ओड़िआ भाषा एक प्राचीन शास्त्रीय आर्यभाषा है। निरंतर बहनेवाली नदी की धारा जिस तरह उसके जल को स्वच्छ और शुद्ध करती है ठीक उसी तरह ओड़िआ भाषा भी ई० पूर्व के समय से लेकर आजतक अपनी निरंतर प्रवहमान धारा के कारण शुद्ध, कमनीय और शास्त्रीय बन पायी है। वेद तथा भाषाशास्त्र में वर्णित शास्त्रीय लक्षण, दार्शनिक तथा भाषातात्त्विक पृष्ठभूमि, संरचना का स्वांतत्र्य, ग्रहणशीलता, व्याकरण श्रृंखला, महत्त्वपूर्ण साहित्यिक परंपरा तथा मौलिक सर्जना के साथ निरंतर विकास के कारण ओड़िआ भाषा शास्त्रीय भाषा बन सकी है। किसी भी भाषा की शास्त्रीयता को जानने के लिए उसका महत्त्वपूर्ण आधार है भाषा विज्ञान। ओड़िआ भाषा का ऐतिहासिक भाषाविज्ञान, सामाजिक भाषाविज्ञान, संरचनात्मक भाषाविज्ञान, तुलनात्मक भाषाविज्ञान, वर्णनात्मक भाषाविज्ञान, मनोभाषा विज्ञान, शब्द विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, वाक्य विज्ञान, रूप विज्ञान, लिपि विज्ञान, शैली विज्ञान तथा व्युत्पत्ति विज्ञान आदि के अध्ययन और अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि ओड़िआ एक शास्त्रीय भाषा है। भाषाविज्ञान के आधार पर गहराई से ओड़िआ भाषा का अध्ययन और शोध अब तक संभव नहीं हो सका है। इसी कारण पंद्रह वर्ष पहले मैंने संबलपुर विश्वविद्यालय के ओड़िआ मुखपत्र 'सप्तर्षि' में स्नातकोत्तर ओड़िआ शिक्षा एक अनुशीलन' के नाम सेएक लेख लिखा था। ओड़िआ भाषा के लिए विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा की प्रासंगिकता पर विविध पत्र-पत्रिकाओं में पिछले तीस वर्षों से मैंने कई लेख लिखे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ओड़िआ भाषा अध्ययन के साथ-साथ उसके गौरव से परिचित करवाने के लिए भी मैंने अनेक आलेख लिखे । समाज के संपूर्ण विकास के लिए आंचलिक भाषाओं के विकास को शिक्षा आयोग ने विशेष महत्त्व प्रदान किया है। तब भी अब तक भाषा शिक्षण का विकास आवश्यकतानुरूप नहीं हो पाया, वरन् सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे हटकर ओड़िआ भाषा अब क्रमशः कमजोर होने लगी है।
अच्छी बात यह है कि प्रांतीय भाषाओं के विकास के लिए सन् 2004 ई. में भारत सरकार ने नई भाषा नीति की अधिसूचना जारी की। इसके अनुसार शास्त्रीय भाषा के लिए चार लक्षण निश्चित किये गये। शास्त्रीय भाषा के लिए अनुदान, सर्वश्रेष्ठ भाषा शिक्षण, शोध, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शास्त्रीय भाषा का प्रचार-प्रसार, विश्व के विविध स्थानों में अध्ययन केंद्र की स्थापना। मौलिक शोध के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार आदि पर भी बल दिया गया। शास्त्रीय भाषा के विकास के लिए सरकार पहले सौ करोड़ तदनंतर प्रतिवर्ष पाँच करोड़ रुपये देगी। किसी भी भाषा की शास्त्रीय मान्यता के लिए सरकार ने जिन चार लक्षणों को निर्धारित किया है, भाषा विज्ञान की दृष्टि से वे महत्त्वपूर्ण हैं। भाषा की शास्त्रीयता कोई नयी बात नहीं है। भारत वर्ष में वैदिक युग से ही भाषा विज्ञान पर चर्चाएँ होती रही हैं। यास्क, पाणिनि, आपिशिली, कासकृत्स्न, कात्यायन, पतंजलि, भर्तृहरि आदि भाषा वैज्ञानिकों ने भाषाविज्ञान की पृष्ठभूमि को सुदृढ़ बनाया है। संक्षेप में हम यह भी कह सकते हैं कि भारत वर्ष में जितने भाषा वैज्ञानिकों का जन्म हुआ है, विश्वभर में कहीं भी इतने भाषावैज्ञानिक नहीं मिलते । ओड़िआ भाषा की भाषावैज्ञानिक समीक्षा भी पाँचवीं शताब्दी से शुरू हुई है पर ओड़िआ भाषा का आधुनिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन उन्नीसवीं शताब्दी से देखने को मिलता है। ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता को जानकर अब भी कुछ विद्वान आश्चर्यचकित हो जाते हैं। असंख्य पाठकों के समक्ष ओड़िआ भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में परिचित करवाने की अभिलाषा से मैंने दैनिक अखबार 'समाज', 'संबाद' और 'समय' में कुछ लिख लिखे । उन लेखों के प्रति पाठकों की विशेष रुचि भी रही। फिर ओड़िशा साहित्य अकदमी के मुखपत्र 'कोणार्क' के 154 वें अंक में 'ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता' के नाम से एक शोधपरक लेख भी लिखा। इसके उपरांत भुवनेश्वर की 'केदारनाथ गवेषणा परिषद' में 25 फरवरी 2011 को ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता पर एक संगोष्ठी की गयी। उस संगोष्ठी में मेरे द्वारा प्रस्तुत 'लिपि तात्त्विक दृष्टिकोण से ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता' लेख विशेष महत्त्व का था। उसके बाद समय-समय पर 'कोणार्क' 'सप्तर्षि', 'महानदी', 'पंचवटी' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता संबंधी आलेखों ने सबको ओड़िआ भाषा की शास्त्रीयता पर सोचने को बाध्य किया । इससे उत्साहित होकर मैंने 'ओड़िआ एक शास्त्रीय भाषा' पर शोधपरक ग्रंथ लिखा ।
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