विचारों की भूमि पर प्राचीनता और नवीनता का संघर्ष जारी हैं। परिस्थितियाँ बदली हैं, जीवन बदला है, सोच के तौर-तरीके, अभिव्यक्ति भंगिमाएँ बदली हैं, साहित्य के आयाम बदले हैं। उसी अर्थ में साहित्य, समीक्षा और मूल्यांकन भी बदले हैं। डॉ० कृष्ण कुमार सिंह की आलोचनात्मक पुस्तक 'प्रेमचंद की कहानियाँ और सामाजिक चेतना' उसी बदलती हुई भंगिमाओं और समीक्षा की देन है।
छात्रावस्था से ही आप साहित्य लेखन के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। एक विद्यार्थी का जो पाठ्य-पुस्तकों में व्यस्तता का जीवन होता है, बावजूद भी आपका साहित्यकार कभी मुमूर्षा में नहीं जिया, बल्कि जिजीविषा-प्रवाह में सतत् तैरता रहा और अतल तल से भाव-विचारों का सुन्दर मरकतमोती चुनता रहा। प्रमाण स्वरूप है आपकी मननशीलता और विचारशीलता का प्रशंसनीय परिणाम प्रस्तुत आलोचनात्मक पुस्तक जिसमें आपके विचार तन्तुओं का एक बड़ा 'कैनवास' है जिसका आपने सही और सभी कोणों से मूल्यांकन किया है।
आज भी साम्राज्यवाद और सामन्तवाद की आड़ में पूँजीवाद फल-फूल रहा है। समाज का निचला तबका अब भी मध्ययुग में जीने को मजबूर है और वहीं पूँजीपति वर्ग अत्याधुनिक पाश्चात्य में । ऐसे में और ऐसे समय में प्रेमचंद और उनका साहित्य और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि इस समय का समाज और परिस्थितियाँ विज्ञापित बदलाव के वनिस्वत भी प्रेमचंद, उनके साहित्य, समय और समाज से बहुत आगे बढ़ा हुआ प्रतीत नहीं होता। डॉ० सिंह ने प्रेमचंद के कथा-साहित्य का विशेष मनन-चिन्तन कर नये तथ्यों का उद्घाटन किया है जो. प्रेमचंद के साहित्य को समझने में सुधी पाठकों व शोधार्थियों के लिए उपयोगी और मददगार साबित होगा।
युवा साहित्यकार और आलोचक डॉ० सिंह की इस आलोचनात्मक पुस्तक का प्रकाशन करते हुए परिषद् विशेष हर्ष का अनुभव कर रही है। आलोचना साहित्य को समृद्ध बनाने में ऐसी ही कृत्तियों का उल्लेखनीय स्थान व योगदान रहा है। राष्ट्रभाषा रूपी बगिया के बहुरंगे पुष्प-पौध के पुष्पों में एक पुष्प डॉ० सिंह भी हैं। परिषद्-परम्परा के अनुसार नीर-क्षीरग्राही विद्वानों, विचारकों, चिन्तकों, साहित्यकारों और समीक्षकों की पाण्डुलिपियों का पुस्तकाकार मुद्रण प्रकाशन कर राष्ट्रभाषा परिषद् हिन्दी के वर्द्धन सम्वर्द्धन में अहम भूमि का निभाती रही है। हम विश्वास के साथ आशान्वित हैं कि सद्विवेकी पाठक और सुधीजन परिषद् के इस सारस्वत अध्यवसाय अवदान को अपना कर प्रसन्न होंगे।
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