प्राक्कथन
मुंडा आदिवासी अपनी संस्कृति, सभ्यता के लिये धनी है। प्रकृति से संस्कृति की ओर विकासशील जीवन की हर अवस्था के लिये काम, कला, गीत, नृत्य, जीवन शैली का समान महत्व है। परिवर्तन की जिस अवस्था में इसका सम्बन्ध उन कलाओं से टूट जाता है वह यह तो उसके ह्रास की अवस्था है अथवा तथाकथित संस्कृति के नाम पर उनमें विकृति आ रही है। प्रकृति को ही विकसित, संयम, मर्यादित और उपयोगी बनाने का नाम संस्कृति है। जो विकास प्रकृति को मिटा कर या उसका गला घोटकर किया जाता है. उस पीछे हटी हुई ऋणप्रकृति का नाम विकृति है। यह कथन पं. जगदीश त्रिगुणायत की है। सच कहा जाये तो यह आज के संर्दभ में सही चरित्रार्थ भी होता है। इस पुस्तक के माध्यम से मुंडाओं के विभिन्न पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है। मुंडा समाज क्या है? कैसा है? इनके किया-कलाप एवं रहन-सहन साथ ही भाषा संस्कृति और सभ्यता को दिखाने का प्रयास किया गया है। मुंडाओं के जीवन दर्शन किस तरह के गीतों में परिलक्षित होते हैं। क्यों इन्हे संगीत के लिये अमीर कहा जाता है। परिश्रामी होने के साथ गीत संगीत का इनके जीवन में क्या महत्व है? इनकी परम्पराएँ हमें क्या बताना चाहती हैं? इनके साहित्य का विकास किस तरह से हुआ और हो रहा है? क्यों इनके गीतों में प्रकृति चित्रण की परम्परा अब भी बनी हुई है? यह परम्परा कब से और क्यों चली आ रही है? पुरखा से चली आ रही लोक मानस के गीतों, कहानियों, कहावतों, लोकोक्तियों और इनके समाजिक व्यवस्था को समझने एवं संग्रह करने की अवश्यकता क्यों है? अनेक ऐसे सवाल हैं जो आज की पीढ़ी जानने के लिये आतूर है। इस पुस्तक के माध्यम से ऐसे सवालों के जबाब कुछ हद तक मिल जायेंगे।
लेखक परिचय
नाम: गोपाल कृष्ण शर्मा उपनाम : मृदुल शर्मा पिता स्व. श्री राम नाथ शर्मा माता स्व. श्रीमती गंगा देवी जन्मतिथि: 01 मई, 1952 जन्म स्थान : ग्राम एवं पत्रालय गुनारा, तहसील जलालाबाद, जनपद शाहजहाँपुर (उ.प्र.) शिक्षा: एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.। व्यवसाय : सेवानिवृत्त अधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक। डॉ० गोपाल कृष्ण शर्मा प्रकाशित कृतियाँ : 1. विद्रोही सुभाष (मुक्तक खंड काव्य), 2. अंकुर (गीत गजल संग्रह), 3. नागफनी के फूल (गीत गजल संग्रह), 4. पंख नुचे सुखबि (नवगीत संग्रह), 5. साबरमती का दर्द (कहानी संग्रह). 6. कही-अनकही (लघु उपन्यास). 7. कस्तूरी गंधावित मन (गीत-नवगीत संग्रह), 8. कविता का 'क' (निबंध संग्रह उ० प्र० हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत). 9. प्रेम न हाट बिकाय (कहानी संग्रह), 10. कोशिश के कन्धे (नवगीत संग्रह उ० प्र० हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत), 11. आओ बच्चों, गायें गीत (बाल गीत) 12. एक और यशोधरा (कहानी संग्रह) 13. राजभाषा हिन्दी अतीत, वर्तमान और भविष्य। 14. स्व-निर्माण संहिता 15. डॉ. लक्ष्मी शंकर मिश्र 'निशंक' (आलोचनात्मक कृति) 16. संकरी गली (कहानी संग्रह), 17. जेठ जिए कचनार (दोहा-संग्रह), 18. कोई बात नहीं (गजल संग्रह), 19. सरल सुबोध-हिन्दी पत्र-लेखन, 20. चक्रव्यूह (उपन्यास), 21. मोहभंग (लघुकथा संग्रह), 22. पूछिये मत (नवगीत-संग्रह), 23. खिसका हुआ आदमी (कहानी संग्रह), 24. छन्द-मकरन्द, 25. परमहंस की पीड़ा (महान क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के जीवन पर आधारित उपन्यास), 26. अजेय योद्धा (महान क्रान्तिकारी पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के जीवन पर आधारित उपन्यास)।
सहयोगी संकलन : प्रीति के गीत, पीढ़ी बोल उठी, कविता गूँजते स्वर, ढाई आखर, गीत-गुंजन, धूप के संगमरमर, लखनऊ के प्रतिनिधि गीतकार, नवगीत और उसका युगबोध, शब्दायन, गीत वसुधा, नवगीत के नये प्रतिमान, नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्यबोध, नयीं सदी के स्वर, गीत वत्सल, दोहे के सौ रंग, हम असहमत हैं समय से, गुनगुनायें गीत फिर से, इस दौर की गज़लें, यत्र नार्यस्यतु पूज्यन्ते, नयी सदी के दोहे आदि।
प्रकाशनाधीन: 1. बोनसाई (उपन्यास), 2. साधना के सुमन (आलोचनात्मक कृति), 3. क्रान्तिकारी चेतना के अग्रदूत (ग्यारह महान क्रान्तिकारियों का जीवन वृत्त)। विशेष : 1. 'डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा 'मृदुल' की काव्य साधना' विषय पर लखनऊ विश्वविद्यालय में कु. रीता वैश्य द्वारा वर्ष 2005 में एम.फिल. हेतु शोध, 2. भारतीय स्टेट बैंक द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सेवा हेतु सम्मानित, 3. उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2014 के महावीर प्रसाद द्विवेदी नामित पुरस्कार से सम्मानित। 4. उ. प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा वर्ष 2016 का निराला नामित पुरस्कार से सम्मानित।, 5. कथा गंथा पुरस्कार। 6. अखिल भारतीय साहित्य परिषद, मथुरा द्वारा 'विद्रोही सुभाष' नामक कृति पर वर्ष 1978 में साहित्यालंकार की मानद उपाधि, 7. अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित, 8. साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा के द्वारा 'हिन्दी साहित्य मनीषी' की मानद उपाधि, 9. उ० प्र० हिन्दी संस्थान द्वारा 'साहित्य भूषण सम्मान'।
संप्रति चेतना स्रोत पत्रिका का अवैतनिक संपादन और स्वतंत्र लेखन।
पुस्तक परिचय
देश या समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए होते हैं पुरुष और स्त्री। जब तक दोनों में सामंजस्य नहीं होगा तब तक देश या समाज आगे नहीं बढ़ सकता। किसी भी साहित्यकार का नारी संबंधी लेखन आधी आबादी का लेखन होता है इस दृष्टि से रचनाकार की नारी संबंधी सोच का अध्ययन अपने में महत्वपूर्ण है ।नारी ही वह कड़ी है जो परिवार के सदस्यों को और समाज के विभिन्न लोगों को आपस में जोड़ती है। वह बच्चों को केवल जन्म ही नहीं देती उसे संस्कार भी देती है। पुस्तक के आरंभ में वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक की नारियों की पारिवारिक, सामाजिक दशा और जीवन मूल्यों की विस्तृत व्याख्या की गई है। फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी के सर्वोत्कृष्ट कथाकारों में रहे हैं। बिहार जैसे पिछड़े राज्य के एक छोटे से गांव औराही हिंगना में जन्मे रेणु केवल बिहार में ही नहीं विश्व में भी विख्यात हुए।गांव की जिंदगी को उन्होंने बहुत ही करीब से देखा था ।यही कारण है कि उनकी रचनाओं में लोक जीवन उभर कर सामने आता है। रेणु जी का व्यक्तित्व और उनके जीवन उन पर विविध विचारकों गांधी, लोहिया मार्कुस, फ्रायड आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा। अतः इन विचारों का अध्ययन भी समीचीन है। रेणु जी के कथा साहित्य में आए चरित्र कई दृष्टियों से बहुत आकर्षक, जीवंत और स्वाभाविक रहे हैं। जहां तक नारी चरित्र का प्रश्न है वह तो काफी वह वैविध्यपूर्ण और आकर्षणयुक्त रहे हैं। संबंध सापेक्षता की दृष्टि से भी ये अद्भुत है ।इन नारी चरित्र में अनूठी संबंध सापेक्षता है। वे एक साथ एकाधिक मानवीय संबंधों को निभाने की चुनौती को स्वीकार भी करती है और उन्हें निभाकर एक आदर्श भी प्रस्तुत करती है। रेणु जी के इन नारी चरित्र यथा मां बहन बेटी, पत्नी, प्रेयसी और सखा आदि रूपों के अध्ययन से नारी मनोविज्ञान को समझा जा सकता है। अतः रेणु जी के कथा साहित्य में वर्णित नारी भावना का अध्ययन न केवल उसमे वर्णित समाज और संस्कृति का अध्ययन है बल्कि रेणु जी के नारी विषयक दृष्टिकोण को समझने का उपयुक्त साधन भी है।
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