लेखक परिचय
प्रो. कैलास विहारी सहाय अवकाश प्राप्त रीडर और अध्यक्ष अंग्रेजी विभाग, पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया (बिहार)। भूतपूर्व सदस्य सीनेटर, एल. एन. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार। जन्म : 1923 (बलिया) शिक्षा : एम. ए. (अंग्रेजी), बी. एल. कृतियाँ: मदिर सूर्य के शहर में
पुस्तक परिचय
मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद मार्क्सवाद इतिहास का सबसे विकसित, सांगोपांग, युक्तिसंगत भौतिकवाद है। इससे पीछे यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस का पदार्थवाद, अट्ठारहवीं सदी का फ्रेंच भौतिकवाद, उन्नीसवीं सदी का वैज्ञानिक भौतिकवाद इत्यादि हैं। किन्तु मार्क्स ने अपने द्वन्द्वात्मक पद्धति के द्वारा (जिसे उन्होंने हीगेल से लिया था) भौतिकवाद का पूर्ण रूपान्तरण कर दिया। अस्तित्ववाद को मान्य दार्शनिक रूप देने का श्रेय जर्मन दार्शनिक ह्यूसर्ल (Husserl) को है। उनको अस्तित्ववाद का पितामह कहा जा सकता है। उनके शिष्य हेडेगर को अस्तित्ववाद का जनक कहा जा सकता है। सार्ज ने हेडेगर का प्रभाव ग्रहण कर फ्रेंच अस्तित्ववाद को विस्तार से प्रतिपादित किया है। सार्च का अस्तित्ववाद ही आधुनिक यूरोप का सबसे प्रमुख और चर्चित अस्तित्ववाद है। सार्ज मनुष्य के मूलतः स्वतंत्रता के दार्शनिक हैं। उनके लिए मानव अस्तित्व और स्वतंत्रता एकार्थक शब्द है। मार्क्स में वाह्य परिस्थितियों का चरम महत्व तो सार्च में चेतना का उतना ही चरम महत्व है। सार्ज ने कम्यूनिस्टों के साथ मिलकर राजनैतिक आन्दोलनों में भाग लिया। इस प्रकार यूरोप और दक्षिणी अमेरिका में बहुत से कम्यूनिस्ट मार्क्स के साथ सार्ज के विचार को भी ग्रहण करने लगे। फिर भी अस्तित्ववाद एक व्यक्तिवादी दर्शन है और मार्क्सवाद व्यष्टिवादी दर्शन। दोनों दर्शनों में समन्वय स्थापित करना अतिशय कठिन है। ऐसा समन्वय भ्रान्तियों को जन्म दे सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद की व्याख्या, तुलना और समीक्षा की चेष्टा की गई है। यह पुस्तक गंभीर अध्येता केलास विहारी सहाय द्वारा मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद के प्रामाणिक ग्रन्थों के दशकों के अध्ययन, मनन और चिन्तन पर आधारित है। संभवतः हिन्दी में मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने वाली यह पहली पुस्तक है।
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