धनंजय वर्मा जन्म : 14 जुलाई, 1935। ग्राम छातेर, तहसील: उदयपुरा। शिक्षा : जगलपुर, रायपुर और सागर में। आजीविका: छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर, जगदलपुर, भोपाल, खण्डवा, नरसिंहपुर, बरेली के महाविद्यालयों में अध्यापन। संस्कृति विभाग म.प्र. शासन में विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी, मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् के प्रथम सचिव, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के पूर्व कुलपति । कृतियाँ : निराला : काव्य और व्यक्तित्व, आस्वाद के धरातल, अँधेरा नगर, निराला काव्य पुनर्मूल्यांकन, हस्तक्षेप, आलोचना की रचना यात्रा, अँधेरे के वर्तुल, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, आधुनिकता के प्रतिरूप, समावेशी आधुनिकता, हिन्दी कहानी का रचनाशास्त्र, हिन्दी कहानी का सफरनामा, हिन्दी उपन्यास का पुनरावतरण, हमको मालूम है जन्नत की हकीकत, परिभाषित परसाई, आलोचना के सरोकार, लेखक की आज़ादी, आलोचना की ज़रूरत, परम अभिव्यक्ति की खोज, आलोचक का अन्तरंग, एक आवाज़ : सबसे अलग, नीम की टहनी (कविताएँ); साझी विरासत (उर्दू काव्य विमर्श) अभिव्यक्ति के रूपाकार, आलोचना आयाम। सम्पादनः हिन्दी कहानी, कविता आलोचना, भाषा की उन्नीस पुस्तकों के अलावा मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका 'वसुधा' का सम्पादन । निधन: 28 जनवरी 2024
समावेशी आधुनिकता के प्रतिरूप' पुस्तक में वर्मा जी के आठ निबंध संकलित हैं जो भारतीय और पाश्चात्य संदभों में आधुनिकता से संबंधित विभिन्न वहसों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। विभिन्न विचार सरणियों के चिंतकों और साहित्यकारों के अभिमतों की रोशनी में आधुनिकता की जटिल अवधारणा की गिरहें खोलने का प्रयास इन निबंधों में किया गया है। ये निबंध अलग-अलग समय में लिखे जाते रहे हैं। इनका यहाँ एकत्र रूप आधुनिकता की एक मुकम्मल तस्वीर बनाता है। पहले अध्याय के आरंभ में ही वर्मा जी ने एक बुनियादी बहस छेड़ दी है। वह यह कि आधुनिकता को प्रायः पश्चिमी संदर्भों में ही परिभाषित किया जाता रहा है। पूरा पश्चिम भी नहीं, इसके कुछ देशों और उनके साहित्यों तक ही लोगों की दृष्टि सीमित रही है। विश्व के अन्य देशों और विशेषतया भारत के समसामयिक साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य में आधुनिकता को जाँचा-परखा जाना चाहिए; क्योंकि हमारी आधुनिकता भारतीय परिस्थितियों की पैदावार है, इसका पश्चिम की आधुनिकता से कोई खास लेना-देना नहीं है। नये विचार और धारणाएँ, वे किसी भी मूल के हों, यदि अपने समय और समाज को ज़्यादा वस्तुपरक ढंग से देखने में सहायक साबित होते हैं तो उनसे असर ग्रहण करना एक स्वाभाविक बात है, लेकिन आधुनिकता के निकष हमारी स्थानीय चिंतन परंपरा की सापेक्षता में तय होना चाहिए। पाश्चात्य दृष्टिकोण को समझने के लिए वर्मा जी ने मुख्यतः आधुनिक काव्य की वृहत्त्रयी डब्ल्यू.बी. एट्स, एज़रा पाउंड और टी. एस. एलियट के साथ-साथ अमरीकी कवि राबिंसन, विटमैन और राबर्ट फ्रास्ट का अनुशीलन प्रस्तुत किया है। जाहिर है इनकी आधुनिकता के मूल में इंग्लैंड और अमरीका की परिस्थितियों रही हैं।
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