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जीव-जगत और माया-ब्रह्मा: Jeev-Jagat aur Maya-Brahma

$27
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Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Kiran Tripathi
Language: Hindi
Pages: 138
Cover: Hardcover
9.0x6.0 Inch
Weight 290 gm
Edition: 2012
ISBN: 9789381221570
BA3877
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Book Description
भूमिका

प्राचीन वैदिक वाङ्गमय पूर्णतः लभ्य नहीं है। वेद का अर्थ होता है ज्ञान। वेद चार भागों में विभक्त है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये चारो वेदों की शाखायें अथवा व्याख्या कुछ अंशों में कहीं कहीं प्राप्त होता है। इन वेदों के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए अध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान दोनों की आवश्यकता है। सम्पूर्ण वेदों में जो विभिन्न देवी-देवताओं के साथ-साथ पेड़-पौधों के अतिरिक्त पत्थरों और तलवारों से प्रार्थनाएँ और कार्य पूर्ण करने का जो आग्रह किया है उसे समझने के लिए हमें चैतन्यांश को भी समझना होगा। इस चैतन्यांश की व्याख्या जानना होगा। जो वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है, जो आज यह सिद्ध हो चुका है कि संसार के समस्त जीव और निर्जीव पदार्थ एक मात्र अणु और परमाणुओं का एक विशेष संघटन मात्र है। अब तो इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटोन से भो सूक्ष्म पदार्थ वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है जिसे वैदिक वाङ्गमय चैतन्यांश कहता है। दर्शन जिसे 'पाकज' कहता है। किन्तु आज जो मुख्यतः वेद को मानते हैं वे कर्मकाण्डी हैं। वैदिक मंत्रों से पूजा-पाठ तो करा देते हैं किन्तु उनके निहितार्थ को न जानते हैं और न जानने का प्रयास ही करते हैं। यदि कर्ममाण्डी स्वयं नहीं जानते हैं तब अपने यजमान को कैसे समझा सकते हैं। फिर भी आज के कर्मकांडी इतना तो जानते हैं कि यज्ञों के चार पुरोहित होते हैं। होता-जो सोम या अन्य द्रव्यों के भोग के लिए देवों का अह्वान करने के लिए ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करते हैं। उद्‌गाता जो सामवेद के गान से सोमादि बनाने में सहयोग देते हैं। अथर्ववेद जो पूजा से पवित्र कर्म को पूरा करते हैं। यजुर्वेद के निर्देशनुसार ब्रह्मा जिस पर सम्पूर्ण यज्ञ का भार होता है। इन वेदों की व्याख्या समझने में वेद के ब्राह्मण और अरण्यकों ने मदद की है। वैदिक कर्मकाण्ड और ज्ञान धीरे-धीरे सूक्ष्म होते गये और जब दार्शनिक क्रान्ति हुई तब जा कर वैदिक अर्थ कुछ मात्रा में जनमानस में उतरा। वेदों से जो ज्ञान की पिपासा बढ़ी वह वेदान्त में आकर तृप्त हुई। चार्वाक के द्वारा प्रतिपादित मोक्ष की भौतिक विचारधारा से आरंभ कर के हम बढ़ जाते हैं और शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में जिज्ञासा की पूर्णतः शान्ति पाते हैं। वैदिक अर्थों की पृष्ठभूमि में मैंने कुछ दार्शनिक जिज्ञासाओं की व्याख्या सहज एवं सरल शब्दों में करने का प्रयास किया है। जीव, जगत् और माया के सम्बन्ध में जो व्याख्यायें सूक्ष्म रूप से वेदों में थीं वे क्रमशः वेदों के ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में स्पष्टतर होती गई हैं। मैंने उन्हीं उपनिषदों में से छान्दोग्योपनिषद की कुछ मुख्य विचारधाराओं की व्याख्या प्रथम अध्याय में किया है। द्वितीय अध्याय पूर्णतः दार्शनिक है जिसमें प्रायः सभी दर्शनों से कुछ-कुछ अंश लेकर ब्रह्म, जीव और जगत् को समझने एवं समझाने की चेष्टा की है। चार वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, वेदों के ब्राह्मण, 108 उपनिषदों और षड्दर्शन शास्त्रों में द्यावा पृथ्वी आदि सभी समाहत हैं। वेदों की अमूल्य निधि वेद ब्राह्मण हैं, जिसमें वैदिक युग के क्रियाकलापों और सामाजिक स्थितियों का भव्य वर्णन है। वैदिक क्रियाकलाप धर्म मीमांसकों के लिए हैं। यज्ञ का सम्पादन ही ब्राह्मण ग्रंथों का मुख्य उद्देश्य था। सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुष्ठानों के लिए विस्तार से वर्णन है। जैसे अग्नि की स्थापना का समय, घी की आहुति या वेदी में स्थान का समय, आसन कहाँ लगाया जाय, वेदी कैसे बनाई जाय आदि नियमों का सूक्ष्म वर्णन है। इसके अतिरिक्त समाज में चारो वर्षों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के विभाजन की व्याख्या भी है। ब्राह्मणग्रंथों का परिशिष्ट ग्रंथ अरण्यक ग्रंथ है। अरण्यकों के मुख्य विषय यज्ञ न होकर यज्ञ के भीतर विद्यमान अध्यात्मिक तत्त्वों की मीमांसा है। अस्तु अरण्यकों में यज्ञीय अनुष्ठान न होकर तदअन्तर्गत दार्शनिक विचार ही इनके मुख्य विषय हैं। ब्राह्मणों को कहा गया है देवाः प्रत्यक्ष ब्राह्मणः और अरण्यओं के विषय में कहा गया अरण्यं च वेदेभ्य औषधिभ्योऽमृतं वेद के जिस अंश में प्राण विद्या तथा उपासना वर्णित है वह अरण्यक ग्रंथ है। अरण्यक ग्रंथ यज्ञ के गूढ़ रहस्य और कर्मकाण्ड की दार्शनिक व्याख्या से उपनिषद की रचना हुई। अरण्यक और उपनिषद विषय की दृष्टि से समान है। इसलिए कहीं-कहीं अरण्यकों को भी उपनिषद कहा जाता है किन्तु समानता होते हुए भी दोनों में भिन्नता है। अरण्यकों का मुख्य विषय प्राण विद्या और उपासना है। उपनिषद में निगूढ़ ब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या और प्राप्ति की व्याख्या है। वेदों में निहित तत्व खेत में लगाये गये अरण्यक और उपनिषद रूपी वृक्ष से प्राण विद्या तथा ब्रह्मविद्या जैसे रहस्यात्मक फल प्राप्त हुए। इसे ही बाइबिल में कहा गया कि वृक्ष में ज्ञान के फल थे जिसे खा कर ज्ञान प्राप्त हुआ। ये फल ब्रह्मविद्या ही है और खाना अभ्यास एवं अनुभव करने के अर्थ में है। हम कह सकते हैं कि वेदों से निकला ज्ञान सूक्ष्म तो था ही किन्तु अल्पज्ञानी उन्हें स्थूल समझते थे। अतः हमारी समझ के अनुसार वैदिक का स्थूल ज्ञान उपनिषद में और वेदान्त में आकर सूक्ष्म समझ की प्राप्ति हुई।

पुस्तक परिचय

संसार की अनन्त श्रृंखला में प्रत्येक जीव अपने कर्म और भोगों के कारण पुनः पुनः कर्त्ता और भोक्त बनता है। आज के कर्म पूर्व जन्म के कर्म हैं। कर्म जीव के भाग्य में परिवर्तन लाते हैं। कर्म से एक नये क्षण को प्राप्त करते हैं । यह नया एक क्षण ही मुक्ति का कारण बन सकता है। तत्त्व ज्ञान ही मोक्ष है। तत्त्व ज्ञान वास्तव में क्या है ? तत्त्व ज्ञान से कैसे मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है? यह समझ लेना कि जीव, आजीव और निर्जीव सभी एक ही पद-पदार्थ हैं मुक्ति या मोक्ष है। जब कोई यह जान ले कि जो सब है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही सब है तब क्यों विश्व में आतंक और युद्ध की विभीषिका हो ? प्रस्तुत पुस्तक में उपर्युक्त बातों को सरल और विश्लेषणात्मक गवेषणा की गई है। निश्चय ही पाठकों को तत्त्व ज्ञान से मुक्ति को समझने में सहायता मिलेगी ।

लेखक परिचय

डॉ० किरण त्रिपाठी, वेदान्ती चेयर पर्सन : पाराविद्या अनुसंधान केन्द्र के विख्यात वास्तुविद्, ज्योतिषाचार्य एवं तंत्र साधिका। शिक्षा : एम० ए० (संस्कृत), पी- एच० डी०, डी० पी० पी० एच०, पी० जी० डी० पी० सी० प्रकाशित कृतियाँ : ब्रह्मज्ञान, ईशोपनिषद, अध्यात्म-चिन्तन, जीव, जगत् और माया, क्या करूँ-किधर जाऊँ, वेद-परिचय। मुद्रणाधीन कृतियाँ: आत्मचिन्तन, गीता : एक अनुशीलन, बिहार: अतीत और वर्तमान, भारत की कुछ दिव्यात्माएँ, सांख्यकारिका : एक विवेचन अन्य उपलब्धियाँ: देश-विदेश की अनेक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं अभिनंदित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से विविध वार्ताएँ प्रसारित एवं प्रदर्शित । विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनेक विषयों पर शोधपरक गंभीर आलेखों का प्रकाशन।

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