प्रस्तावना
सनातन समाज को संगठित करने के अलग-अलग देशों में हुए प्रयत्नों में म्यांमार (१९८९ तक ब्रह्मदेश या बर्मा) अपने आप में एक अलग स्थान रखता है। किसी समय बर्मा सांस्कृतिक भारत का ही एक भाग था। 1885 में बर्मा के राजा ती बाँव को अंग्रेजों ने अपदस्थ कर दिया और बर्मा ब्रिटिश उपनिवेश बन गया। उस काल में भारत से किसान समाज को कृषि के लिए बर्मा भेजने का दौर शुरू हुआ। कई अन्य भारतीय भी वहाँ नौकरी और व्यापार के लिए जाने लगे। वहाँ के अनेक नगरों एवं गांवों के नाम भी भारतीय हैं। 1937 में बर्मा को भारत से अलग कर दिया। 1948 में बर्मा को स्वतंत्रता मिली। इन सब कारणों से उस समय के वर्मा को भारतीय समाज ने अपने राष्ट्र के विस्तृत अंग के रूप में ही देखा था। भारत बर्मा के बीच लोगों का आना-जाना सामान्य बात थी। बर्मा का समाज पूर्णरूपेण बौद्ध धर्मानुनायी था और अब भी है। वहाँ के राजकारण और समाज जीवन पर बौद्धधर्म का प्रभाव था। हिन्दू समाज एक घटक के रूप में वहाँ के समाज से घुलमिल कर रहता था, जिसमें तमिल, तेलुगू, राजस्थानी, गुजराती, बिहारी, उत्तर प्रदेश के वासी, बंगाली, उडिया और कुछ पंजाबी भी थे। प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध होते हुए भी अंग्रेजों के सामन्तवादी शासन के प्रभाव के कारण बर्मा आर्थिक दृष्टि से विपन्न हो गया और विश्व की दृष्टि से ओझल हो गया। म्यांमार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी काफ़ी वर्षों तक बर्मा, और भारतीयों के लिए ब्रह्मदेश ही रहा। इसका नामकरण म्यांमार के रूप में १९८९ में हुआ। अतः वहाँ के रहने वाले भारतीय और भारत के लोग अभी भी बर्मा म्यांमार पर्यायवाची नामों की तरह प्रयोग करते रहते हैं। यही प्रयोग आप बीच-बीच इस पुस्तक में भी पाएंगे। प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध होते हुए भी अंग्रेजों के सामन्तवादी शासन के प्रभाव के कारण बर्मा आर्थिक दृष्टि से विपन्न हो गया और विश्व की दृष्टि से ओझल हो गया। म्यांमार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी काफ़ी वर्षों तक बर्मा, और भारतीयों के लिए ब्रह्मदेश ही रहा। इसका नामकरण म्यांमार के रूप में १९८९ में हुआ। अतः वहाँ के रहने वाले भारतीय और भारत के लोग अभी भी बर्मा म्यांमार पर्यायवाची नामों की तरह प्रयोग करते रहते हैं। यही प्रयोग आप बीच-बीच इस पुस्तक में भी पाएंगे। सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ (एसडीएसएस) की स्थापना और विकास का वर्णन इसके पहले प्रचारक रामप्रकाश धीर जी द्वारा उनके अंतिम वर्षों में म्यांमार में निवृत्त जीवन के दौरान अपने संस्मरणों में किया है। इसके अतिरिक्त जगनमोहन बण्डी एवं डॉ. रामनिवास के प्रयत्नों से संघ के पहली पीढ़ी के कुछ प्रमुख कार्यकर्ताओं के संस्मरणों को भी संकलित किया गया। यह इतिहास उन्हीं संकलित विवरणों एवं कुछ वहाँ के, कुछ भारत में पुनस्र्थापित हुए स्वयंसेवकों के साथ हुई चर्चा के आधार पर संकलित किया गया है। कई ऐतिहासिक घटनाओं और विपरीत परिस्थितियों की मार सहते हुए भी और वहाँ के सर्वथा अलग सांस्कृतिक और धार्मिकता के वातावरण में भी सनातन समाज के लिए समरस होकर सफलतापूर्वक कार्य करने का प्रेरक विकास म्यांमार में हुआ है। सारे विश्व में जहाँ-जहाँ सनातन धर्म के समाज को संगठित करने के प्रयत्न हुए, उनमें समाज के साथ एक रूप होकर, और वहाँ के समाज को सीधे संघ से जोड़ने के सबसे सफल प्रयोगों में म्यांमार के सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ के कार्य को उच्च बिंदु माना जा सकता है। यह कथा है ऐसे संगठन की, और उसके निःस्वार्थी निस्पृह कार्यकर्ताओं की।
लेखक परिचय
डॉ रतन शारदा को उनके शोध ग्रंथ 'Understanding RSS through its resolutions with focus on Jammu Kashmir, Punjab and North East' के लिए पीएचडी उपाधि से सम्मानित किया गया। मुंबई में जन्मे रतन शारदा ने सेंट जेवियर महाविद्यालय से स्नातक और मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर अध्ययन पूर्ण किया। वस्त्र रसायनशास्त्र विषय में डिप्लोमा भी प्राप्त किया। वे ERP सलाहकार के रूप में कई उद्योगों का अनुभव लेते हुए ३४ वर्षों तक कार्यरत रहे। भारत के दूरदर्शन माध्यमों में एक ख्यातिप्राप्त राजनीतिक विश्लेषक के रूप में आप प्रस्थापित हैं और एक लोकप्रिय पॉडकास्टर भी हैं। डॉ शारदा ने हिंदी और अंग्रेजी में ११ पुस्तकें लिखी हैं, जिनमे से ७ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हैं और १७ पुस्तके संपादित कर चुके हैं। गहन विचारक माननीय रंगा हरि जी की परम पूजनीय श्री गुरुजी पर लिखित दो पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। संघ पर उनकी लिखी ज्यो - RSS360° - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परत दर परत, RSS Evolution from an Organisation to a Movement और संघर्ष से समाधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शैली - संघ को समझने उत्तम संग्रह माना जाता है। उनकी 'संघ और स्वराज' स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर एक सर्वमान्य संशोधित पुस्तक है। आपकी पुस्तकें ७ भारतीय भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं। डॉ रतन शारदा बचपन से संघ के स्वयंसेवक रहे हैं और संगठन में स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक कार्य कर चुके हैं। उन्होंने १९७५-७७ के आपातकाल के समय विद्यार्थी परिषद के सदस्य के रूप में अपने महाविद्यालय के स्टूडेंट यूनियन के सचिव के रूप में जेल प्रवास भी किया। शारदा ने विश्व अध्ययन केंद्र के संस्थापक महासचिव के रूप में ८ वर्ष जिम्मेदारी संभाली। अब वे कई शैक्षणिक डॉ रतन शारदा बचपन से संघ के स्वयंसेवक रहे हैं और संगठन में स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक कार्य कर चुके हैं। उन्होंने १९७५-७७ के आपातकाल के समय विद्यार्थी परिषद के सदस्य के रूप में अपने महाविद्यालय के स्टूडेंट यूनियन के सचिव के रूप में जेल प्रवास भी किया। शारदा ने विश्व अध्ययन केंद्र के संस्थापक महासचिव के रूप में ८ वर्ष जिम्मेदारी संभाली। अब वे कई शैक्षणिक और सामाजिक संस्थाओं के सलाहकार के रूप में व्यस्त रहते हैं। आप भारत का और विश्व के २६ देशों का व्यापक प्रवास कर चुके हैं। हिंदू स्वयंसेवक संघ के बारे में उन्हें विशेष स्नेह हैं, क्योंकि उनके पूज्य चाचाजी श्री जगदीश चंद्र शारदा शास्त्री जी का भारत के बाहर पहली संघ की शाखा लगाने में संस्थापक जैसी भूमिका रही। वे स्वयं भी HSS के कार्य में हिस्सा लेते रहे हैं। वर्तमान में विभिन्न देशों में HSS के इतिहास पर वे एक श्रृंखला लिखने में व्यस्त हैं।
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