केदार संसार में संभवतः पत्नीप्रेम के सबसे बड़े कवि हैं। 'हे मेरी तुम' और 'जमुन जल तुम' के रचयिता का एकाकीपन उनके शुभचिंतकों को खलाता था। हम लोग जून महीने की तपती गर्मी में बाँदा गए और तीन दिन उन्हीं के घर पर रहकर उनका साक्षात्कार लेकर लौटे। शिवकुमार सहाय ने उसे 'कवि-मित्रों से दूर' नाम से और मूल्यांकन के संकलन को 'केदारनाथ अग्रवाल' नाम से प्रकाशित किया जिसे अन्य पुस्तकों के साथ सितम्बर में उनके 'सम्मान' कार्यक्रम में रिलीज़ किया गया। लेकिन यह मूल्यांकनपरक संकलन इधर पचीस वर्षों से अनुपलब्ध था। कई कोशिशें हुई लेकिन कुछ नए लेख लिखवाने का काम नहीं हो पा रहा था, इसलिए पुराने लेखों में भी कुछ फेरबदल रुका हुआ था। आखिरकार इधर दो-तीन साल में केदार के प्रति नए लेखकों की रुचि जाग्रत हुई और संकलन ने नया रूप लिया। केदार के कई मित्र उनकी पत्नी के देहांत के बाद उनसे मिलने को उत्सुक थे लेकिन वे बाँदा नहीं जा सकते थे। कुछ तो अपने वार्धक्य के कारण, कुछ अकेले रह जाने से केदार के पास रहने-खाने की असुविधा के कारण। जब कार्यक्रम की योजना बनी तो दिल्ली में उनके आत्मीय मित्र रामविलास शर्मा ने कहा कि वे कार्यक्रम में चलेंगे, इस बहाने केदार के साथ तीन-चार दिन रह लेंगे। यह भी तय हुआ कि कार्यक्रम में किसी लेखक को मार्गव्यय नहीं दिया जायेगा, केवल बाँदा में रहने-खाने की व्यवस्था प्रकाशक की ओर से होगी। फिर भी लगभग सौ लेखक अपने खर्च पर आयोजन में पधारे। ऐसा भव्य कार्यक्रम निकट अतीत और भविष्य में नहीं देखा गया। संयोग से आज जब केदार साहित्य के मूल्यांकन का यह संस्करण प्रकाशित हो रहा है, तब सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भ बदल चुका है। हमें जनतंत्र के भीतर उभरती तानाशाही की प्रवृत्तियों से ही सावधान नहीं रहना है, जिसके प्रति नागार्जुन की भाँति केदार भी बहुत जागरूक थे। वे न सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक चेतना की दृष्टि से सचेत थे बल्कि कवि-कर्म को भी अपनी इस सजगता के अनुरूप विकसित करते थे। इसीलिए रामविलास शर्मा के अनुसार, केदार 'सफल राजनीतिक पत्रकारिता' को भी कविता के धरातल पर चरितार्थ करते थे। आज हम भारतीयता के नाम पर अतीत की खोह में लौट रहे हैं तथा सभी बर्बर और आदिम प्रेतों को जीवित कर रहे हैं। इसपर अलग से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है लेकिन विवेक निराला ने अपने लेख में आवश्यक संकेत देकर केदार की राजनीतिक चेतना की वर्तमान प्रासंगिकता सामने रखी है। कवि की सामाजिक दृष्टि उसकी प्रेम सम्बन्धी धारणा में भी अभिव्यक्त होती है और प्रकृति विषयक सौंदर्य दृष्टि में भी। इसे शहाबुद्दीन और जगन्नाथ दुबे के लेखों में बखूबी देखा जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सच्चा कवि अपनी राजनीतिक चेतना में भी और प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य दृष्टि में भी देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। तभी वह निरंतर प्रासंगिक बना रहता है।
सन् 1986 में 'केदारनाथ अग्रवाल' संकलन प्रकाशित हुआ था। अपने एक पूर्वप्रकाशित रूप का यह नया अवतरण था। उस वर्ष केदार पचहत्तर के हुए थे और चार महीने पहले, जनवरी में उनकी 'प्रिया प्रियंवद पार्वती' उनका साथ छोड़ गयी थीं। एक तो आढ़त वालों की नगरी बाँदा, दूसरे केदार की वकालत वाली ज़िन्दगी, तीसरे साहित्यिक मित्रों से दूरी, उसपर जीवनव्यापी संगिनी का विछोह-केदार बहुत टूटे हुए और अकेले थे। तह हुआ कि उन्हें केंद्र में रखकर उनके कर्मस्थल बाँदा में एक आयोजन किया जाय। सितम्बर महीने में 'सम्मानः केदारनाथ अग्रवाल' का आयोजन हुआ। उस अवसर पर उनके एकमात्र प्रकाशक शिवकुमार सहाय ने कहा कि केदार के मूल्यांकन की एक पुस्तक भी प्रकाशित हो तो अच्छा रहेगा। सन् 1964 में श्रीप्रकाश (इलाहाबाद के एक प्रकाशक) के संपादन में एक संकलन निकला था। उसमें कुछ कायदे काम लेख थे लेकिन बाकी सामग्री उपेक्षणीय थी। नए लेख लिखवाए गए और संकलन तैयार हुआ। केदार संसार में संभवतः पत्नीप्रेम के सबसे बड़े कवि हैं। 'हे मेरी तुम' और 'जमुन जल तुम' के रचयिता का एकाकीपन उनके शुभचिंतकों को खलाता था। हम लोग जून महीने की तपती गर्मी में बाँदा गए और तीन दिन उन्हीं के घर पर रहकर उनका साक्षात्कार लेकर लौटे। शिवकुमार सहाय ने उसे 'कवि-मित्रों से दूर' नाम से और मूल्यांकन के संकलन को 'केदारनाथ अग्रवाल' नाम से प्रकाशित किया जिसे अन्य पुस्तकों के साथ सितम्बर में उनके 'सम्मान' कार्यक्रम में रिलीज़ किया गया। लेकिन यह मूल्यांकनपरक संकलन इधर पचीस वर्षों से अनुपलब्ध था। कई कोशिशें हुई लेकिन कुछ नए लेख लिखवाने का काम नहीं हो पा रहा था, इसलिए पुराने लेखों में भी कुछ फेरबदल रुका हुआ था। आखिरकार इधर दो-तीन साल में केदार के प्रति नए लेखकों की रुचि जाग्रत हुई और संकलन ने नया रूप लिया। केदार के कई मित्र उनकी पत्नी के देहांत के बाद उनसे मिलने को उत्सुक थे लेकिन वे बाँदा नहीं जा सकते थे। कुछ तो अपने वार्धक्य के कारण, कुछ अकेले रह जाने से केदार के पास रहने-खाने की असुविधा के कारण। जब कार्यक्रम कीकेदार संसार में संभवतः पत्नीप्रेम के सबसे बड़े कवि हैं। 'हे मेरी तुम' और 'जमुन जल तुम' के रचयिता का एकाकीपन उनके शुभचिंतकों को खलाता था। हम लोग जून महीने की तपती गर्मी में बाँदा गए और तीन दिन उन्हीं के घर पर रहकर उनका साक्षात्कार लेकर लौटे। शिवकुमार सहाय ने उसे 'कवि-मित्रों से दूर' नाम से और मूल्यांकन के संकलन को 'केदारनाथ अग्रवाल' नाम से प्रकाशित किया जिसे अन्य पुस्तकों के साथ सितम्बर में उनके 'सम्मान' कार्यक्रम में रिलीज़ किया गया। लेकिन यह मूल्यांकनपरक संकलन इधर पचीस वर्षों से अनुपलब्ध था। कई कोशिशें हुई लेकिन कुछ नए लेख लिखवाने का काम नहीं हो पा रहा था, इसलिए पुराने लेखों में भी कुछ फेरबदल रुका हुआ था। आखिरकार इधर दो-तीन साल में केदार के प्रति नए लेखकों की रुचि जाग्रत हुई और संकलन ने नया रूप लिया। केदार के कई मित्र उनकी पत्नी के देहांत के बाद उनसे मिलने को उत्सुक थे लेकिन वे बाँदा नहीं जा सकते थे। कुछ तो अपने वार्धक्य के कारण, कुछ अकेले रह जाने से केदार के पास रहने-खाने की असुविधा के कारण। जब कार्यक्रम की योजना बनी तो दिल्ली में उनके आत्मीय मित्र रामविलास शर्मा ने कहा कि वे कार्यक्रम में चलेंगे, इस बहाने केदार के साथ तीन-चार दिन रह लेंगे। यह भी तय हुआ कि कार्यक्रम में किसी लेखक को मार्गव्यय नहीं दिया जायेगा, केवल बाँदा में रहने-खाने की व्यवस्था प्रकाशक की ओर से होगी। फिर भी लगभग सौ लेखक अपने खर्च पर आयोजन में पधारे। ऐसा भव्य कार्यक्रम निकट अतीत और भविष्य में नहीं देखा गया। संयोग से कार्यक्रम के संयोजन का दायित्व शिवकुमार सहाय ने मुझे सौंपा। अपने सहयोग के लिए मैंने अपने मित्र और केदार के अनन्य प्रेमी अशोक त्रिपाठी को जोड़ लिया। हम दोनों उसके संयोजक हुए। तीन दिन के इस आयोजन में लगभग पूरा बाँदा उमड़ पड़ा, मानों बाँदा में केदार का सम्मान पूरे वाँदा का सम्मान था। अपने शहर से इस अभिन्न रूप में कोई और लेखक शायद ही जुड़ा हो। बाद में भोपाल से ऐसा जुड़ाव राजेश जोशी का दिखाई देता है लेकिन वह भी केदार की तरह जनता के दिल में उतने बसे हुए नहीं हैं। बहरहाल, केदार पर उनके शहर में, उन्हीं के लोगों के बीच मूल्यांकन का संकलन प्रस्तुत करना हृदयस्पर्शी अनुभव था। जिन लेखकों ने पिछले संकलन में योगदान किया था, उन्होंने अधिकांशतः कार्यक्रम में पहुँचकर अपनी भागीदारी भी अदा की थी। जिन नए लेखकों ने वर्तमान संकलन के लिए लेख दिए हैं, उन्होंने पिछले यज्ञ में परोक्ष हिस्सेदारी निभायी है। ऐसे कुछ लेखक हैं विवेक निराला, अरुण होता, शहाबुद्दीन, जगन्नाथ दुबे, कर्मेंदु शिशिर और वसंत त्रिपाठी । पिछले संकलन में अधिकांश लेख केदार की कविताओं पर थे। उनका गद्य महत्वपूर्ण है लेकिन उसपर उल्लेखनीय सामग्री नहीं मिल पायी थी। अब न सिर्फ गद्य का आवश्यक मूल्यांकन जुड़ गया है बल्कि 'गद्य की विलुप्त कला' शीर्षक नामवर सिंह का दुर्लभ लेख भी शामिल हो सका है। आयोजन के समय केदार की वकालत में उनके साथ मुंशी फय्याज खां थे, उनकी बातचीत का एक अंश 'कवि-मित्रों से दूर' में है। बाँदा में उनके नियमित सहचर थे कृष्णमुरारी पहाड़िया, अजित पुष्कल और एहसान आवारा। अब इनमें कोई शेष नहीं है। वहीं राजनीतिशास्त्र के अध्यापक रामप्यारे राय भी बराबर उनका सान्निध्य प्राप्त करते थे। चाहता था कि वे कुछ लिख सकें तो उसे सम्मिलित किया जाये। उससे केदार पर अलग रोशनी पड़ेगी। लेकिन दुर्भाग्य से अब इनमें से कोई भी जीवित नहीं है। नरेंद्र पुण्डरीक और चंद्रपाल कश्यप दो युवा कवि थे जो केदार का नियमित सम्पर्क प्राप्त करते थे। अब चंद्रपाल भी नहीं हैं। पुण्डरीक बाँदा में हैं और 'माटी' निकालते हैं। संभवतः केदार के मिलने वालों में वे अकेले बचे हैं। सन् 1986 से अब 2025 तक लगभग चार दशक बीत गए हैं। केदार के महत्व में कोई बुनियादी फर्क नहीं आया है
अजय तिवारी जन्म: 6 मई, 1955, इलाहबाद। शिक्षा : हाईस्कूल तक राधारमण इण्टर कॉलेज, इलाहाबाद से; एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. तक उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से। पुस्तकें : प्रगतिशील कविता के सौन्दर्य मूल्य, नागार्जुन की कविता, साहित्य का वर्तमान, पश्चिम का काव्य विचार, आलोचना और संस्कृति, राजनीति और संस्कृति, व्यवस्था का आत्मसंघर्ष, आधुनिकता पर पुनर्विचार, शिल्प और समाज, हिन्दी कविता: आधी शताब्दी, अकादमी), उत्तर-आधुनिकता, कुलीनतावाद और समकालीन कविता, इतिहास की रणभूमि और साहित्य तथा संगीत कविता हिन्दी और मुग़ल बादशाह, समाज साहित्य और आलोचना इत्यादि । हिन्दी कविता : सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रक्रिया, केदारनाथ अग्रवाल (साहित्य सम्पादन : कवि मित्रों से दूर (केदारनाथ अग्रवाल से संवाद), केदारनाथ अग्रवाल, तुलसीदास : पुनर्मूल्यांकन, आज के सवाल और मार्क्सवाद (रामविलास शर्मा से संवाद), रामविलास शर्मा के संकलित निबन्ध (नेशनल बुक ट्रस्ट)। सम्मान : भिलाई, देवीशंकर अवस्थी सम्मान, 2002, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय
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