प्रस्तुत पुस्तक में महाकवि विद्यापति की काव्य-माधुरी का अध्ययन दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में किया है। विद्यापति साधक थे या श्रृंगारी ?' इस विषय पर अनेक समीक्षकों ने काफी माथा-पच्ची की है। विद्यापति-सम्प्रदाय के अन्तर्गत 'शाक्त', 'शैव', 'वैष्णव', 'रहस्यवादी' एवं 'पंचदेवोपासना' के सम्बन्ध में इस पुस्तक में तथ्यपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया गया है। मिथिला में धार्मिक कट्टरता कभी नहीं रही । दर्शन का दृष्टिकोण समन्वयवादी है। विद्यापति ने भी विभिन्न मतवादों के बीच एक संश्लेषणात्मक दृष्टि-दिशा दी है। सामान्य शोध-ग्रन्थों की लीक से हटकर डॉ० गोपेश ने मिथिला में विद्यापति की काव्य-विषयक अवधारणाओं की मीमांसा तज्जन्य परिवेश में की है। आशा है, प्रस्तुत पुस्तक सामान्य पाठकों एवं सुधी समीक्षकों के लिए पूर्ण उपादेय सिद्ध होगी ।
डा० गोपालजी झा 'गोपेश' जन्म 2 जनवरी 1931 (ग्राम-मॅहथ, मधुबनी); बी० बी० कालेजियट स्कूल, मुजफ्फरपुर से प्रबेशिकोतीर्ण (1948); जी. बी. बी. कॉलेज, मुजफ्फरपुर से आई. ए. (1950); पटना कॉलेज से बी. ए. ऑनर्स (दर्शन); स्वतंत्र रूप से मगध विश्वविद्यालय (बोध गया) से एम. ए. (हिन्दी)। मगध विश्वविद्यालय से ही मानविकी संकाय (हिन्दी) के अन्तर्गत पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त (1948) प्रभाव एवं प्रेरणा : अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान् स्व० डॉ० धीरेन्द्र मोहन दत्त (तत्कालीन विभागाध्यक्ष, दर्शनशास्त्र, पटना कॉलेज); प्रकांड विद्वान एवं शिक्षाविद् स्व० डॉ० अमरनाथ झा (तत्कालीन अध्यक्ष, बिहार लोक सेवा आयोग); हास्य-सम्राट एवं हिन्दी-मैथिली के मूर्धन्य रचनाकार स्व० प्रोफेसर हरिमोहन झा (तत्कालीन दर्शन विभागाध्यक्ष, पटना विश्वविद्यालय); स्व० प्रो० नलिन विलोचन शर्मा; स्व० बाबा नागार्जुन; डॉ० अनिरुद्ध झा (तत्कालीन दर्शन विभागाध्यक्ष, पटना विश्वविद्यालय); मैथिली भाषा के ख्यातिलब्ध कवि आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' तथा मैथिली के स्वनामधन्य शैलीकार एवं समीक्षक स्व० आचार्य रमानाथ झा । मैथिली में दर्जनों मानक प्रकाशन। कई हिन्दी एवं मैथिली पत्र-पत्रिकाओं में विचारोत्तेजक रचनाएँ प्रकाशित । दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1973 तथा विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा 1990 में सम्मानित । विशेष-स्व० प्रो० हरिमोहन झा लिखित प्रसिद्ध उपन्यास 'कन्यादान' पर आधारित प्रथम मैथिली फिल्म (स्व० फणी मजूमदार द्वारा निर्देशित एवं आभा चित्रम्, पटना के सौजन्य से प्रस्तुत) में भाषा-संस्कृति के विशेषज्ञ के रूप में सहयोग (1964)। चेतना समिति, पटना के संस्थापक सदस्य एवं विभिन्न रूप में उक्त संस्था से सम्बद्ध । बिहार सरकार के राजभाषा विभाग में 36 वर्षों की सेवा के पश्चात् प्रमण्डलीय उपनिदेशक, पटना के पद से 1989 में सेवा निवृत्त । सम्प्रति हिन्दी एवं मैथिली में निरन्तर लेखखन । साहित्यिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापों में गहरी दिलचस्पी । सम्पर्क सूत्र 'प्रभाश्री' जानकी नगर (हनुमान नगर) पटना-20
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