'भारतीय दर्शन में भौतिकवाद' में स्यात्मवाद बनाम भौतिकवाद का रोचक मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है। चार्वाक और बुद्ध के विचारों को भौतिकवाद के युक्तिसंगत विश्लेषण में विमर्श के लिए प्रतिमान माना गया है। भारतीय दर्शन में न्याय वैशेषिक, सांख्य, मीमांसा, द्वैत, अद्वैत, कुमारिल और पूर्व-मीमांसा, शून्यवाद, योगाचार या विज्ञानवाद, लोकायत, नास्तिक आस्तिक के द्वन्द्वआदि जटिल विषयों को सरल सहज रूप में मूल्यांकन का विषय बनाया गया है। पश्चिमी दर्शन के यूनानी विचारधारा के दार्शनिकों की विवेचना भी युक्तिसंगत की गई है। ईश्वर, प्रकृति, अंधविश्वास, रूढ़िवाद आदि तत्वों का रोचक उद्घाटन इसमें किया गया है। बी० ए० ऑनर्स और एम० ए० के छात्रों के लिए उच्चतर अध्ययन की ओर अग्रसर होने में यह ग्रंथ प्रेरक होगा।
डॉ० हरिनारायण गुप्त पटना के मूल नगरवासी हैं; इनकी शिक्षा-दीक्षा (मैट्रिक से लेकर एम० ए० स्तर तक) प्रबुद्ध व्यक्तियों के सत्संग में हुई है; राजेन्द्र सिंह मेमोरियल हाई स्कूल (गर्दनीबाग) से मैट्रिक के बाद आइ० ए०, बी० ए० (ऑनर्स) दर्शनशास्त्र, एम० ए० तथा पी-एच०डी० पटना विश्वविद्यालय से हुए; दर्जनों शोधपत्र मानक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित; वर्तमानावस्था में भागलपुर तिलका मांझी विश्वविद्यालय के अंतर्गत श्री कृष्ण रामरुचि महाविद्यालय (बरबिघा) में सहायक प्रोफेसर; दर्शन से सम्बद्ध कतिपय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, संगठनों के सक्रिय बुद्धिजीवी सदस्य ।
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