भूमिका
प्रस्तुत ग्रंथ प्राचीन भारत में नैतिकता, सिद्धांत और व्यवहार में (600ई०-700 ई०) मेरे पीएच० डी० शोध-प्रबंध का भाग है। इसमें वस्तुतः आलोच्यकालीन जीवन में नैतिकता को सिद्धांत और व्यवहार में देखने और वैचारिक बुनावट को परखने का एक अपने ढंग का प्रयत्न किया गया है। वह इसलिए कि संपूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के विभिन्न आयामों पर अनेक तरह के काम हुए, विभिन्न प्रकार के अध्ययन-अनुशीलन-शोध अनेकानेक विद्वानों के द्वारा प्रस्तुत किए गए, लेकिन किसी ने भी नैतिकता की अवधारणा को सिद्धांत और व्यवहार में जांचकर इस तरह का विमर्श नहीं किया है। उल्लेखनीय है कि अनंत सदाशिव अल्तेकर', राधा गोविंद बसाक, प्रबोध चंद्र बागची', एस० बील', एस० भट्टाचार्य, दिनेशचंद्र सरकार', रमेशचंद्र मजुमदार', कार्ल मार्क्स, मोहम्मद अकीक, सी० वी० वैद्य', एम० हास्नूर रशीद", एन० रे', लल्लनजी गोपाल, बी० एच० बेडेन पावेल', रीस डेविड्स', टी० वाटर्स, रामशरण शर्मा', वासुदेवशरण अग्रवाल', बी० उपाध्याय', के० एलन, के० एम० पण्णिकर, डी० डी० कोसंबी, टॉड्स, दासगुप्ता, देवराज चानना, एस० दत्त, डी० देवाहुति, राजबली पाण्डेय, आई० टी० फ्लोव, एच० डी० संकालिया, आर० सी० हाजरा, जी० एफ० होरानी, रमाशंकर त्रिपाठी तथा सुवीरा जायसवाल आदि ने आलोच्यकालीन एवं प्राचीन भारतीय सामाजिक-धार्मिक-व्यवस्था एवं विचार पर अपने-अपने ढंग से प्रकाश डालने का प्रयास किया है। लेकिन किसी ने भी नैतिकता का मूल्यांकन संपूर्ण परिपेक्ष्य में सिद्धांत और व्यवहार के संदर्भ में नहीं किया है।
अत्यंत प्राचीन काल में व्यक्तिगत संपत्ति पर आधारित सामाजिक-व्यवस्था एवं तज्जनित सुरक्षा-संकट से उत्पन्न परिस्थिति का सामना करने के लिए वैचारिक हथियार के रूप में संपूर्ण जीवन की नीति निदेशक नैतिकता के स्वरूप को विकसित एवं प्रचारित कराया जाने लगा। चूँकि नैतिकता देशकालसापेक्ष है इसलिए नैतिकता सिद्धांत और व्यवहार में कहाँ तक लागू थी, कहाँ उसकी उपेक्षा की गई और कहां उसे संकुचित कर दिया गया, आदि प्रश्नों के विश्लेषण करना इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य है। इतिहासकारों ने बार-बार इसका उल्लेख किया है कि प्राचीन भारतीय समाज में नैतिकता का प्रचलन था। लेकिन इस सिद्धांत का प्रचलन व्यवहार में सही अर्थों में हो रहा था या नहीं, इस पर किसी ने भी विचार नहीं किया है। बिहार विश्वविद्यालय में वैदिक कालीन नैतिकता पर एक शोध-प्रबंध है जो अभी तक अप्रकाशित है। उसमें भी मेरे उद्देश्य के अनुसार विमर्श नहीं है। अतः विषय की वैज्ञानिकता एवं अरहस्यात्मकता के लिए इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि नैतिकता का अर्थ-बोध समाज में कैसा था, उसकी प्रकृति कैसी थी, परिस्थिति के अनुसार उसको परिवर्तित करने की परंपरा का स्वरूप क्या था, आदि। पूर्वकालों की तरह आलोच्यकाल (600ई०-700ई०) में भी सुविधासम्पन्न शासक वर्गों ने व्यवस्था संचालन के लिए नैतिकता-संबंधी नियम और आदर्श अपने हितों को ध्यान में रखकर बनाए । खास भौतिक परिस्थितियों में उत्पन्न नैतिक आदर्श की आवश्यकता की आवरणवाली भूमिका वस्तुतः मानवीय संबंधों को निर्धारित करने के लिए अनिवार्य-सी होती रही है। इसलिए इस काल (600ई०-700ई०) में नैतिकता का स्वरूप क्या था और किन परिस्थितियों में उसका स्वरूप परिवर्तनशील रहा अर्थात् समाज की तत्कालीन बुनावट में आलोच्य विषय की क्या स्थिति थी आदि को प्रस्तुत करने का यह पहला प्रयास है। विषय की तरह इस आलोच्य काल का चुनाव भी महत्वपूर्ण है। यह काल भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि यह वह कालखंड है जो प्राचीन भारतीय इतिहास का अंतिम टुकड़ा है, इसलिए यह प्राचीन और पूर्व-मध्य दोनों का संक्रमण है। उससे पूर्व में उत्पन्न एवं विकसित होती सामंती व्यवस्था एक खास विकासचरण पा चुकी थी और जिसके कारण तत्कालीन भारतीय मानव समाज के स्वरूप में काफी बदलाव हो चुके थे जिसकी अभिव्यक्ति साहित्यिक स्त्रोतों में अपने ढंग से की गई है। इस माहौल में सिद्धांत और व्यवहार की दृष्टि से नैतिकता का क्या हाल था, यही जिज्ञासा इस पूरे शोध-प्रबंध में सक्रिय रहेगी ।
नैतिकता पूर्वकालों की तरह आज भी अपने अर्थ-बोध की तलाश में विद्वानों एवं दार्शनिकों में गहरे विमर्श और विवाद की वस्तु है। यदि इस पर थोड़ा प्रकाश डाला जाए तो आलोच्यकालीन विषय की वास्तविकता पर से रहस्यात्मकता का पर्दा उठाने में मदद मिल सकती है। अनिरूद्ध झा एवं रामनंदन मिश्र ने अंग्रेजी शब्द 'राइट' की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'रेक्टस' से बतलाते हुए यह स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ है सीधा या नियम के अनुकूल अर्थात् उचित कर्म, वह कर्म जो नैतिक नियम के अनुसार हो । उन्होंनै पुनः प्रकाश डाला है कि चूंकि 'गैंग' शब्द का अर्थ है टेढ़ा या नियम के अनुसार नहीं होना, इसलिए अनुचित वह है जो नैतिक नियम के अनुकूल नहीं हो।" रोमिला थापर की धारणा है कि समाज द्वारा उचित अनुचित की भावना के आधार पर बने नियम ही सही अर्थ में नैतिकता हैं जो देशकालसापेक्ष होते हैं, जो देश की संरचना, भौगोलिक परिस्थिति, राजनैतिक तथा आर्थिक स्थिति और मुख्यतः सामाजिक स्थिति पर निर्भर हैं। उसी तरह भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार नैतिकता समाज द्वारा मान्य वैसे नियम हैं जिन्हें समाज आवश्यकतानुसार स्वयं अपनाता है।" जी० के० अग्रवाल ने नैतिकता को बिना किसी अपवाद के जीवन के सारे क्षेत्रों में मनुष्य के आचरण को नियंत्रित करने वाली एक प्रकार की सामाजिक चेतना एवं सामाजिक संस्था बतलाया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया हे कि जिन नियमों की स्वीकृति ईश्वरीय सत्ता से नहीं बल्कि समाज द्वारा उचित और अनुचित की भावना के आधार पर निर्मित नियमों के आचरण के रूप में होती है वही नैतिकता है। इसको पुष्ट करने के लिए उन्होंने डेविस के विचार कि नैतिकता कर्त्तव्य की आंतरिक भावना अर्थात् उचित और अनुचित पर बल देती है, को भी उद्धृत किया है। उन्होंने फिर साफ किया है कि नैतिकता का मूलमंत्र समाज की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जटिलताओं तथा तनावों को एक सुरक्षित धारा में स्थापित करना है। इसमें समाज का वैसा वर्ग काफी महत्वपूर्ण साबित होता है जो नैतिक परिवेश का दोहन कर अधिक समर्थ हुआ है या अधिक सुविधा प्राप्त करना चाहता है। ऐसी अवधारणाओं से यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट है कि अपनी सुविधाओं को सुरक्षित बनाने हेतु तरह-तरह के नैतिक नियमों को बनाया जाता है। बटलर के अनुसार, अंतःकरण की दो क्रियाएँ हैं। पहले से हमें नैतिक धारणाएँ और नियम प्राप्त होते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कौन-सा कार्य उचित या अनुचित है और किसे करना या न करना हमारा कर्त्तव्य है। दूसरी से उन पर आचरण करने की आज्ञा मिलती है। ऊपर के विचारों से भिन्न डेकार्ट, लॉक तथा पेली आदि विद्वानों ने नैतिकता की उत्पत्ति धर्म से मानी है। इनके अनुसार धर्म ही नैतिकता का स्रोत है और दैविक नियम ही नैतिक नियम हैं क्योंकि ईश्वर जिनको करने की आज्ञा देता है वे ही उचित कर्म हैं और जिनका निषेध करता है वे अनुचित कर्म हैं। उनलोगों ने स्पष्ट किया है कि धर्म के ज्ञान के बिना नैतिकता का ज्ञान असंभव है अर्थात् आचारशास्त्र धर्मशास्त्र पर आश्रित है। लेकिन दूसरी ओर कांट, मार्टिन्यू तथा कुछ अन्य विचारकों ने थोड़ा हटकर नैतिकता को धर्माश्रित बतलाते हुए नैतिकता से ही धर्म की उत्पत्ति बतलाई है।" इसके विपरीत कुछ विद्वानों ने नैतिकता के दैविक नियम का विरोध करते हुए कहा है कि दैविक नियम पर आधारित नैतिकता का दोष यह है कि यह नैतिकता को ईश्वर की इच्छा पर आधारित मानता है और ईश्वर जिन कर्मों को करने की आज्ञा देता है, वे उचित कर्म है तथा जिन कर्मों को करने से मना करता है वे अनुचित हैं। उसी तरह यह भी विचारणीय है कि नैतिकता की धारणा को इसकी विशेषताओं के द्वारा समझा जा सकता है क्योंकि इसका संबंध चारित्रिक गुणों से है, किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास से नहीं। उन्होंने मजबूती से खुलासा किया है कि नैतिकता का रूढ़िवादिता से कोई संबंध नहीं होता क्योंकि रूढ़िवादिता प्रत्येक स्थिति में व्यवहार के परंपरागत तरीकों को ही मान्यता देती है जबकि नैतिकता इसमें कुछ कर लेने की स्वीकृति देती है।
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