जय सुधारवादी मानवतावाद जिसे रेडिकल ह्य मेनिज्म की संज्ञा दी गयी है बैसे विचार के बोधक है जो मानवेन्द्र नाथ राय के नाम से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि कभी-कभी ऐसे विचार को रॉयीज्म' भी कहते हैं। मानवेन्द्र नाथ राय वैसे समकालीन भारतीय चिन्तकों में हैं जिन्हें परम्परा निष्ठ मार्क्सवाद से उग्र सुधारवादी मानवतावाद की ओर अग्रसर होते हुये देखा जा सकता है। राय की चिन्तनधारा तत्कालीन दार्शनिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक रुढ़ि से उपर उठकर तत्सम्बन्धी समस्याओं के सफल समीक्षा के प्रतीक है। अपनी किशोरावस्था में राय आतंकवाद से प्रभावित होकर, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्षरत होकर भारतीय स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करते हुये दीखते हैं। अभी युवावस्था में विदेशों के प्रवास में ये परम्परानिष्ठ माक्मंवाद से प्रभावित दीखते हैं किन्तु अपनी प्रौढ़ावस्था में ये माक्संवाद की भी समीक्षा करते हैं तथा इनकी अपूर्णताओं की ओर लोगों का ध्यान भाकृष्ट करते हुये दीखते हैं। अतः परम्परानिष्ठ मार्क्सवाद से उग्रसुधारवादी मानवतावाद की ओर इनके प्रवहशील विचार सफल जल यात्रा की तरह प्रतीत होते हैं। भारतीय दर्शन की परम्परा प्रमुखतः आध्यात्मवादी रही है। समकालीन भारतीय चिन्तन में भी इसका स्पष्ट प्रभाव नव-वेदान्तवाद के रूप में देखने को मिलते हैं। मानवेन्द्र नाथ राय को ही समकालीन चिन्तन में जीवन एवं जगत की समस्त समस्याओं का भौतिकवादी समाधान ढूढ़ने का श्रेय प्राप्त है। इस दृष्टि से राय के विचारों का विभिन्न दृष्टिकोणों से विवेचन किया जाना मात्र महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि विचार परम्परा की अभिवृद्धि के लिये सर्वथा न्यायोचित भी है। मानवेन्द्र नाथ राय एक बहुसर्जक ग्रन्थकार हैं। इन्होंने जीवन से सम्बन्धित प्रमुख समस्याओं पर पुस्तकें लिखी हैं जिनका मूल तत्व मानव स्वतंत्रता के प्रतिपादन में निहित है। ह्वाट इज मार्क्स सिज्म ? द प्राब्लेम्स आफ फ्रीडम, साइन्स एन्ड फिलासॉफी, मैटेरियलिज्म, रेडिकल ह्य मेनिज्म, रीज्न, रोमांटिसिज्म एन्ड रिभोल्यूसन तथा न्यू ह्य मेनिज्म इनकी ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें इनके समस्त मौलिक विचारों का प्रतिपादन उपलब्ध है। राय को सामान्य तथा राजनैतिक चिन्तक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। विगत कई वर्षों से इन्हें समकालीन चिन्तनधारा के मार्क्सवादी प्रवर्तक के रूप में आधुनिक दर्शन में भी स्थान प्राप्त होने लगा है। इनके उग्र सुधारवादी मानवतावाद को प्रमुख रायीस्ट भी० एम० तारकुण्डे ने अपनी पुस्तक में द फिला-सॉफी ऑफ डेमोक्रेशी कहा है। इससे भी यह स्पष्ट हो पाता है कि राय के विचारों का अध्ययन वैयक्ति दर्शन तथा समाजदर्शन के आयामों में ही किया जा सकता है। डी० आर० बाली ने अपने शोध-प्रबन्ध माडर्न इंडियन थॉट में राय को एक दार्शनिक के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है किन्तु इन के इस शोध प्रवन्ध में राय के उग्र सुधारवादी मानवतावाद का ही संक्षिप्त विवेचन उपलब्ध है। राय को एक दार्शनिक के रूप में उपस्थित करने का प्रथम प्रयास डॉ० विष्णुदेव नारायण ओझा ने अपने शोध-प्रबन्ध एम० एन० राय एन्ड हिज फिलासॉफिकल आइडियाज में किया है किन्तु इनकी पुस्तक में भी राय के दार्शनिक विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं हो सकी है। इसका एक मात्र कारण यह है कि इन्होंने राय के विचारों का अध्ययन परम्परावादी दार्शनिक ढाँचों में अर्थात् ज्ञानमीमांसीय तत्वमीमांसीय, आचारशास्त्रीय तथा धर्म दर्शन जैसे आयामों में करने का सफल प्रयास नहीं किया है। फिर भी ऐसे विचारों की अभिव्यक्ति यहाँ परम्परा निष्ठ मार्क्सवाद से उग्र सुधारवादी मानवतावाद की ओर अग्रसर राय के विचारों में अस्फुट रूप में उपलब्ध हैं। प्रस्तुत पुस्तक राय के विचारों को सफल दार्शनिक ढाँचों में ढालने का प्रयास है। इसी दृष्टि से यहाँ रायकी ज्ञानमीमांसा, राय की तत्त्वमीमांसा, इनके आचारशास्त्र एवं इनके समाजशास्त्रीय विचारों का अध्ययन कर यह दिखलाने का प्रयास किया गया है कि राय एक सफल दार्शनिक हैं हैं जिन्होंने समस्त दार्शनिक समस्याओं का समाधान उग्र सुधारवादी मानवतावाद के दृष्टिकोण से किया है। इस प्रकार राय न केवल एक दार्शनिक हैं बल्कि उनके द्वारा प्रतिपादित उम्र सुधारवादी मानवतावादी विचार एक सुव्यवस्थित दार्शनिक पद्धति के उदाहरण हैं। राय केउग्र सुधारवादी मानवतावाद को नवमानवतावाद या सर्वांग मानवतावाद भी कहा जाता है। राय के द्वारा प्रतिपादित ऐसे विचार के अनुसार वर्षों से संयोजी गयी मानवता की सांस्कृतिक एवं दार्शनिक निधि हमें वैज्ञानिक एवं प्रगतिपूर्ण पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है। मानव जीवन में निहित सर्वोच्च तत्वों का वैज्ञानिक रूप प्रस्तुत करना ही ऐसे विचार का लक्ष्य है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वच्छन्द जीवन की प्रोन्नति तथा सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं अन्य पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उन्मुक्त व्यक्तित्व का सम्यक विकास ही ऐसे विचार का ध्येय है। ऐसे दर्शन की प्रतिस्थापना के लिये राय ने परम्परागत विचारों का, विशेषकर परम्परागत दार्शनिक चिन्तनों का समीक्षात्मक अध्ययन किया है तथा अपने विभिन्न ग्रन्थों तथा लेखों के माध्यम से उग्र सुधारवादी दर्शन का प्रणयन किया है जिसका आधार ठोस एवं सच्ची ज्ञानभीमांसा, प्रौढ़ एवं वैज्ञानिक तत्वमीमांसा, सुसंगत एवं समीचीन आचारशास्त्र तथा प्रगतिशील एवं उग्र समाजशास्त्र है। ऐसे विचार को मूर्त रूप देने के लिए प्रस्तुत पुस्तक को पाँच अध्यायों में सुनियोजित किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक में एम० एन० राय के चिन्तन का दार्शनिक दृष्टि से अध्ययन किया गया है। उग्र सुधारवादी मानवतावाद जिसे रेडिकल ह्य मेनिज्म की संज्ञा दी गई है वैसे विचारों के बोधक हैं जो एम० एन० राय के नाम से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि ऐसे विचार को 'रायीज्म' भी कहते हैं। एम० एन० राय वैसे समकालीन भारतीय चिन्तकों में हैं जिन्हें परम्परानिष्ठ मार्क्सवाद से उग्र सुधारवादी मानवतावाद की ओर अग्रसर होते हुए देखा जा सकता है। राय की चिन्तन धारा तत्त्तकालीन दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक रूढ़ि से उपर उठकर तत्त्सम्बन्धी समस्याओं के सफल समीक्षा का प्रतीक है। अपने प्रारम्भिक जीवन में विदेशों के प्रवास में ये परम्परानिष्ठ मार्क्सवाद से प्रभावित दीखते हैं किन्तु अपनी प्रौढ़ावस्था में ये मार्क्सवाद की भी समीक्षा करते है तथा इसकी अपूर्णताओं की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं। प्रस्तुत पुस्तक में एम० एन० राय के परम्परानिष्ठ माक्संवाद से उग्र सुधारवादी मानवतावाद की ओर प्रवहशील दार्शनिक चिन्तन धारा को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। राय को सामान्यतया राजनैतिक चिन्तक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। विगत कई वर्षों से इन्हें समकालीन चिन्तन धारा के मार्क्सवादी प्रवर्तक के रूप में आधुनिक दर्शन में भी स्थान प्राप्त होने लगा है। प्रस्तुत पुस्तक में एम० एन० राय के विचारों को सफल दार्शनिक ढांचों में ढालने का प्रयास किया गया है। पुस्तक केवल दर्शनशास्त्र के अधीनताओं के लिये ही नहीं, अपितु सामान्य पाठकों के लिये भी रोचक तथा ज्ञानवद्धक है और यह उन्हें मानवेन्द्र नाथ राय के दार्शनिक मान्यताओं के सम्बन्ध में तर्कसंगत, यथार्थवादी तथा मौलिक ज्ञान प्रदान करने में सहायक है। इस दृष्टि से यह पुस्तक एम० एन० राय के दार्शनिक चिन्तन पर अब तक उपलब्ध अन्य पुस्तकों से विलक्षण एवं भिन्न है।
डॉ० ललित किशोर गुप्त ने 1976 ई० में बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से दर्शनशास्त्र विषय में स्नातक 'प्रतिष्ठा' की दरीक्षा उत्तीर्ण की जिसमें इन्होंने प्रथम वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्णपदक प्राप्त किया । पुनः 1978 ई० में बिहार विश्वविद्यालय से ही दर्शनशास्त्र विषय में एम० ए० की परीक्षा में प्रथम वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त कर स्वर्णपदक प्राप्त किया । जनवरी 1981 से 31 अक्टूबर 1982 तक दर्शनशास्त्र विभाग, बिहार विश्वविद्यालय में शोध छात्र के रूप में शोध कार्य में संलग्न रहे। 2 नवम्बर 1982 से स्नातकोत्तर दर्शन-शास्त्र विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय; दरभंगा में प्रध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इन्होने 1984 ई० में बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से दर्शनशास्त्र विषय में पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। इस पुस्तक के अतिरिक्त डॉ० गुप्त के कई शोध-निबन्ध दर्शन सम्बन्मी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में शोध छात्रों के निर्देशन एवं दर्शनशास्त्र के विभिन्न शास्ताओं से सम्बन्धित शोध- कार्य में संलग्न हैं। डॉ० गुप्त ने कई सेमिनारों एवं दर्शनशास्त्र के अधिवेशनों में सक्रिय भाग लिया है। प्रस्तुत पुस्तक के अतिरिक्त डॉ० गुप्त की दो पुस्तकें । (1) आगमन तर्कशास्त्र एवं (2) निगमन तर्कशास्त्र (कितावमहल इलाहाबाद) से प्रकाशित हो चुकी है।
Hindu (हिंदू धर्म) (14063)
Tantra (तन्त्र) (1053)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2142)
Chaukhamba | चौखंबा (3456)
Jyotish (ज्योतिष) (1637)
Yoga (योग) (1212)
Ramayana (रामायण) (1310)
Gita Press (गीता प्रेस) (714)
Sahitya (साहित्य) (25466)
History (इतिहास) (9401)
Philosophy (दर्शन) (3724)
Santvani (सन्त वाणी) (2599)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist