानियों की विधा को सँवारने का काम उन्होंने किया। 19 वीं सदी के अन्त में तथा 20वीं सदी के आरम्भ में लेखकों की एक उज्ज्वल नक्षत्नमाला ने कहानियों के इस पल्लवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इनमें प्रमुख नाम हैं: रफी, गाब्रियल सुन्दुकियान, अकोप पैरोनियान, राफेल पात्कानियान, ग्रिगोर जोप्राब, येन्दि मोतियान और पेर्च प्रोशियान यह उल्लेखनीय है कि प्रारम्भ से ही अरमेनियाई कथा-लेखन में कोई एक प्रवृत्ति नहीं रही। आंशिक रूप से इसका कारण यह है कि इस विधा ने विभिन्न सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिकोणोंवाले लेखकों को आकृष्ट किया। इसके अलावा, यह लेखक अरमेनियाई साहित्य में पूर्वी एवं पश्चिमी के नाम से ज्ञात दो भित्र शाखाओं के थे। रूसी क्षेल में रहनेवाले पूर्वी शाखा का प्रतिनिधित्व करते थे। ये विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण भिन्न धारा का अनुसरण करनेवाले पश्चिमी अरमेनियाई लेखकों की तुलना में सामाजिक रूप से अधिक जागरुक थे। नार-दोस ने अपनी आत्मकथा में लिखा है "मेरी पताका पर अंकित शब्द थे के नार-दोस के बहुत से समकालीन इस आदशोंक्ति से सहमत होते। यह एक 'यथातथ्य वास्तविक जीवन और मौलव का आन्तरिक जगत' ।" पर्वी अरमेनिया साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में यथार्थवाद के बीजवपन का द्योतक हैं। अरमेनियाई यथार्थवादी कथावस्तुओं में बल्कि अपने जनजीवन के बौद्धिक जगत के बारे में साहित्य में इसकी जड़े दृढ़ता से जम गयीं और इसकी अभिव्यक्ति न केवल लेखकों के तीन भाव-बोध में सामाजिक विरोधाभासों के उनके उद्घाटन में और नैतिक पर्व नीतिशास्त्रीय समस्याओं में उनकी अभिरुचि में भी हई। इस प्रकार, नार-दोस ने शासक वर्ग के नैतिक दिवालियेपन और बौद्धिक अधःपतन की प्रक्रियाओं को प्रस्तुत किया और ऊर्जस्वी, अध्यवसायपूर्ण तथा अपनी ही शक्ति पर आस्था रखनेवाले श्रमजीवी की जीविष्णुता की पुष्टि की। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में समाज में निरन्तर गहराते विरोधाभासों की परिस्थितियों के अन्तर्गत पात्नों के आन्तरिक जीवन को प्रतिबिम्बित करनेवाली मनोवैज्ञानिक कहानियों ने अरमेनियाई साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। 'सामान्य व्यक्ति' की कथावस्तु को लोकप्रियता मिली और लोगों के ध्यान में एक ऐसा जीवन आया जो वस्तुतः नाटकीय था तथा जिसकी नियति अपनी निरीहता के कारण नासदीपूर्ण थी। रूस में 'च्येख़फ़ कथानक' के नाम से ज्ञात इस कथावस्तु को अरमेनियाई साहित्य में सर्वप्रथम स्तेफ़ान ज़ोरियान की रचनाओं में विशेष बल मिला ('दुखी लोग', 'सफ़ेद घर के वासी', आदि)। 20वीं सदी की अरमेनियाई कहानियों का इतिहास अधूरा रह जायेगा अगर अरमेनियाई साहित्य के दो उज्ज्वलतम सितारों- ओवानेस तुमानियान व अवेतिक इसाकियान का उल्लेख नहीं किया जाये। उनका महान रिक्थ विश्व साहित्य एवं अपनी जातीय कला को सर्वोत्तम परम्पराओं का एक सुन्दर सामंजस्य है। रैली को सरलता, मानवीयता, अपनी जनता के रीति-रिवाजों, जीवन, मनोविज्ञान की गहरी समझ और उनकी जनवादिता ने ओवानेस तुमानियान एवं अवेतिक इसाकियान को विश्व के असाधारण लेखकों में स्थान दिला दिया है। वलेरी ब्रियूसफ़ ने तुमानियान की रचनाओं को क्रान्ति-पूर्व अरमेनियाई जीवन का एक विश्वकोश बताया है। इस संकलन में तुमानियान की एक कहानी 'मेरा दोस्त नेसो' शामिल की गयी है। यह कहानी उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए लिखी थी।
'इवान' रूसी लेखक व्लादीमिर बोगोमोलोव की सबसे प्रसिद्ध कृतियों में शुमार है। यह लघु उपन्यास या लम्बी कहानी इस मान्यता का बेहद सुन्दर प्रतिफल है कि साहित्य जीवन के लिए होता है। 'इवान' को प्रायः 'युद्ध का उपन्यास' कहा गया है। वइ इस अर्थ में निश्चित ही युद्ध का उपन्यास है कि इसमें दूसरे विश्वयुद्ध के भयानक दौर का वर्णन है, जब जून 1941 में तत्कालीन सोवियत रूस पर जर्मन फासिस्टों ने हमला बोल दिया था। सोवियत संघ ने इस युद्ध में विजय हासिल की, लेकिन इसके लिए उसे जन-धन की बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी थी। इस युद्ध में सिर्फ सैनिकों-सिपाहियों को ही जान नहीं गँवानी पड़ी, जो फासिस्टों से जूझ रहे थे, बल्कि इसमें बड़ी तादाद में नागरिक भी खेत रहे, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे। इस नजरिये से देखें तो 'इवान' युद्ध के खिलाफ सन्देश देने वाला उपन्यास प्रतीत होता है। यह विश्वसनीय ढंग से बतलाता है कि कोई भी युद्ध कितना विनाशकारी होता है और दूसरों पर वर्चस्व जमाने की ओछी आकांक्षाओं से प्रेरित ऐसे कृत्यों से मानवता को कितना नुकसान होता है। 'इवान' उपन्यास इसी नाम के एक नन्हे बच्चे की कहानी है, जिसे सोवियत संघ पर फासिस्ट हमले के बाद घर-बार परिजन गँवाने पड़े थे। नतीजतन खेलने-पढ़ने की उम्र में उसे युद्ध की विभीषिका का सामना करना पड़ा। परिस्थितियों ने उसे अकाल परिपक्व बना दिया और उसने युद्ध में बहादुरीपूर्ण भूमिका निभायी। उसकी असाधारण वीरता उसे शहादत तक ले गयी। स्पष्टतः इवान की छोटी-सी जिन्दगी जितनी असाधारण है, उतनी ही प्रेरक भी। लेकिन इस किताब को पढ़ते हुए यह तथ्य कभी भूला नहीं जा सकता कि इवान की कहानी युद्ध में बच्चों के ऊपर आने वाली विपदा के परिणामों से भी आगाह करती है। वस्तुतः यह एक चेतावनी है और एक प्रश्न है, जो विश्व की तमाम सत्ताओं और तमाम लोगों को सम्बोधित है। यह हमें साम्राज्यवादी खतरों से आगाह करती है; जो आज परिवर्तित और कहीं अधिक घातक रूप में उपस्थित है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी दुनिया से युद्धों का खतरा खत्म नहीं हुआ है। आज भी युद्ध के मारे हजारों बच्चे हैं, जिनको अँधेरे से उबारने की जरूरत है। कहना न होगा कि इवान हमें इन तमाम जिम्मेदारियों की याद दिलाती है।
ब्लादीमिर बोगोमोलोव 3 जुलाई 1926 को तत्कालीन सोवियत रूस के एक गाँव में जन्म। स्कूली पढ़ाई के दौरान ही दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया, जिसमें बतौर सैनिक शामिल हुए। 1952 तक सैन्य सेवा में रहे। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद 1958 में स्नातक की डिग्री ली। 1957 में 'इवान' का प्रकाशन। 1973 में प्रकाशित 'इन अगस्त 1944' (द मोमेंट ऑफ टूथ) उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसे इनकी सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। 'फर्स्ट लव' (1958), 'द पेन ऑव माई हार्ट' (1963), जोस्या (1963) और 'इन क्रिएगेर' (1986) प्रमुख उल्लेखनीय कृतियाँ। 'इवान' समेत कई कृतियों पर फिल्में बनीं, जो काफी लोकप्रिय रहीं। 30 दिसम्बर 2003 को मृत्यु ।
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