भूमिका
चार दशक से भी अधिक समय तक अध्यापन करने के साथ ही, निरंतर अध्ययन एवं शोध करते हुए हमें एक बात यह भी समझ में आई कि हम अध्यापकगण प्रायः संप्रेषण और अपरिपक्व विद्यार्थियों को समझाने की नियत से कुछ चीजों, विषयों, प्रकरणों एवं अवधारणाओं का सरलीकरण कर देते हैं किंतु शनैः शनैः उसी का सामान्यीकरण हो जाता है और वही सरल शब्दावली प्रचलन में आ जाती है। उदाहरण के लिए छात्र-छात्राओं को सहज ढंग से भक्ति आंदोलन समझाने के लिए 'भक्ति द्राविड़ी ऊपजी लाए रामानंद/प्रकट किया कबीर ने सप्तद्वीप नव खंड।' बस बाकी लोग उसी की टेर' लगाने लगे। अरे भाई, उस पूरे परिवेश को पढ़िए, कैसे वैदिक वाङ्मय में भी उसके स्वर सुनाई देते हैं। वस्तुतः यह समझना ही एक जटिल प्रक्रिया है अतः सरलीकरण ही स्वीकार्य हो गया है। किसी भी अवधारणा को पूरी तरह से समझने के लिए हमें देखना होगा कि वैदिक वाङ्मय में गाथा, नरासंसी से इतिवृत्त, उपनिषद् तथा पुराण तक आपको भक्ति के संकेत ही नहीं उसके विकसित विचार यत्र-तत्र-सर्वत्र मिलेंगे। डॉ. ताराचंद जैसे विद्वान इतिहासकार की पुस्तक बिना ढंग से पढ़े ही बस शीर्षक 'इम्पैक्ट ऑफ़ इस्लाम ऑन इंडियन कल्चर' के आधार पर लोग उसे एकतरफा भारतीय संस्कृति पर इस्लाम के प्रभाव के रूप में ही समझने लगे और लिखने भी लगे। उसमें प्रारंभिक अध्यायों में स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति के विकासक्रम और फिर दक्षिण में उस विकसित विचार तथा विचारधारा की कैसे ईसाई धर्म तथा बाद में इस्लाम से अंतर्क्रिया हुई तथा यह नवीन मध्ययुगीन भक्ति पुनः रामानंद के साथ उत्तर भारत में मथुरा में दृष्टिगोचर हुई। उपरोक्त कारणों के चलते विशेष अध्ययन एवं शोध की दिशा ही सीमित दायरे में संभव हो पाई है ताकि यह उस विशेष समय और क्षेत्र की वास्तविकता यानी हमारी विरासत या इतिहास के सही ज्ञान से हमको अभिज्ञ करा सकने में कामयाब हो। किंतु इसका एक दुष्परिणाम यह भी हुआ कि शोध-ग्रंथों के लेखकों और अध्ययन-कर्ताओं ने मान लिया कि शेष लोग भी व्यापकता में बातों को समझते होंगे अतः वे कई बातों अथवा तथ्यों को पिष्टपेषण मानकर उल्लेख करने से रह जाते हैं और धीरे-धीरे इस छोड़े हुए भाग या अंश को हमलोग भी भूलने लगते हैं। 'लोक स्मृति' तो सशक्त होती है किंतु व्यक्तिगत स्मृति लोप होती चलती है-आखिर में यह स्मृति चेतन मन के किसी अवचेतन स्तर में समा जाती है, स्मरण कराने पर पुनः नवीनीकृत हो जाती है। इस प्रकार की 'व्यक्तिगत स्मृति लोप' का उदाहरण हमें प्रायः दृष्टिगोचर होता है जब हम भारतीय इतिहास की बात करते हैं तो प्रायः प्राचीन इतिहास वाले भी इस तथ्य की जानकारी से सभी को अवगत मानकर उत्तरापथ और दक्षिणापथ के साथ ही विचारों तथा व्यापारिक विनिमय के मार्गों के विकास की चर्चा प्रायः नहीं करते कि कैसे मौर्य काल में यूरेशिया के बड़े भाग में पूरब पश्चिम का संपर्क मार्ग के विकास के साथ उससे पूर्व बौद्धों के आवागमन की चर्चा या उससे भी पूर्व के काल में पशुचारिता के मार्गों की व्याख्या नहीं किंतु उल्लेख तो ज़रूरी है वर्ना ये बातें, तथ्य और पृष्ठभूमि लोग भूलने के लिए अभिशप्त ही होंगे और ज्ञान के लोप का भय बना रहेगा। बार-बार पूरी धरती के एक बड़े भू-क्षेत्र की तरह होने और शनैः-शनैः फैलने का उल्लेख इसलिए अपरिहार्य है जैसा भूगोल या भू-गर्भ के विद्यार्थियों के लिए होता है
लेखक परिचय
डॉ. हेरंब चतुर्वेदी जन्म: 31 दिसंबर, 1955, इंदौर। शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक एवं इतिहास में परास्नातक (1978)। जनवरी 1980 से इतिहास विभाग, इलाहाचाद विश्वविद्यालय में अध्यापन, पूर्व विभागाध्यक्ष, संप्रति वहीं से सेवानिवृत्त। प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें 'सल्तनतकालीन प्रमुख इतिहासकार' (1987); 'प्रथम अभिव्यक्ति' (1989): 'फ्रांस का इतिहास' (1999); 'मध्यकालीन इतिहास के स्रोत' (2003); 'मध्यकालीन भारत में राज्य और राजनीति' (2005); 'मध्यकालीन भारत के विदेशी यात्री' (2007); 'दास्तान मुगल महिलाओं की' (2013); 'हिंदी के बहाने' (2014); 'एक दौर यह भी' (2015); 'मुगल शहजादा खुसरो' (2016); 'दो सुल्तान दो बादशाह, उनका प्रणय परिणय परिवेश' (2016); 'द इलाहाबाद स्कूल ऑफ हिस्ट्री' (2016); 'चतुर्वेदीज ऑफ इंडिया, द मथुरा क्लैन' (2017); 'लाला सीताराम भूप' (2017); 'कुंभ : ऐतिहासिक वाङ्मय' (2019); 'चतुर्वेदियों का इतिहास' (2019); 'दास्तान मुगल बादशाहों की' (2019; 'गांधी और उनके सत्याग्रह की यात्रा' (2019); 'पं' जवाहरलाल नेहरू' (2019); 'जहाँआरा' (2022); 'पाश्चात्य इतिहास दर्शन एवं इतिहास लेखन' (2023); 'मध्यकालीन भारत में राजनीति' (2023); 'प्रॉविंग्स इन टू इंडियाज डिस्टेंट पास्ट (2024)। पुरस्कार एवं सम्मान : दो पुस्तकों, 'मध्यकालीन इतिहास के स्रोत' एवं 'मध्यकालीन भारत में राज्य और राजनीति' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का क्रमशः 2003 एवं 2005 का आचार्य नरेंद्र देव पुरस्कार। 'दास्तान मुगल महिलाओं की' (लोकभारती, 2013) को बी.बी.सी., लंदन ने सर्वश्रेष्ठ हिंदी की पुस्तकों में सम्मिलित किया था। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेख एवं शोध-पत्र प्रकाशित। रेडियो, ज्ञानभारती एवं दूरदर्शन से नियमित वार्ताओं का प्रसारण। उत्तर प्रदेश सरकार की कक्षाओं की कक्षा 1 से 8 तक के पाठ्यक्रम निर्धारण एवं पुस्तकों के प्रकाशन में परामर्शदाता। अनेक विश्वविद्यालयों की समितियों में सदस्यता
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