प्यारे बच्चों, तुम स्वेच्छा से बेहिचक स्वाभाविक और उन्मुक्त रेखा खीचते हो। परन्तु जब तुम्हें कोई खास आकार की रेखा खींचनी होती है, तो तुम्हारी रेखा में पहले की स्वाभाविकता नहीं रहती। तुम डर-डर कर टूटी फूटी रेखा या कौंपते हाथों से रेखा खींचते हो। कला-कृति की रेखा के लिए ऐसी रेखा ठीक नहीं। तुम्हें कला सीखनी है तो गुरु-दक्षिणा में तुम अपने भय का दान करो। मैं तुम्हें कलाकार बनने में सहायता दूँगा। तुम्हारी प्रिय पुस्तक है। इस विशाल प्रकृति परिवेश में सब कुछ है, यही रेखा, कोण, त्रिभुज, आयत, वर्ग, चतुर्भुज, वृत, अण्डाकार या इनके सदृश आकृतियों के समान ही प्रकृति में भी नाना प्रकार के रूप जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी, पहाड़, पेड़-पौधे, घर-द्वार, नदी-नाले, आकाश, पृथ्वी के भिन्न-भिन्न रूप दिखाई पड़ते है। उन्हीं रूपों को हम अपने चित्रपट में उतारते हैं।
किसी वस्तु के सदृश उसकी वाहुय आकृतियों के आकार के रेखा चित्र (खाका) बनाओ। उसे स्केच कहते हैं। वस्तु के स्केच तथा उस वस्तु पर पड़ने वाले छाया-प्रकाश का अध्ययन कर प्रकाश की कमी बेशी को यथा उपयुक्त (जैसा है वैसा) लगाने का अभ्यास करो। पेंसिल का ग्रेड हल्का तथा गहरा प्रभाव ठीक छाया-प्रकाश के प्रभाव की तरह होना चाहिये।
पेंसिल के हल्के से गहरे तक के क्रमिक प्रभाव को 'टोन' कहते हैं। वैसे वस्तु के छाया-प्रकाश में अनेक रंग होते है, जो प्रकाश के प्रभाव से बदलते रहते हैं। परन्तु चित्र बनाते समय पहले छाया-प्रकाश को एक रंग के 'टोन' में ही आबद्ध. करो। फिर उसी वस्तु को अनेक रंगों से जैसा तुम्हें दिखाई दे रहा है, उसी तरह का अनुकरण करो। अनेक रंगों के व्यवहार से अब सही वस्तु के अनुकूल ही तुम्हारा चित्र बनेगा। वस्तु की कठोरता तथा कोमलता, जैसा गुण उस वस्तु का है, ठीक वैसा गुण तुम्हारे चित्र में है या नहीं, विचार करो। कई आकारों का एक साथ संयोजन करो। आकारों को आगे-पीछे रखने के क्रम के सम्बन्ध में 'दृष्टिक्रम पाठ' देखो।
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