लेखक परिचय
रतनसिंह बडोडागाँव जन्म : 02 जुलाई, 1972 शिक्षा : एम.ए. (इतिहास, अंग्रेजी), बी.एड. आत्मज : स्व. श्री खीमसिंह भाटी प्रकाशन : 1. बिहारीदासोत भाटी (इतिहास व वंशावली) 2015, 2. भाटी वंश की गौरव गाथाएँ-भाटी इतिहास 2017, 3. गौरव गुमान 2023, 4. सरहद के शहीद 2023 सम्मान: 1. महारावल हरिराज साहित्य पुरस्कार-2015, 2. राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान-2018, 3. जिला स्तरीय शिक्षक सम्मान-2017 पद : व्याख्याता (इतिहास), शहीद उम्मेद सिंह राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, बडोड़ागाँव, जैसलमेर (राजस्थान) जिलाध्यक्ष : पुरस्कृत शिक्षक फोरम राजस्थान, जिला-जैसलमेर.
महेन्द्रसिंह छायण जन्म: 10 जून, 1994 शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी, राजस्थानी), बी.एड. आत्मज : श्री उगमसिंह सिसोदिया प्रकाशन : 1. रूड़ौ राजस्थान (काव्य) 2014, 2. कलम अर कटार (सम्पादन) 2017, 3. राजेन्द्र रूपक (सम्पादन) 2019, 4. इण धरती है ऊजळ आंगण (काव्य) 2019, 5. मेहा मांगळिया (राजस्थानी महाकाव्य) 2021, 6. मैं थार हूँ (काव्य) 2022, 7. गौरव गुमान 2023, 8. सरहद के शहीद 2023 सम्मान : 1. साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राजस्थानी युवा पुरस्कार-2020, 2. महारावल हरिराज साहित्य पुरस्कार-2022, 3. छगनलाल बेताला राजस्थानी युवा पुरस्कार, नेम प्रकाशन, डेह-2020, 4. दुर्गेश युवा पुरस्कार, प्रयास संस्थान, चूरू-2020, 5. नवसृजन सम्मान, जागृति संस्थान, जोधपुर-2020, 6. एच.एच. महाराजा गजसिंह जी के करकमलों से सिरोपाव सम्मान-2020
पुस्तक परिचय
इतिहास व साहित्य का सुभग सुमेल : 'सरहद के शहीद' महारावल हरिराज साहित्य पुरस्कार से पुरस्कृत द्वय लेखक श्री रतनसिंह बडोड़ागांव व श्री महेन्द्रसिंह छायण के अधक परिश्रम, शोध-खोज व पुनीत भावना का प्रमाण है- 'सरहद के शहीद' । यह कृति जैसलमेर के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है। विद्वान लेखकों ने शहीदों की शहादत को इसके माध्यम से अक्षुण्ण रखने का स्तुत्य सत्कर्म किया है। काल की खेह में धुंधलाते गौरवमय पृष्ठ इस कृति का हिस्सा बनकर सदैव के लिए संरक्षित हो गये हैं, जिनसे समाज प्रेरणा लेगा। डॉ वल्लमंडल या माड-प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध लोक-विश्रुत जैसलमेर की धरित्री अपने आंचल में इतिहास, कला व संस्कृति को सम्पोषित करती रही है। यहां के लोग सदियों से प्राकृतिक व मानवीय आतताइयों के आक्रमणों से जूझते रहे हैं। जैसलमेर भारत का प्रवेश द्वार रहा है। पश्चिम से आने वाले आक्रांताओं को सबसे पहले यहां के भाटी शासकों की तलवारों से टकराना पड़ता था। यहां के योद्धाओं ने सदैव भारत के द्वारपाल की तरह देश की रक्षा की। इसीलिए यहां के भाटी शासकों को 'भड़किंवाड़ भाटी' की उपाधि से नवाजा गया। तमाम आक्रमणकारी महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, अलाउद्दीन खिलजी आदि सभी ने यहां के वीरों की तलवारों के वार झेले थे। आजादी के बाद भी सीमावर्ती जैसलमेर देश का पश्चिमी द्वार ही है। जिसने सन् 1947, सन् 1965 और सन् 1971 में दुश्मन के दांत खट्टे किए थे। युद्ध सिर्फ सेना नहीं लड़ती, स्थानीय लोग भी सेना के साथ होते हैं। परमाणु की आंच और देश के सबसे बड़े फील्ड फायरिंग रेंज से उठते बारूदी धुएं को यहां का कण-कण आज भी अंवेरल है।
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