लेखक परिचय
शत्रुघ्न सिंह अनाम का जन्म 02 सितंबर 1956 ई. को बिहार के भोजपुर जिले के जैतपुर नामक गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था। इनकी आरंभिक शिक्षा जैतपुर, असनी तथा उदवंतनगर में हुई। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण होने के पश्चात इन्होंने इंटरमिडियट में दाखिला ले लिया पर बीच में पढ़ाई छोड़ 1974 ई. में भारतीय वायु सेना में भर्ती हो गए। वायु सेना में सेवा के दरम्यान ही इन्होंने इंटर, बी.ए., प्रभाकर तथा एम.ए. की परीक्षायें उत्तीर्ण की। अनाम के मन में लेखन के प्रति रुचि आरंभ से ही थी जो वायु सेना में आने के बाद भी कम नहीं हुई बल्कि समय के साथ बढ़ती ही गई। 1984 ई. में जब हिन्दी अकादमी दिल्ली ने इन्हें पुरस्कृत किया था, तब भी वह सर्विस में ही थे। यही नहीं, इनकी अधिकांश रचनाओं का प्रकाशनं सर्विस काल में ही हुआ है। 2013 ई. में भा.वा.से. से अवकाश प्राप्ति के पश्चात भी इनका लेखन अनवरत जारी है। अनाम के प्रकाशित पुस्तकों की सूची उपन्यास :- 'छत्रक', 'ओ मेरे तथागत', 'मोंगरे का फूल', 'चक्रवाक', 'मेरी खता', 'रेंगती हुई जिंदगी', 'यह कैसा मसीहा', 'नई किरण', 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अंतर्द्धन्द्ध', 'अपने अपने दायरे', 'मेरी खता मेरा प्रायश्चित' और 'खोये हुए रिश्ते', सुनो हे यशोधरा। कहानी संग्रह :- 'भूमे गरीयसी', 'काहे को करे इंतजार', 'तलाश', 'आश्रम', 'किसलय बनाम प्रलय', 'अतिथि देवो भव', 'पापा की खातिर', 'त्रिकोण के बीच का कोण', और 'भाड़ भात' कविता संग्रह :- 'तुम और मैं' तथा 'नागफनी' आत्मकथा :- सफरनामा (एक वायु सैनिक की यात्रा) जीवनी:- विद्रोही महात्मा
पुस्तक परिचय
मेरे गांव से बाहर जो डगर जाती है, उस पर पहले महुआ के कई पेड़ थे। उन्हीं में से एक पेड़ मेरे किसी पूर्वज ने लगाया था। चैत के महीने में जब उस पर फूल खिल जाते तो उसकी खुशबू और सुंदरता से प्रकृति हंस पड़ती थी। सुबह सूर्योदय होते ही वे फूल वृक्षों से झड़कर पृथ्वी पर बिछ जाते जिन्हें चुनने मैं अपनी बहन के साथ जाया करता था बाल्यावस्था में। चूंकि वह ऋतु पतझड़ का होता था अतः वृक्षों की पत्तियां पृथ्वी पर गिरकर गद्दे का अहसास दिलाने लगती थी। कुछ महिलाएं उन्हें चुनकर अपने घर ले जाती जिनसे वे पत्तल बनाती थी तो कोई-कोई जलायन के रूप में प्रयोग में लाती। बचपन की वे घटनायें आज भी मुझे याद हैं, परंतु वही यादें इस रचना के रूप में प्रकट होंगी, किसे पता था। महुआ के वे वृक्ष विकास की भेंट चढ़ गए, लेकिन मेरे मन-मस्तिष्क में वे पेड़ आज भी जिंदा हैं, उसी रूप में लहलहाते, पथिकों को छाया देते हुए।
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