आजकल भारत में भाषा विज्ञान का प्रचार प्रसार बढ़ रहा है। बहुत से विश्वविद्यालयों में इस विषय में स्वतन्त्र अध्यापन की व्यवस्था हैं, कुछ विश्वविद्यालयों में संताली भाषा विज्ञान का अध्ययन स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के पाठ्यक्रम का अनिवार्य विषय माना गया है। सन् 1982 में जब संताली प्राध्यापक के रूप में मेरी नियुक्ति राँची विश्वविद्यालय में हुई तब से मैं इस भाषा के अध्यापन कार्य के अनुभव से मैं यह जान पाया हूँ कि यह विषय अब भी विद्यार्थियों के लिए कहिन बना हुआ है।
संताली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने की प्रेरणा मुझे जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभागाध्यक्ष डॉ. राम दयाल मुण्डा जी से मिली जब मैंने उनसे आग्रह किया कि शोध कार्य में मेरा मार्ग दर्शन करे तब डॉ. मुण्डा मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिए और इस प्रकार मन में जगी हुई बातों का साकार देने का कार्य 1982 ई. में राँची विश्वविद्यालय राँची से पंजीकृत कर आरम्भ किया।
किसी भी भाषा में व्याकरण का बहुत अधिक महत्त्व होता है और यदि वार्तालाप कर्त्ता को व्याकरण की प्रकृति और स्वरूप का ठीक ज्ञान नहीं हो तो वह हास्यस्पद हो सकता है। किसी भी भाषा की जानकारी तब तक अपूर्ण रहेगी जबतक उस भाषा की व्याकरण के स्वरूपों और गठन का विस्तृत ज्ञान नहीं होता है। भाषा के स्वरूप एवं गठन का विश्लेषण, वर्णन प्रस्तुत करते हुए भाषा के व्याकरण पर केन्द्रित किया गया है।
सम्पूर्ण, शोध-प्रबंध को द्वादश अध्याय में बाँटा गया है। प्रथम अध्याय में संताली नामकरण, भौगोलिक क्षेत्र, जनसंख्या, संसार की भाषाएँ विषय पर विचार किया गया है। द्वितीय अध्याय से द्वादश अध्याय तक संताली का भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से वर्णविचार, सन्धिविचार, शब्दविचार, वाक्यविचार, संज्ञा, सर्वनाम, लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल, विशेषण, सजीव एवं निर्जीव, उपसर्ग एवं प्रत्यय, समास एवं अव्यय पर विचार किया गया है। परिशिष्ट में मुहावरे और कहावतें, संताली कुदुम (पहेली), संताली के कुछ लोकगीत एवं लोक कथाएँ, पारिभाषिक शब्दावली एवं अन्त में उन सहायक पुस्तकों की सूची है, जिनके अध्ययन से यह कार्य सम्पन्न हो सका है।
इस कार्य के लिए सम्पूर्ण सामग्री का संकलन स्वयं घुम-घुमकर और कानों से सुनकर किया गया है। अनेक ग्रामों में जाकर विभिन्न लोगों की वर्त्ताए सुनी, विविध विषयों के लिए प्रयुक्त होनेवाले शब्द इकट्ठे किए है। अपने चाचा श्री चुनकूराम टुडू ओर बड़े भाईयों श्रीधनीराम टुडू, श्री बलराम टुडू एवं पत्नी चम्पावती टुडू से मुझे तरह-तरह के विचार सुनने को मिला है। मैंने यथा सम्भव शुद्धतम रूप में अपनी भाषा में लिखने का प्रयत्न किया है।
इस शोध की रचना में प्रत्यक्ष रूप में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विद्वानों का सहयोग मिला है। उन सभी के प्रति मैं हृदय से आभारी हूँ। इनके अतिरिक्त उन सभी विद्वत्जनों का भी बहुत कृतज्ञ हूँ जिनकी रचनाओं के अध्ययन के फलस्वरूप ही मेरा यह कार्य सम्पन्न हो सका है।
श्रद्धेय डॉ. राम दयाल मुण्डा के प्रति आभार व्यक्त करने को मेरे पास कोई शब्द नहीं है। उनके निर्देशन से ही इस शोध को सम्पन्न कर सका हूँ। कदाचित् मैं कभी उनकी ऋण से मुक्त नहीं हो सकूँगा।
यह शोध-प्रबंध विश्वविद्यालय स्तर के विद्यार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। मुझे विश्वास है कि इस विषय में दिलचस्पी रखनेवाले पाठक शोध-प्रबंध को रोचक, ज्ञानवर्धक और उपयोगी पाएँगे। इस शोध प्रबंध के मुल में ऐसी कुछ स्मृतियाँ जुड़ी है, जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता है।
Hindu (हिंदू धर्म) (14019)
Tantra (तन्त्र) (1039)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2135)
Chaukhamba | चौखंबा (3470)
Jyotish (ज्योतिष) (1632)
Yoga (योग) (1212)
Ramayana (रामायण) (1313)
Gita Press (गीता प्रेस) (716)
Sahitya (साहित्य) (25198)
History (इतिहास) (9344)
Philosophy (दर्शन) (3712)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist