सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रसंग आने पर अनायास ही पेशवा नानासाहब का स्मरण हो आता है। उनका मूल नाम गोविन्द था। उनके जन्मदाता पिता माधवजी नारायण भट्ट महाराष्ट्र की माथेरान पर्वत मालाओं के अन्तर्गत वेणु ग्राम के निवासी थे, जो पेशवाई की समाप्ति पर पदच्युत पेशवा बाजीराव द्वितीय के आश्रय में बिठूर आ गए थे। पेशवा पुत्रहीन था। अतः उसने बालक गोविन्द को अपना दत्तक पुत्र बना लिया ।
पेशवा की मृत्यु पर अंग्रेजी सरकार ने नानासाहब को अन्यायपूर्वक उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया। इस पर उन्होंने अनुभव किया कि केवल उन्हीं के साथ ऐसा नहीं हुआ था, अपनी हड़प नीति से अंग्रेजों ने समस्त भारत को दासता की श्रृंखलाओं में जकड़ लिया था। नांनासाहब ने मातृभूमि की स्वाधीनता का संकल्प लिया, जिसके परिणामस्वरूप यह प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम अस्तित्व में आया और प्रायः समग्र उत्तरी भारत मातृभूमि को स्वाधीन कराने के लिए रणभूमि में उतर पड़ा ।
यद्यपि अंग्रेजों ने इसे एक सैनिक विद्रोहमात्र कहकर महत्त्वहीन करने का प्रयत्न किया है, तथापि आज अनेक निष्पक्ष समीक्षक इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम मानते हैं। पेशवा नानासाहब मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए जीवनपर्यन्त संघष करते रहे। इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली, यह एक भिन्न विषय है, किन्तु भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में उन्होंने सर्वप्रथम जिस अध्याय की सर्जना की, वह अपने-आप में एक अविस्मरणीय प्रेरक प्रसंग है। उस समय नाना-साहब द्वारा प्रज्वलित इस क्रांति ज्योति का भले ही दमन कर दिया गया, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं कि यह ज्योति सदा-सर्वदा के लिए बुझ गई, यह ज्योति बुझी नहीं, अपितु इसी से प्रेरणा पाकर भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का जन्म हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारत को स्वाधीनता मिली। नानासाहब के इस प्रयत्न के लिए भारत सदा उनका ऋणी रहेगा।
पेशवा नानासाहब ही प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के सूत्रधार थे। इसकी योजना उन्हीं के बिठूर के महल में बैठकर बनाई गई थी। वीर तात्या टोपे, अजीमुल्लाखां, ज्वालाप्रसाद आदि अनेक परम विश्वासपात्र एवं सहयोगी थे। इन्हीं के सहयोग से उन्होंने इस क्रान्ति का प्रचार-प्रसार एवं कार्यान्वग्रन किया ।
मुगल सम्राट् बहादुरशाह इस क्रान्ति के नेता बनाये गये और मुगलों की हरित पताका ही इसकी ध्वजा बनाई गई। इस महानतम उद्देश्य के लिए एक नेता एवं एक पताका का विचार मिश्चय ही नानासाहब की राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचायक था। इस क्रान्ति का प्रचार-प्रसार जिस गोपनीयता के साथ किया गया, उसकी स्वयं अंग्रेज इतिहासकारों ने भी प्रशंसा की है।
इस छोटी सी पुस्तक में पेशवा नानासाहन के जीवन चरित की अधिक-तम सामग्री को संक्षिप्त रूप में देने का प्रयास किया गया है। पुस्तक के लेखन में श्रीयुत् श्रीनिवास बालाजी हर्डीकर की पुस्तक '1857 का स्वा-घीनता संग्राम' और 'तात्या टोपे', श्री दत्तात्रेय बलवन्त पारसनीस की पुस्तक 'महारानी लक्ष्मीबाई', श्री विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक 1857 का स्वतन्त्रता युद्ध' आदि से साभार सहायता ली गई है।
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