श्री नवीन चड्डा जी द्वारा रचित "सत चित आनंद" एक अत्यंत प्रभावशाली साहित्यक उपलब्धि है। अपनी हृदयस्पर्शी हिंदी कविताओं के माध्यम से उन्होंने सत्य, चित, आनंद की शाश्वत त्रिवेणी को अपनी इस पुस्तक में कुशलता-पूर्वक समेटते हुए प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत काव्य-संकलन केवल एक पुस्तक ही नहीं बल्कि एक रूहानी यात्रा है जो ज्ञान और विवेक को स्वयं में गहरे-से संजोए हुए है। समकालीन हिंदी-साहित्य को अपनी इस प्रकाशमयी कृति से समृद्ध करने के लिए नवीन जी मेरी ओर से हार्दिक बधाई के पात्र हैं।
लेखक एवं रचना का संक्षिप्त परिचय : प्रिय पाठकगण, लिखना भी एक अत्यन्त आनन्दमयी उन्माद है, एक ऐसा उन्माद जिससे सदा लाभ ही लाभ होता है, हानि कोई भी नहीं। जब कवि के अपने मन के उद्गार अपनी ही सोच में ढलकर स्वयं के शब्दों का सौंदर्य-परिधान पहने हुए संकलित होकर पुस्तक के रूप में सामने आ खड़े होते हैं तो उसका हर्ष व्यक्त करना अवर्णननीय है। ऐसे में अपनी ही लिखित सामग्री अमर होती हुई सी प्रतीत होती है। इस पुस्तक से पूर्व मेरे तीन काव्य-संग्रह (दो हिन्दी भाषा में और एक अंग्रेज़ी भाषा मे) प्रकाशित हो चुके हैं। मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक से लेकर वर्तमान पुस्तक तक सारे संकलन अनुराधा प्रकाशन द्वारा ही छापे गए हैं जिनके सर्वेसर्वा श्री मनमोहन शर्मा 'शरण' जी हैं और यह उल्लेख करते समय मुझे प्रसन्नता का आभास होता है कि श्री मनमोहन जी अब मेरे मित्रवत् ही हैं, जिन्हें मैंने अपने प्रकाशनात्मक प्रशासन से जुड़े हुए हर कार्य को सदा दक्षता से करते हुए पाया है। अपने इस काव्य-संकलन 'सत् चित् आनन्द' में मैंने जिस-जिस विषय-वस्तु को लेकर कविताओं की रचना की है, उसका संक्षिप्त वर्णन मैंने अपने पाठकों-हेतु इस पुस्तक के प्रारंभ में अपने लिखे आत्म-कथ्य में कर दिया है। अपनी वर्तमान पुस्तक का उपरोक्त शीर्षक रखने का आधार भी इस दृश्य एवं अदृश्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उपस्थिति एवं आभास होना ही है, जिसके अनन्त रहस्य मानव-पहुँच के बिल्कुल बाहर हैं और इस लौकिक व अलौकिक विस्तार के बारे में कवित्व-भाव रखना व लिखना मेरे लिए एक अत्यन्त रोमांचक यात्रा जैसा रहा है। आप सबसे शेष चर्चा व संवाद अन्यत्र एवं आगामी पुस्तक में।
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