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बिहार में भूमि संघर्ष- Land Struggles in Bihar

$43
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Hasan Imam
Language: Hindi Text
Pages: 335
Cover: Hardcover
9.00x6.00 inch
Weight 542 gm
Edition: 2020
ISBN: 9788194951599
BA0601
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Book Description

 

पुस्तक परिचय


प्रस्तुत पुस्तक आजादी से ठीक पहले और आजादी के बाद बिहार में भूमि अधिकार के लिए किसानों, खेत मजदूरों और गृहविहीनों के संघर्ष की एक विस्तृत एवं रोचक पटकथा है। भूमि के केंद्रीकरण की समस्या को दूर करने के लक्ष्य से बने भूमि सुधार कानूनों के क्रियान्वयन के प्रति सरकारों की उदासीनता को नोट करता यह पुस्तक भूदान आंदोलन के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं और उसकी सीमाओं को भी सामने लाता है। बिहार में मुख्य रूप से कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में निरंतर चले भूमि संघर्ष के विभिन्न पहलुओं की समीक्षात्मक व्याख्या भी इस पुस्तक में दर्ज है।
पुस्तक में बिहार के 18 जिलों में चले महत्त्वपूर्ण भूमि संघर्ष के विवरणों, संघर्ष में शामिल लाभार्थियों एवं नेतृत्वकारी जमात की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की पड़ताल के साथ-साथ इस संघर्ष से ग्रामीण बिहार में आये सामाजिक-आर्थिक बदलावों के स्वरूप को भी रेखांकित किया गया है।
विषय पर उपलब्ध साहित्यिक स्रोतों के अतिरिक्त भूमि संघर्ष में शामिल लाभार्थियों एवं कार्यकर्ताओं से प्रश्नावली एवं साक्षात्कार के माध्यम से जुटाए गए विवरणों पर आधारित यह पुस्तक बिहार में हुए भूमि संघर्ष के विभिन्न पहलुओं की सूक्ष्म सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

 

 

लेखक परिचय


हसन इमाम बिहार के अभिवंचितों की संस्कृति पर अपने गंभीर शोध-अध्ययन के लिए जाने। जाते हैं। इनकी प्रकाशित शोध-पुस्तकों 'दलित लोकगाथाओं में प्रतिरोध', 'दीनाभद्री', 'लोकगाथा और स्त्री मुक्ति का प्रश्न' एवं 'लोकगाथा : परिवर्तन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति' ने बिहार की लोक संस्कृति पर गहरा और गंभीर विमर्श खड़ा किया है तो 'बिहार के डोम जीवन संघर्ष, श्मशान से सड़क तक' भी खासी चर्चा में रहा है। पिछले तीन दशक से सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय हसन इमाम एक अभिनेता, नाटककार एवं निर्देशक के रूप में भी अपनी विशेष पहचान रखते हैं। इन्होंने दर्जनों नाटकों का लेखन एवं निर्देशन किया है। इन्हें प्रदर्श कला लेखन क लिए कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार द्वारा बिहार कला पुरस्कार 2015-16 के अंतर्गत रामेश्वर सिंह कश्यप वरिष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है|

 

 

आमुख एवं आभार


भारत में भूमि का प्रश्न प्रारंभ से एक केंद्रीय प्रश्न रहा है और आज भी है। प्राचीन भारत की कृषि अर्थव्यवस्था ने जिस सामंती भूमि सम्बंधों को जन्म दिया उससे भूमि के केंद्रीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और मध्यकालीन भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में वह कायम रहा। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारतीय सामंतवाद से स्थायी राजनीतिक समझौता में अपना सुरक्षित आर्थिक लाभ देखते हुए पूर्व से चले आ रहे सामंती कृषि सम्बंधों में कोई मौलिक बदलाव या छेड़छाड़ करना उचित नहीं समझा। नतीजतन भूमि के केंद्रीकरण की प्रक्रिया और भी तेज ही होती चली गयी। किसान भूमिहीन होते चले गए। आजादी से ठीक पहले स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा ने बिहार में बटाईदारों को भूमि पर अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष प्रारंभ किया। आजादी के बाद संविधान में दर्ज सामाजिक-आर्थिक बराबरी के मूल्यों के आलोक में बिहार में भी कृषि के केंद्रीकरण को कम करने के उद्देश्य से भूमि सुधार कानून बने। सरकारों की जमींदारपरस्त वर्गीय प्रतिबद्धताओं ने भूमि सुधार कानूनों को सरजमीं पर लागू नहीं होने दिया। भूमि के केंद्रीकरण के खिलाफ, कानूनों के आलोक में, गृह विहीनों और खेत विहीनों को आवास और जोत की जमीन पर अधिकार दिलाने के लिए बिहार की कम्युनिस्ट पार्टियों ने आंदोलन और संघर्ष का रास्ता अपनाया। आजाद भारत में भूमि के केंद्रीकरण के खिलाफ आर्थिक बराबरी के लिए शुरू हुआ यह एक बुनियादी संघर्ष था। 'जोतने वालों को जमीन' का नारा उस दौर के संघर्ष का केंद्रीय नारा बन गया।

 

 

प्राक्कथन


जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च (एक्स०आई०एस०आर०), अपने स्थापना काल से ही सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विषयों पर गंभीर शोध-अध्ययन की अपनी प्रतिबद्धता को मजबूती से आगे बढ़ाता आ रहा है।एक शोध-अध्ययन केंद्र के रूप में एक्स०आई०एस०आर० की प्राथमिकताओं में उन विषयों पर शोध-अध्ययन को प्रोत्साहन और सहयोग देना रहा है, जिन्हें मुख्य धारा के परम्परागत शोध-अध्ययन की परिधि से हमेशा बाहर धकेले रहने की कोशिशें की जाती रही हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर जी रहे समुदायों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को शोध-अध्ययन के जरिये सामने लाना और समाज और राजनीति के तत्कालीन विमशों में उसे शामिल करते हुए, उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव की जरूरत को रेखांकित करना, जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च की मूल प्रतिबद्धता रही है। इंस्टीट्यूट ने अपने चर्चित 'सब-आलर्टन' शोध श्रृंखला के तहत् अब तक 10 विषयों पर शोध-अध्ययन का कार्य पूरा कराकर पुस्तकों का प्रकाशन करवाया है। प्रस्तुत पुस्तक इस श्रृंखला की 11 वीं पुस्तक है। बिहार में भूमि संघर्ष का एक लम्बा और चर्चित कालखंड रहा है। सामंती कृषि सम्बंधों को कमजोर करते हुए इस संघर्ष ने गरीबों और भूमिहीनों को आवास और जोत की जमीन मुहैया करायी। मजदूरों और किसानों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भूमि संघर्ष की महती भूमिका रही है। भूमि अधिकार के लिए संघर्ष, बिहार के इतिहास में जनता का अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

 

 

प्रस्तावना


बिहार में भूमि संघर्ष के इतिहास के दस्तावेजीकरण, संघर्ष के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभावों, उसकी प्रवृत्तियों और स्वरुपों की विवेचना से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि भारत में कृषि सम्बंधों पर एक नजर डाला जाए।
भारत में वैदिक काल में रिसायत (वस्तु) और जोत की जमीन (क्षेत्र, उर्वर) पर तो निजी अधिकार का प्रचलन था, परंतु परती जमीन पर सबका अधिकार था। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि राज्य की तमाम भूमि पर राजा का शाही अधिकार था। उसे उपज का एक हिस्सा भर जिसे वली कहा जाता था, भेंट स्वरुप देने का रिवाज था। जंगलों को साफ कर भूमि पर अधिकार बनाने की प्रक्रिया चल रही थी।
'एस्ट्रॉवो, मौर्य काल में राज्य की तमाम भूमि पर राजा के अधिकार और किसानों द्वारा राजा को उपज का हिस्सा भेंट में देने के साथ-साथ भूमिकर देने की बात कहते हैं, लेकिन अर्थशास्त्र में प्रयुक्त स्वात्य, स्वामित्य और भोग जैसे शब्द भूमि पर निजी स्वामित्व की पुष्टि करते हैं।
गुप्त काल में उत्तर भारत में भूमि-स्वामित्व अवधि सम्बंधी नियमों की चर्चा धर्मशास्त्र और शिलालेखों में है। भूमि की खरीद-बिक्री के लिए ग्राम और जिला प्रशासन से आवश्यक अनुमति इस बात का संकेत देता है कि इस काल में कृषक विशेष पर राजाओं ने उच्च अधिकार का दावा किया। उत्तर गुप्त काल में राजा द्वारा राज्याधिकारियों एवं ब्राह्मणों को भूमि अनुदान देने की प्रक्रिया से भूमि के सामंतीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी।
कुल मिलाकर प्राचीन भारत में किसान, वृहत सामाजिक संरचना के आधार का हिस्सा था। धीरे-धीरे किसानों की व्यापक संख्या भूमिहीन और अछूत हो गए।

 

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