में हमारे प्राचीन ग्रंथों में लिखे कई प्रसंग काल्पनिक और अतार्किक प्रथम दृष्टि में। प्र प्रतीत होते होते हैं। किंतु हमारे सत्यवादी। त्यवादी पूर्वज, जो सत्य को किसी भी अन्य वस्तु से अधिक महत्व देते थे, जो सदा सब कुछ केवल विज्ञान और बुद्धि पर आधारित करते थे; उनके संदर्भ में असत्य वाचन की कल्पना करना भी धृष्टता होगी।
मुंडकोपनिषद के इस विख्यात श्लोक में कहा गया है -
"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमंति ऋषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्।।"
अर्थात "सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के पथ पर ही देवता चला करते हैं। उसी मार्ग से ऋषियों ने बिना कामना किए सत्य के परम धाम को प्राप्त किया है।"
'चमत्कार' का होना या यहाँ तक कि इसके अस्तित्व को हमारे किसी भी धर्मग्रंथ से कोई समर्थन नहीं मिलता है। केवल वे जन जिनकी तर्कबुद्धि अविकसित है, चमत्कार की अवधारणा पर विश्वास करते हैं, जब वे वास्तविक विज्ञान या घटनाओं की श्रृंखला को नहीं समझ पाते, जो उनकी आंखों के सामने असंभव प्रतीत होने वाली प्रक्रिया का मूल होती हैं। इस प्रकार तार्किक बुद्धि की इस न्यूनता का लाभ उठाने के लिए, और जन साधारण को और अधिक मूर्ख बनाने के लिए, स्वार्थी प्रवृत्ति वाले लोग उन्हें 'चमत्कार' नामक दलदल में धकेल देते हैं।
भागवत पुराण (स्कंध १०, अध्याय ७७) के निम्नलिखित श्लोक में स्पष्ट कहा गया है- एवं वदन्ति राजर्षे ऋषयः केचनान्विताः ।
यत् स्ववाचो विरुध्येत नूनं ते न स्मरन्त्युत ।।
बुद्धिमान लोग कहते हैं कि जो भी बात (बात, पुस्तक, सिद्धांत, घटना) तर्क के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती उसे निश्चित रूप से (असत्य मानकर) त्याग देना चाहिए।"
दूसरी ओर अब्राह्मिक पंथों में 'चमत्कार' का बड़ा महत्व माना गया है, यहाँ तक कि किसी को संत की उपाधि देने से पहले वे इस बात की जाँच करते हैं कि उस व्यक्ति के द्वारा कोई 'चमत्कार' किया गया या नहीं। इन्हीं 'चमत्कारों' के आधार पर वे अपनी साख बढ़ाते हैं, सनातन पंथियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, और उनका धर्मपरिवर्तन करवाया करते हैं। यह भी एक कारण है कि उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए बहुत से सनातनी संत भी 'चमत्कारों' का अवलंबन लेने लगे हैं। किसका 'चमत्कार' अधिक प्रभावशाली है, इसकी मानो होड़ लगी है।
कारण कुछ भी हो किन्तु सत्य तो यही है कि इन 'चमत्कारों' के सहारे हम अपने धर्म को विकृत करते हैं, और अंत में इनसे जो हानि होती है वह लाभ से कहीं अधिक है। उत्तम होगा कि सत्य का प्रचार हो और जनसाधारण को यह समझाया जाए कि 'चमत्कार' दर्शाने वाले झूठे हैं, उनके झूठ का भंडाफोड़ किया जाए।
जो लोग योगेश्वर श्रीकृष्ण के पदचिन्हों पर चलते हैं, वे 'चमत्कार' की अवधारणा को ही मिथ्या मानते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जिन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर इस सृष्टि का आधार है, उनका उल्लंघन स्वयं रचयिता के लिए भी संभव नहीं। अतः वे सभी प्रसंग और कथाएँ जो विज्ञान का खंडन करती हैं वास्तविक हो ही नहीं सकती।
वृंदावन में श्रीकृष्ण के बालपन में ही जब गोपों ने इंद्र-यज्ञ का आयोजन किया तो उन्होंने प्रश्न पूछे और उनकी अवधारणा का खंडन किया। श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में 'गोवर्धन-पूजन' की प्रथा का प्रादुर्भाव हुआ, जिसके अन्तर्गत गोवर्धन पर वृक्षारोपण, स्वच्छता आदि के अभियान किए गए और उसके उपरांत स्थानीय जन-नायकों को सम्मान देकर सामूहिक भोज हुआ।
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