प्राक्कथन
कुछ वर्ष पूर्व मुझे वसन्त ऋऋतु की नवरात्रि में आर्य रविदेवजी की चार दिवसीय रामकथा सुनने का अवसर मिला। इससे मुझे जन-जन के आदर्श श्रीराम के चरित को एक व्यापक दृष्टिकोण से समझने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। विशेष रूप से रामायण के लगभग सभी पात्रों के विलक्षण व अनन्य गुणों को जानने का सुअवसर भी मिला जो अन्यथा सुनने में नहीं आते। जब आर्य रविदेवजी ने अपने श्रोताओं, जिसमें मैं भी सम्मिलित थी, के अनुरोध पर इस व्याख्यान शृङ्खला को पुस्तक का रूप देने का निर्णय लिया, तो मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई। पर मुझे यह तनिक भी आभास नहीं था कि इस पुस्तक "रामकथा: यथारूप" को सम्पादित करने का दायित्व मेरे ऊपर ही आने वाला है। जब यह प्रस्ताव उनके द्वारा मेरे समक्ष आया, तो मुझे प्रसन्नता के साथ-साथ मन में यह भी विचार आया कि क्या मैं इसके साथ न्याय कर पाऊँगी ? आर्य रविदेवजी बहुत ही विद्वान्, अनुभवी व अध्ययनशील व्यक्ति हैं। विभिन्न संस्थाओं में कार्य करते हुए मुझे उनका सान्निध्य कई दशकों तक प्राप्त हुआ है। उन्होंने मेरी क्षमताओं की सराहना करते हुए मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जाम्बवान की भाँति मेरी योग्यता पर अपना विश्वास व्यक्त करते हुए उन्होंने इस पुस्तक को सम्पादित करने का मुझसे आग्रह किया। उनका यह आग्रह मेरे लिए एक प्रकार से आदेश ही था अतः इस दायित्व का निर्वाह करते हुए मुझे अपार सन्तोष व हर्ष की अनुभूति हुई। आर्य रविदेवजी का रामायण तथा रामचरितमानस पर गहन अध्ययन है, इसलिए उन्होंने क्रमवार सभी काण्डों, अध्यायों व प्रसङ्गों की व्याख्या बहुत ही व्यवस्थित ढङ्ग से की है। उन्होंने स्थान-स्थान पर दोनों मुख्य ग्रन्थों एवं अन्य संबंधित ग्रन्थों से उद्धरण देते हुए सन्दर्भसहित अपने विचारों को स्पष्ट करने का श्लाघनीय प्रयास किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ की प्रस्तावना में नवरात्रि उत्सव के सन्देश के साथ प्रारम् करते हुए इसकी रचना के पीछे अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। तत्पश्चात् श्रीराम को हिन्दू समाज के लिए प्रेरणा स्रोत मानते हुए सभी को वाल्मीकि कृत रामायण तथा गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस का समन्वित रूप से अध्ययन करने का परामर्श देते हैं। बालकाण्ड में पुत्रेष्टि यज्ञ के फलस्वरूप राम व अन्य सभी भाइयों के जन्म का वृत्तान्त, राजसत्ता की तात्कालिक वस्तुस्थिति, महर्षि विश्वामित्र द्वारा राम व लक्ष्मण लक्ष्मण के माध्यम से राक्षसों का संहार, अहल्या उद्धार तथा मिथिला में सभी भाइयों का विवाह सम्पन्न होने का अत्यन्त रोचक विवरण है। परशुराम संवाद के माध्यम से राष्ट्रवाद का सन्देश "वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहितः विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अयोध्याकाण्ड में श्रीराम के राज्याभिषेक के स्थान पर अप्रत्याशित रूप से वनगमन, धर्मनिष्ठा व गृहयुद्ध की परिस्थिति को टाल पाने की क्षमता उनके चरित्र को अनुकरणीय बना देती है। सभी भाइयों का परस्पर अलौकिक स्नेह और महारानी कैकेयी का पश्चात्ताप हमें चित्रकूट प्रसङ्ग में देखने को मिलता है। वनवास की अवधि में भी प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित करना ही क्षत्रिय का धर्म है, यह सङ्कल्प उनकी महानता को उजागर करता है। अरण्यकाण्ड में वनवास की विविध घटनाएँ यथा- शूर्पणखा प्रसङ्ग व सीताहरण प्रसङ्ग के साथ शबरी के माध्यम से राजसत्ता अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचे, इस पर ध्यान दिलाया है। जटायु-वध का मार्मिक प्रसङ्ग इत्यादि प्रजाधर्म, सेवा और न्याय के गहरे सन्देश लेकर आती हैं। ग्रन्थकार ने वाल्मीकि कृत रामायण तथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के काल भेद को स्पष्ट करते हुए पाठकों को अनिवार्यतः मूल ग्रन्थों का भी अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया है। किष्किन्धाकाण्ड में श्रीहनुमान से प्रथम बार भेंट, सुग्रीव से मैत्री, वाली वध तथा सुग्रीव के राज्याभिषेक जैसे प्रसङ्गों के माध्यम से हमें श्रीराम के अप्रतिम योद्धा एवं कुशल राजनीतिज्ञ होने के प्रमाण मिलते हैं। यहाँ श्रीहनुमान का बल व बुद्धि के एक मूर्तिमान स्वरूप में रामायण के सहनायक के रूप में उभरना दृष्टव्य है। गुणों व चरित्र में उनकी साम्यता लक्ष्मण से किस प्रकार है, वह भी समझने योग्य है। सुन्दरकाण्ड में माता सीता की खोज हेतु श्रीहनुमान का लङ्का- गमन, भीषण परिस्थितियों में सीता की खोज व भेंट तथा लड़ा-दहन पश्चात् श्रीराम को समस्त वृत्तान्त देने के विभिन्न प्रसङ्गों में हनुमान के कर्मों का सौन्दर्य जिसके कारण इस काण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड रखा गया होगा, का अत्यन्त मनोहारी चित्रण हुआ है। आर्य रविदेवजी यहाँ उनकी पूँछ से सम्बन्धित भ्रान्तियों का भी निवारण करते हैं, जो अत्यन्त रोचक होने के साथ ज्ञानवर्धक भी है। जिन पाठकों ने आर्य रविदेवजी द्वारा रचित " श्री हनुमत् चरितम्" पढ़ी होगी, वे भली भाँति जानते हैं कि श्रीहनुमान का वास्तविक स्वरूप क्या है, हमने उनके स्वरूप को किस प्रकार विकृत कर दिया है। उन्हें लेकर कैसी-कैसी भ्रान्तियाँ हमने अपने मन-मस्तिष्क में पाल रखी हैं, वे टूट कर बिखर जाएँगी। इस ग्रन्थ में भी उनके यथार्थ स्वरूप का दर्शन पाठकों को प्राप्त होगा। युद्धकाण्ड में हम जानेंगे कि "क्या रावण के वास्तव में दश शिर थे?" साथ ही साथ अवतारवाद पर सुन्दर विवेचना पढ़ने को मिलेगी। माता सीता की अग्नि परीक्षा से जुड़ा मिथक भी टूटेगा तथा वास्तविकता का दर्शन होगा। 'रामराज्य' एक शब्द के रूप में कई बार पढ़ा व सुना होगा, परन्तु रामराज्य की अवधारणा का साक्षात्कार 'रामराज्य' शीर्षक के अन्तर्गत देखने को मिलेगा। त्रेतायुगीन श्रीराम के कालखण्ड में वैसे तो जनसामान्य भी अपनी मर्यादाओं का पालन व धार्मिक मूल्यों को निभाते हुए जीवन जीते थे, परन्तु जिस प्रकार श्रीराम ने इन मूल्यों की पराकाष्ठा को छुआ, वह अतुलनीय है।
लेखक परिचय
आर्य रविदेव गुप्त जन्म व स्थान 9 सितम्बर 1943, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश गिला एम.काम., एल.एल.बी. एफ.सी.एम.ए. जीवन परिचय आर्य समाजी परिवार में जन्म वैदिक विचारधारा में ओतप्रोत । बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता । गृहस्थ जीवन के निर्वहन एवं व्यवसायी होने के साथ ही माता-पिता से प्राप्त संस्कारों के फलस्वरूप वैदिक साहित्य के स्वाध्याय एवं चिंतन में गहन रुचि। मानव जीवन से जुड़े विभिन्न आयामों पर वैदिक विचारों से अनुप्राणित सहत्वाधिक प्रवचन तथा अनेकानेक लेखों की प्रस्तुति एवं विभिन्न पत्रिकाओं में उनके प्रकाशन द्वारा समाज जागरण के प्रति समर्पित । मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, बहुआयामी व्यक्तित्व के अनुपूरित वीर हनुमान एवं योगेश्वर श्रीकृष्ण के जीवन से प्रभावित होकर बाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस तथा भगवङ्गीता के गहन अध्ययन के परिणामस्वरूप हिन्दू समाज के कल्याण एवं जागरण हेतु अनेक व्याख्यान, सम्पूर्ण रामकथा के वाचन तथा लेखन द्वारा समय-समय पर इन महापुरुयों के वास्तविक स्वरूप की प्रस्तुति में संलग्न । इसी कड़ी में यह 'रामकथा-यथारूप' ग्रंथ प्रस्तुत है। अपनी सरल, सहज, आकर्षक सम्भाषण एवं भाषा-शैली द्वारा समाज जागरण के इस कार्य में निःस्वार्थ भाव में अनवरत रूप से संलग्न । आर्य रबिदेव इस विशिष्ट ज्ञान एवं भाव सम्प्रेषण शैली के द्वारा देश-विदेश के अनेक मंचों पर ऑनलाइन एवं प्रत्यक्ष रूप से व्याख्यानों द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। अपनी इस भावगम्य आदर्श जीवन पद्धति एवं लक्ष्य के कारण अनेकों सामाजिक संगठनों का नेतृत्व कर रहे हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (13591)
Tantra (तन्त्र) (1008)
Vedas (वेद) (732)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2086)
Chaukhamba | चौखंबा (3185)
Jyotish (ज्योतिष) (1562)
Yoga (योग) (1163)
Ramayana (रामायण) (1337)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24705)
History (इतिहास) (9014)
Philosophy (दर्शन) (3627)
Santvani (सन्त वाणी) (2622)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist