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प्राकृत-पालि वाङ्मय एवं भारतीय ज्ञान परम्परा- Prakrit-Pali Literature & Indian Knowledge System

$38
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Bhogilal Leherchand Institute Of Indology, Delhi
Edited By Vijay Kumar Jain
Language: Hindi
Pages: 442
Cover: Paperback
9.50X7.00 Inch
Weight 844 gm
Edition: 2026
ISBN: 9788195708819
BA3551
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Book Description

 

 

सम्पादकीय


प्राकृत/पालि वाङ्गय एवं 'भारतीय ज्ञान सम्पदा' विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 25, 26, 27 अक्टूबर 2024 को किया गया था। संगोष्ठी में प्राकृत एवं पालि के 75 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था। जिसमें से 72 विद्वानों के शोध-सारांश दिए। सारांशिका का प्रकाशन स्वतंत्र रूप से हुआ है। इनमें से संगोष्ठी में 51 विद्वानों के आलेख उपस्थिति पूर्वक पढ़े गये एवं उनकी समीक्षा भी हुई। इस अवसर पर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के यशस्वी कुलपति श्री श्रीनिवास वरखेड़ी जी का रिकार्डिड संदेश भी प्राप्त हुआ, जिससे प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ा। संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों ने भारत सरकार के प्रति प्राकृत, पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान करने के लिए कृतज्ञता ज्ञापित की। जिसके अभाव में विद्वत्जन उपेक्षित अनुभव कर रहे थे। साथ में कर्तव्य/दायित्व बोध का भी स्मरण कराया गया कि प्राकृत, पालि विद्या को समाज तक पहुँचाने के लिए तथा इनका गौरव वापिस लाने के लिए सभी युवा एवं प्रौढ़ विद्वानों को अथक परिश्रम करना होगा।


इस संगोष्ठी में प्राकृत एवं पालि साहित्य का भारतीय ज्ञान परम्परा में योगदान निरूपित हो सके ऐसे विषयों का समावेश किया गया है। तदनुरूप ही विद्वानों को विषय आवंटित किए गए। पालि, प्राकृत वाङ्गय में ज्ञान एवं विज्ञान भरा पड़ा है। डॉ. आचार्यश्री विजयनन्दीघोषसूरि म. सा. का लेख संदेश शोधपत्र महत्त्वपूर्ण है। प्रो. जे. बी. शाह जी का लेख ठक्कर फेरू रचित वास्तुकार गृह, मूर्ति, प्रासाद एवं निर्माण कला, डॉ. अनिल कुमार जैन ने प्राकृत साहित्य में कोशिकाओं और वायरस की स्थिति आज के ज्वलंत विषय पर पर प्रकाश डाला। जैन भूगोल के सम्बन्ध में डॉ. किरण प्रकाश जैन का लेख प्राकृत साहित्य में लोक की परिधि, फल एवं क्षेत्रफल, डॉ. योगेश कुमार जैन का प्राकृत साहित्य में विदेह, सोनल अग्रवाल का प्राकृत साहित्य में सुमेरू पर्वत दिया जा रहा है। डॉ. दर्शना जैन का नन्दीश्वरद्वीप श्री धणेन्द्र जैन का प्राकृत साहित्य में वातवलय, रेखा चडाला का प्राकृत साहित्य में सूर्य और चन्द्र महत्त्वपूर्ण हैं। वही अंग्रेजी भाषा में इसरों के पूर्व वैज्ञानिक श्री राजमल कोठारी जी का आगम और विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में चन्द्रमा की गति पर विस्तार से प्रकाश डाला। श्री आकाश जैन का प्राकृत साहित्य में पंचागीय काल विवेचन, ज्योतिष से सम्बन्धित हैं। प्रो. कुसुम पटोरिया का शब्द की पौदगलिकता और भौतिकी, डॉ. अनीता यादव का स्थावर जीवों का वैज्ञानिक अनुशीलन, नीलम जैन का प्राकृत साहित्य में वायुकायिक जीव, प्रो. धर्मचन्द्र जैन जी का आहार विज्ञान है।


भाषा की दृष्टि से प्रो. धर्म चन्द जैन, जयपुर का 'पण्णावणा सुत्त' में भाषा विषयक विचार, डॉ. राका जैन, प्रो. रामनाथ पाण्डेय का प्राचीन भाषा का विकास क्रम और अपभ्रंश, श्री मोहित जैन का पांच प्राकृतों में एकीकृत जिनस्तवन विविध प्राकृतों के एक जगह प्रयोग देखने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
धर्म-दर्शन की दृष्टि से डॉ. रीना जैन का कसायपाहुड में समुद्धात, प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई का समणसुत्तं ज्ञान साधना का अनुपम उपहार, डॉ. पूजा व्यास का प्राकृत ग्रन्थों में बौद्धमत समीक्षा, डॉ. किरणकला जैन का अनेकान्त एक वैज्ञानिक दृष्टि, प्रो. एम. चन्द्रशेखर का जैन परम्परा में ध्यान योग का वैशिष्टय, प्रो. लोकमान्य मिश्र का प्राकृत साहित्य में शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी महत्त्वपूर्ण हैं।


साहित्य की दृष्टि से प्रो. विजय कुमार जैन का प्राकृत काव्य साहित्य समीक्षा, डॉ. संगीता मेहता का आधुनिक प्राकृत रचना, आ. सुनील सागर जी के साहित्य में स्वस्थ जीवन शैली, डॉ. पत्रिका जैन का गउडवहो में भारतीय ज्ञान परम्परा है।


पालि साहित्य के आलोक में श्री अजय कुमार मौर्य जी का मिलिन्द प्रश्न में पर्यावरणीय संवाद, डॉ. वेदव्यास का धम्मसंगणि में प्रतिपादित धमों की विशलेषणात्मक पद्धति हरप्रसाद जी दीक्षित का पालि साहित्य में प्रज्ञा विशिष्ट ज्ञान सम्पदा लेख पढ़े गए। प्रो. विमलेन्द्र कुमार का भेषज्य मंजूषा पालि चिकित्सीय शास्त्र परम्परा में एक महत्त्वपूर्ण आलेख है।


इस प्रकार पालि एवं प्राकृत साहित्य में भारतीय ज्ञान परम्परा में योगदान में निरूपित करने वाले संदर्भ भरे पड़े हैं।


संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रो. देवकर जी ने अपने विशिष्ट उद्बोधन से उपकृत किया तथा समापन सत्र में ऑनलाइन से प्रो. जी. घण्टामूर्ति, संयोजक आई० के० एस० ने मार्गदर्शन किया।


हम भारत सरकार एवं शिक्षा मंत्रालय उसके अन्तर्गत भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो० चमुकृष्ण शास्त्री जी के प्रति कृतज्ञ हैं कि प्रथमवार उन्होंने गैर शासकीय शिक्षण संस्थाओं को अच्छी मात्रा में अनुदान स्वीकृत कराकर भारतीय ज्ञान परम्परा, प्राचीन ज्ञान को डिजिटाइजेशन तथा पाण्डुलिपियों के लिप्यंतरण एवं सम्पादन का अवसर प्रदान किया। भारत सरकार की संस्कृत, प्राकृत, पालि योजनाओं को नोडल एजेंसी के रूप में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का योगदान स्मरणीय रहेगा इसके लिए यशस्वी माननीय कुलपति प्रो० श्रीनिवास वरखेड़ी जी, कुलसचिव प्रो० जी० मुरली, कृष्ण निदेशक योजना डॉ० मधुकेश्वर भट्ट तथा इंचार्ज प्राकृत, पालि डॉ० चक्रधर मेहर जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। संस्थान के ट्रस्टियों का प्रोत्साहन बहुत बड़ा सबल रहा है।


भोगीलाल लहेरचन्द इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डोलॉजी के चेयरमेन श्री निर्मल भोगीलाल जी, प्रेसीडेन्ट श्री राजकुमार जी ओसवाल, वाइस चेयरमेन श्री जे० पी० जैन, प्रो० जितेन्द्र बाबू लाल शाह, सम्माननीय ट्रस्टी श्री शुभ कान्त जैन, श्री दर्शन कुमार जैन, श्री अशोक जैन, श्री विपिन जैन, श्री पुष्कर राज सोलंकी, श्री सुगत जैन तथा संस्थान के सभी सहयोगियों प्रो० एम्० चन्द्रशेखर, श्री मोहित जैन, श्री लक्ष्मी कान्त, श्री सहदेव जैन, डॉ० मुकुल बडोला, डॉ० मोहन पाण्डेय, श्री अभयानन्द पाठक, तथा श्री गौरव मान का सहयोग रहा है। डॉ० राका जैन ने प्रूफ संशोधन एवं सम्पादन में सहयोग दिया है।


संगोष्ठी में विद्वज्जनों ने पधारकर तथा अपने लेख देकर उपकृत किया है। निश्चय ही यह ज्ञानराशि भारतीय ज्ञान परंपरा में पालि/ प्राकृत के योगदान के जिज्ञासुओं के लिए मार्गदर्शक होगी।

 


 

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