नवल किशोर दुबे कवि हैं इसलिए एक कवि द्वारा दूसरे कवि को समझने और समझाने का उपक्रम स्वाभाविक रूप से सर्जनात्मक बन जाता हैं, और यहाँ इस पुस्तक में बन भी गया है। प्रो. सुदेश बत्रा स्वयं कवयित्री हैं इसलिए उनके सानिध्य में सम्पन्न यह समीक्षायन एक महत्त्वपूर्ण आलोचना कर्म बन पड़ा है। शमशेर को पढ़ना समझना और फिर उसकी समीक्षा करना सचमुच जटिल है। इतना जटिल है कि कविता को केवल पढ़ा-समझा जाना चाहिए, उसकी आलोचना करना नितांत गैर-जरूरी है, कविता के साथ ज्यादती करना है। लेकिन डॉ. नवलकिशोर दुबे के हाथों यह ज्यादती नहीं हुई है बल्कि शमशेर को सामान्य पाठक के लिए सुलभ किया गया है। शमशेर छायावाद के रूमानीपन प्रगतिवाद के मार्क्सवादी तेवर और नई कविता एवं समकालीन कविता के वैयक्तिक तथा सामाजिक यथार्थ के त्रिकोण बिन्दु पर खड़े हैं इसलिए उनके सोच और शिल्प को किसी विचारधारा और शैली में समेटने का प्रयास करना बेमानी है। उनमें निराला की विविधता और मुक्तिबोध की बिम्बधर्मिता है और डॉ. नवल ने उसे अलग-अलग अध्यायों में उसे जिस विस्तार और आधारभूतता के साथ अंकित किया है वह सार्थक है। शमशेर का मार्क्सवादी सोच अपने कथ्य और शिल्प दोनों में गुथा हुआ है लेकिन अपनी बिम्बधर्मिता में इतना विशिष्ट है, उभरा हुआ है कि शमशेर कवियों के कवि जाने जाते हैं। अनुभूति और अभिव्यक्ति की ऐसी सूक्ष्मता मुक्तिबोध के बाद शमशेर में दिखाई देती है। शमशेर की रूमानियत गहरी है और लगातार हैं इसलिए वह डॉ. रामविलास शर्मा को भी व्यथित करती है, अनेक अन्य मार्क्सवादी आलोचक भी भौंचक रहते है किंतु कवि की अंतश्चेतना कहीं भी पूर्व निर्धारितवादों से निर्मित नहीं होती, वह अपने जीवानानुभवों की संश्लिष्टता से बनती है, विचारधारा की एक रेखकोयता नहीं होती उसमें, उसमें विचार-संवेदन के इंद्र का तनाव होता है, शमशेर अपने इस तनाव की सपाट नहीं होने देते, क्रोचे के अंदाज में कहें तो वे अपनी अंतश्चेतना को स्वतःस्फूर्त ही बने देते रहना चाहते हैं, उसको विचार की सायासता नहीं देते, इसलिए विचारों की स्पष्टता और भाषा की सपाटता की दृष्टि से शमशेर आसानी से समझ में भी नहीं आात और घेरे भी, नहीं जा पाते। शमशेर की संश्लिष्ट बिंबधर्मिता ही उनका काव्यत्व है, हमें शमशेर को समझने के लिए अपना अंदाज बदलना होगा और डॉ. नवल ने ऐसा किया है, इसलिए उनके आलोचना कर्म का यह प्रयास सराहनीय है और पढ़ने योग्य है। आशा है हिंदी आलोचना के पाठक शमशेर पर लिखी गई इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक को पढ़कर शमशेर के बारे में अपनी समझ को और आगे बढ़ाएँगे तथा हिंदी आलोचना को भी और गति देंगे हिंदी आलोचना में इस प्रकार के गंभीर प्रयास जारी रहने चाहिए
कवि और कविता। कवि सूजक है, सृष्टा है। वह ब्रह्म के सदृश्य है। ब्रहा की रची सृष्टि पर जो रचना करे। वह कवि न काल से डरता है न पिछड़ता है। वह तो स्वयं को काल से भी ऊपर मानता है। और उसमें अपराजित रह वास करता है। जो वह है, वह शमशेर है। और उससे रचा है कवियों के कवि का संसार। शमशेरियत से रचा बसा संसार। कवि कर्म में शमशेर शिखर पर खड़े हैं। सघन अनुभूतियाँ, गहन संवेदना, निजी गोपनीयता से पल्लवित सामाजिकता लिए शमशेर कविता के किसी वाद से बँधे नहीं हैं। शमशेर की रूमानियत गहरा नीलापन लिए है जो अपनी पूरी रागात्मकता व लयात्मकता के साथ इस तरह व्याप्त है, बुनी हुई है कि आधुनिक साहित्य की वास्तविकता को पूर्ण सच्चाई से अभिव्यक्त करती है। शमशेर जी का जीवन जिन अभावों, चिन्ताओं संघर्षों और निराशाओं से होकर गुजरा है उनकी झलक उनकी रचनाओं 'बात बोलेगी,' 'काल तुझसे होड है मेरी' 'चुका भी हूँ मैं नहीं,' 'टूटी हुई बिखरी हुई' व 'बैल' में दिखाई पडती है। यही कारण है कि वे समानता के दर्शन पर आधारित समाज का स्वप्न बुनते है। शमशेर भाषा व शिल्प की दृष्टि से पूरी तरह प्रयोगबादी नजर आते हैं। उनकी कविता में छायावादी प्रभाव तो है ही प्रयोग की दृष्टि से नवीनता व ताजगी से भरी छंदमुक्त, किन्तु लय से समृद्ध भाषा उनके काव्य में सर्वत्र दिखाई देती है। एक चीज जो आधुनिक कला और कविता का भी अक्सर खास अंग बन जाती है, वह है, वह प्रेरणा का चित्र की ज़मीन से पैदा होना, उभरना... लगभग चित्र की जमीन पर ही रहना। कभी कभी मूर्ति की जमीन से उभरना मूर्ति का रहना। कभी-कभी संगीत का पक्ष कविता मात्र का स्थान इस तरह लेता है कि कविता को संगीत की जमीन से परखने पर ही अर्थ खुल सकेंगे। पानी काम के अर्थ।"
डॉ. नवल किशोर दुबे जन्म 4 फरवरी 1967 नगर (भरतपुर) राज. शिक्षा- अधिस्नातक (हिन्दी), शिक्षा स्नातक, अधिस्नातक, शिक्षा (अध्ययनरत कोटा खुला विश्वविद्यालय) विद्यावारिधि (पी.एच.डी.) हिन्दी: राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर प्रेरणा स्त्रोत माता-पिता गुरुजन, श्री शिखर चंद पुगालिया, अध्यक्ष, एस.जे.वी. शिक्षा समिति जयपुर एवं श्री पूरन शर्मा ओजस्वी गीतकार (भरतपुर) श्रीरामस्वरूप जी एवं श्री दामोदरप्रसाद जी। प्रकाशन-लोक जुम्बिश परियोजना के लिए शैक्षिक प्रशैक्षिक सामग्री 'अपनी भाषा' भाग 1-8 तक हिन्दी पाठ्य पुस्तक का लेखन। समन्वय के प्रतीक तुलसीदास, बच्चे के भाषा सीखने की प्रक्रिया, शिक्षा : भारतीय समाज के संदर्भ में, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम निर्देशिका विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में शोध पत्रों, आलेखों एवं कविताओं का प्रकाशन। शिक्षाकर्मी एवं लोकजुम्बिश परियोजनाओं के लिए सेवारत व असेवारत शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों, के क्रियान्वयन एवं पाठ्यक्रम विकास प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी, विभिन्न राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलनों संगोष्ठियों, कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी। विभिन्न मंचों पर काव्यपाठ एवं संचालन पूर्व प्रवक्ता (हिन्दी) संधान : (शिक्षा एवं विकास अध्ययन संगठन), जयपुर। सम्मान- हिन्दी शिक्षक भूषण एवं हिन्दी शिक्षक रत्न 2006, संबोधन, दिल्ली द्वारा। शोध अध्ययन अजमेर शहर को कच्ची बस्तियों में शैक्षिक स्थितियों पर जनशाला कार्यक्रम हेतु शोध अध्ययन। सम्प्रति- प्रवक्ता हिन्दी, एस.जे. पब्लिक स्कूल, जयपुर (राज.)।
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