सुप्रसिद्ध कथाकार हिमांशु जोशीजी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संग्रह अपनी एक अलग विशिष्ट विविधता लिए हुए है। अनेक धरातलों पर लिखी गयीं इन बहुरंगी, बहु-आयामी कहानियों में गहन मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ एक दृष्टि भी है, अपना एक अलग दृष्टिकोण भी।
हिमांशु जोशीजी की इन कहानियों में आम आदमी का सतत् संघर्ष ही नहीं, आज के समय का प्रतिबिम्बन भी है। इसलिए कहानियां मात्र कहानियां ही नहीं, अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी बन गयी हैं।
उन्होंने अपने किन्हीं संस्मरणों में भी लिखा है, "पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है एक बहुत बड़ा कालखण्ड पीछे छूट गया है। इन वर्षों में कितना कुछ घटित नहीं हुआ। जो लिखा वह कितना सही है, जो लिखने में रह गया उसका आकलन कैसे होगा? यह सब सोचने का यानी किसी सीमा तक समझने का अवसर ही नहीं मिल पाया।
हिमांशु जोशीजी की कथा-यात्रा जिस मुकाम पर पहुंची वहां उसकी कुछ विशेषताएं साफ दिखाई देती हैं-इन कहानियों में उत्कट संवेदनशीलता, साफगोई, निराडंबरता और आलोचनात्मक यथार्थ की खोज। उनके चिंतन संसार को दो विरोधी से लगने वाले पक्षों की सापेक्षता में रखने पर कोई विसंगति नहीं लगती। मतलब सहजता और कलात्मकता या आदर्श और यथार्थ को एक साथ रखने पर। प्रेमचंद पर बात करते समय लगभग ऐसा ही लगता है। यह तब होता है जब रचना-मानस इतना पक गया है कि सहजता के भीतर ही कला की गहराइयां इस तरह जज्ब हो जाएं कि वे अलग से रेखांकित न की जा सकें। यानी सहज होने पर भी रचना में गहराई और कलात्मकता अंतर्हित हो।
कहीं उनका कथन था कि "कस्बे में पला-बढ़ा। अतः कस्बे के संस्कार, वहां का वातावरण, वहां की समस्याओं की झलक भी उभरे बिना नहीं रही। शेष आधी शताब्दी के महानगरी जीवन ने और भी अधिक गहन अनुभूतियां दीं। अनेक चलते-फिरते, हंसते-रोते प्रतिबिम्ब।..." इस हंसते-रोते जीवन यथार्थ ने ही उनकी सृजन मानसिकता में गहराई और व्यापकता से जड़ें जमाई हुई हैं। इस सृजन मानसिकता में विस्फोट 'सजा', 'इति', 'तपस्या', 'हत्यारे', 'विडम्बना', 'बूंद पानी', 'यामिनी', 'भगवान नहीं है', 'फासला' आदि कहानियों में पूरी तरह दिखाई देता है।
प्रस्तुत संग्रह की एक अन्य महत्वपूर्ण कहानी है 'तपस्या'। नारी और उसकी तपस्या का रूप। कहानी का नारीवादी विमर्श की दृष्टि से भी अध्ययन किया जा सकता है। यशवन्ती पुरुषवादी समाज के सामने एक प्रश्न रखती है-"आखिर दिया क्या आपने हमें? वह रथीन बाबू से कहती है-'जिंदगी भर मेरे बच्चे एक-एक टुकड़ा रोटी के लिए तरसते रहे। मैं मांग-मांग कर गुजारा करती रही..." उसके बच्चे फीस न दे पाने के कारण पढ़ न सके। तीज-त्योहार नहीं मना सके, तन को ठीक से ढक नहीं सके। यशवन्ती ही खेतों में काम करती रही और पति दीन-दुनिया से बेखबर गांधीजी की जै-जैकार करता हुआ घूमता रहा। आजादी के आंदोलन में नारी की तपस्या को देखा नहीं गया यह कहानी इसी की ओर संकेत करती है।
इन प्रतिनिधि कहानियों में 'कोई एक मसीहा', 'अंतिम सत्य' और 'जलते हुए डैने' जैसी सुप्रसिद्ध राजनीतिक कहानियां भी हैं, जो अपने दौर में बहुत लोकप्रिय रहीं और चर्चा का विषय भी। बहुत कम पाठकों को ज्ञात होगा कि उन्होंने आपातकाल के दौरान ही आठ-दस कहानियां और तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर एक उपन्यास 'समय साक्षी है' लिखा था। उसी दौर की कहानी है 'जलते हुए डैने' जो 'सारिका' साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इसी कहानी के संदर्भ में हिमांशुजी ने लिखा है, "ऐसे ही दहशत के माहौल में, उन दिनों कहीं एक कहानी का कथानक छटपटाने लगता था। वातावरण ही इस तरह का था। अंदर एक प्रकार की घुटन। बेचैनी! जब लिखने लगा तो अनेक ताने-बाने अनायास आ-आकर जुड़ते चले गए।
"कुमाऊं के हमारे पर्वतीय अंचल में, स्वाधीनता संग्राम में अनेक पुरोधाओं के साथ, जिस व्यक्ति की उल्लेखनीय भूमिका रही वह थे-विक्टर मोहन जोशी। आज शायद ही कोई जानता हो इस नाम को, पर तब यह विदेशी शासन के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया था।
देवीधूरे के मेले में अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने भीड़ भरे बाजार में डण्डे से मार-मारकर उनका सिर लहूलुहान कर दिया था। कीचड़ में सने वे छटपटाते चीखते रहे, पर वंदेमातरम का उच्चारण अंतिम क्षण तक करते रहे। देश के लिए शहीद हो गए, पर पराजय स्वीकार नहीं की।
इस कहानी को लिखते समय अतीत और आज की कितनी ही घटनाएं परस्पर घुल-मिल गई। और अंत में जिस कहानी का जन्म हुआ. वह थी-'जलते हुए डैने'। फिनिक्स । भारुण्य या अग्निसम्भव। दूसरों के लिए आहुति का प्रतीक।
आश्चर्य की बात तो तब रही, जब आपातकाल के उसी दौर में कमलेशवरजी ने इसे ज्यों-का-त्यों 'सारिका' में छाप दिया।
सभी कहानियां, हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं 'दैनिक हिन्दुस्तान', 'नवभारत टाइम्स', 'सारिका', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'धर्मयुग' आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं।
'सजा', 'इति', 'गंधर्व-गाथा' आदि प्रेम कहानियों को भी इन प्रतिनिधि कहानियों में सम्मिलित किया गया है। हिमांशु जोशीजी का सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास 'तुम्हारे लिए' भी एक प्रेम-कथा पर ही आधारित है, जो वर्षों बाद भी अपनी असाधारण लोकप्रियता बनाए हुए है, पाठकों के बीच। इन कहानियों को पढ़ते समय लगता है कि यह कहानियां भी अपने वृहद स्वरूप में उपन्यास का रूप हो सकती थी।
हिमांशु जोशीजी की इन कहानियों में काव्यात्मकता उनके अंतरंग में निवास करती है-उनकी बनावट के एक जरूरी अंग के रूप में। ये कहानियां केवल देह में नहीं जीतीं आत्मा के बृहत्तर जीवन संदर्भों में फैलाव लेती हैं फूलों में सुगंध की तरह।
इन कहानियों में सुख-दुःख के बीच प्रकृति हमारा ध्यान खींचती है। 'प्रकृति' की भारतीय अवधारणा से हिमांशु जोशीजी ऐसे लिपटे हैं जैसे मां से शिशु। सुशांत सरिता के शीतल जल प्रवाह की तरह, मौन मंथर गति से सबको आप्लावित करती हुई चली जाती है। सब पर अमिट प्रभाव छोड़ती हुई या कहें, कम शब्दों में बहुत ज्यादा अर्थ 'घाव करे गंभीर' की ओर झुकी हुई।
वहीं दूसरी ओर अपनी संघर्ष साधना के बारे में उन्होंने कहीं लिखा है. "जिंदगी तब शुरू कर ही रहा था। अंधे तूफानी सागरों को अपनी हथेलियों की पतवार से पार करने का साहस-दुस्साहस। अजीब संघर्षों के दिन थे वे। पत्थर की कठोर चट्टानों को अपने नाखूनों से खुरच-खुरच कर पांव टिकाने भर की ठौर तलाश रहा था। हरे-भरे, शीतल, शांत हिमाच्छादित पर्वतों की सुनहरी क्षितिज रेखाओं को पार कर धधकती आग के जंगल में भटकता हुआ-भीड़ में अपने को खोज रहा था-अनजान, अपरिचित बीहड़ों में। दिन-भर भटकने के पश्चात् जब शाम को सराय पर लौटता तो, सारे दिन की थकान घनीभूत होकर सारी देह को संज्ञाशून्य कर देती...।
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