नाम : डॉ. धर्मचन्द विद्यालंकार 'समन्वित' जन्मतिथि: 10/12/1956 जन्मस्थान: ग्राम व पोस्ट अल्लीका, जिला-पलवल माता-पिता : श्रीमती रामकली व श्री रामचन्द कुंडू शिक्षा: बी.ए. (अलंकार) एम.ए. हिन्दी, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं शोध उपाधि भी वहीं से प्राप्त की है। डॉ. अम्बेडकर आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट्. सन्त साहित्य पर की है। व्यवसाय: तीस वर्षों तक एक स्नातकोत्तर महाविद्यालय (गो.ग. दत्त सनातन धर्म कॉलेज, पलवल) में अनवरत अध्यापन कार्य किया है। रचनात्मक परिचय : कहानी संग्रह - (1) झूठी कसम तथा अन्य कहानियाँ (2) चौबीसी का चबूतरा (3) पगड़ी संभाल जट्टा (4) आग की दहक (5) जिन्दगी के हाशिये पर (6) रोटी और रिश्ते (7) सांझी विरासत (8) चेतना की चिंगारी (9) क्रान्ति और सक्रिय राजनीति (10) स्वदेशी और साम्राज्यवाद (11) ब्राह्मणवाद बनाम शूद्रवाद (12) आर्यों से अयोध्या तक (13) जाटों का नया इतिहास (14) कुरुक्षेत्र के कगार पर (15) त्रिवेणी के तट पर (16) बहता पानी निर्मला (17) दिग्दाह (18) वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति (19) साधो! यह मुर्दों का गाँव! (20) आरक्षण की व्यवस्था और सामाजिक न्याय (21) सूरजमल शौर्य गाथा (22) साम्राज्यवाद और स्वाधीनता संग्राम (23) शहीदे आजम का आज्ञातवास (24) बलिदान का प्रतिशोध (25) न्याय के देवता (26) वीर बालकों का बलिदान (27) आर्यन पेशवा राजर्षि महेन्द्र प्रताप (28) धरती पुत्र चौधरी छोटूराम (29) जाट इतिहास की परिक्रमा (30) सिंधु सभ्यता और जाट उपन्यास : (1) गोकुला (लघु उपन्यास) (2) दीनबंधु छोटूराम (महाकाव्यात्मक उपन्यास) पुरस्कार प्राप्ति ) हंस कविता पुरस्कार 2002 'हिसार' (2) चौ. हीरासिंह स्मृति पुरस्कार, आगरा, 2002 (3) स्वामी केशवानन्द साहित्य पुरस्कार, कुरुक्षेत्र, 2007 (4) डॉ. अम्बेडकर फैलोशिप, 2008 पता : गांधी आश्रम कॉलोनी, पलवल (हरियाणा)
पुस्तक परिचय
आजकल हम लोग इतिहास की ओर फिर से लौट रहे हैं। क्योंकि सभी लोग आखिर अपनी-अपनी जड़ों की ओर ही लौटना चाहते हैं। हालांकि भारतीय इतिहास में कितनी ही जातियों के इतिहास की जड़ें लगभग समान मिलती हैं। विशेषकर जाटों की राजपूतों और गूजरों तथा अहीरों और सुनारों या मेडों के साथ। क्योंकि इन सभी जातियों का मूलोत्स भारतवर्ष में लगभग सिंध और ईरान या अफगानिस्तान की ओर से ही मिलता है। जैसाकि टॉड राजस्थान में भी यही लिखा है कि आज से ही लगभग तीन-चार हजार वर्षों पहले शकमूल की जट्टीतक्षक जैसी एक जाति कश्यप सागर तट के पूर्व में स्थित सीरिया से ही चलकर भारतवर्ष में आई थी, उसी से वर्तमान काल की सभी योद्धा या क्षत्रिाय जातियों का उत्स हुआ है। प्रो. हविंगले ने भी यही लिखा है कि जाट तो स्वयं में एक जाति या वंश न होकर वह तो बहुत सारी जातियों का समूह या प्रजाति ही है। इसीलिए कर्नल टॉड और प्रो. विंगले ने राजपूतों और गूर्जरों का भी विकास जाट जैसी प्रजाति में से माना है। जाति का आधार केवल अन्र्तविवाहों की व्यवस्था और व्यवसायों की समानता पर ही अवलम्बित है, जबकि प्रजाति विशेष के लोग बहुत सारे कुलों और वंशों में बँटकर वे कितने ही तो व्यवसायों में भी बिखर सकते हैं। इसीलिए जाटों का संसार भर में बिखराव और फैलाव भी कालान्तर में हुआ है। स्थानान्तरण के ही कारण उसके नामों में भी तो बहुत सारे भेद आ गये हैं। भारत में भी यदि पंजाब में वे जट्ट है तो हरियाणा-राजस्थान में जाट ही हैं। इसी प्रकार से पूरे एशिया और यूरोपीय महाद्वीप भर में हमने जाट इतिहास की परिक्रमा प्रस्तुत पुस्तक में की है। आशा है कि हमारे जाटों के नये इतिहास की यही अगली कड़ी सिद्ध होगी।
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