प्रस्तावना
शिरडी साईं बाबा (अबसे आगे इनका उल्लेख 'शिरडी साईं', 'साईं बाबा' या केवल 'बाबा' कहकर किया जाएगा) के भारत एवं विदेशों में असंख्य भक्त हैं। सन् 1918 में उनकी महासमाधि के पश्चात् सौ वर्षों के भीतर ही जिस रूप में उनकी आध्यात्मिक विचारधारा और उनके कार्यों का प्रचार-प्रसार हुआ, वह अभूतपूर्व है। यदि इस विषय का सम्यक अध्ययन किया जाए, तो यह उजागर होगा कि भक्तगण श्री साईं बाबा के प्रति किसी संगठनात्मक प्रचार के कारण आकर्षित नहीं हुए, बल्कि इसकी अपेक्षा वे बाबा के महान व्यक्तित्व एवं प्रबल आध्यात्मिक आकर्षणवश सहज रूप से उनके प्रति खिंचते चले गए। बाबा ने अपनी दयालुता, दिव्य शक्तियों, सरलता एवं सहज-सुलभता के कारण लोगों को आकर्षित किया।
भारत के महाराष्ट्र राज्य स्थित एक मामूली से गाँव शिरडी में आविर्भाव के पश्चात् उन्हें गाँव के बाहर घनी झाड़ियों में एक एकांतिक आध्यात्मिक साधक के रूप में ध्यान-मग्न देखा गया। कारण रूप में उस एक दिव्य व्यक्तित्व के प्रभाव का प्रसार हुआ है, जो कि आज लाखों भक्तों के रूप मे बदल गया है। वह स्थान जहाँ उन्होंने महासमाधि ली थी, आज समाधि-मंदिर के नाम से जाना जाता है और वहाँ प्रतिदिन औसतन 30,000 भक्त दर्शन हेतु जाते हैं। त्योहार के दिनों में यह संख्या कई लाख तक बढ़ जाती है। व्यापक रूप से जाने-माने अनेक व्यक्तित्व, जैसे कि भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री भी भारत के इन महान संत के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने बाबा की समाधि पर गए हैं।
यह पुस्तक शिरडी साईं के जीवन से संबन्धित तथ्यों का ब्यौरा यथासंभव व्यवस्थित और कालक्रम बद्ध रूप से प्रस्तुत करती है। बाबा से संबन्धित अनेक विषयों पर प्रकाश डालने के लिए इसमें, अब तक अज्ञात, कुछ प्राथमिक स्रोतों एवं दस्तावेज़ों का भी उपयोग किया गया है।
लेखक द्वारा इन दस्तावेज़ों को विभिन्न स्रोतों से गत तीन दशकों से भी अधिक समय में एकत्रित किया गया और बाबा से संबन्धित भिन्न-भिन्न जानकारियों का परस्पर मिलान करके उनकी प्रस्तुति की गई। लेखक ने शास्त्रीय साहित्यिक शैली अथवा पूर्व या पश्चिम की अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा-शैली के प्रयोग से बचने का ध्यान रखा है। इसके विपरीत यह पुस्तक शिरडी साईं के ईश्वरीय व्यक्तित्व, महान कार्यों और उनकी दार्शनिक विचारधारा को भक्तों, पाठकों एवं अन्य शोधकर्ताओं द्वारा आसानी से समझने के लिए सरल भाषा में लिखी गई है।
शिरडी साईं बाबा पर प्रायः सभी भारतीय भाषाओं और कुछ विदेशी भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें लिखी गई हैं। उन पर प्रथम पुस्तक, श्री साईं सत् चरित गोविंद रघुनाथ दाभोलकर द्वारा मराठी में लिखित है, जो कि 'श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट' शिरडी द्वारा 1929 में प्रकाशित की गई थी। उसके पश्चात् से विभिन्न भाषाओं में इसकी लाखों प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। श्री साईं सत् चरित का उपयोग मुख्य संदर्भ-ग्रंथ के रूप में किया जाता रहा है। हालाँकि अन्य पुस्तकें / पत्रिकाएँ आदि, जैसे कि दासगणु महाराज की भक्त लीलामृत एवं संत कथामृत और पत्रिकाएँ, जैसे कि श्री साईं लीला और श्री साईंनाथप्रभा भी उपयुक्त स्रोत हैं।
शिरडी साईं बाबा का अपने भक्तों को बद्धमूल मतों, कट्टरता एवं पक्षपात के पूर्वाग्रहों से बाहर निकालने का अनोखा तरीक़ा था। भक्तों से हँसी-मज़ाक करते हुए भी बाबा उन्हें आश्वासन, सुरक्षा और सांत्वना प्रदान करते थे। जो भी कोई उनसे मिलता था, उस पर शिरडी साईं के स्पर्श, पैनी दृष्टि और वचनों का तत्काल और अलौकिक प्रभाव पड़ता था।
यह पुस्तक एक तर्क-सम्मत एवं स्वीकार करने योग्य विचार-प्रवाह को प्रस्तुत करके भक्तों के धारणागत अंतराल को भरने का प्रयत्न करती है। जूलियस सीज़र के विषय में कहा गया है, 'वह आया, उसने देखा, उसने विजय प्राप्त कर ली। उसी प्रकार शिरडी साईं बाबा के विषय में कहा जा सकता है कि, 'वे शिरडी में प्रकट हुए, उन्होंने लोगों की सेवा की, उन्होंने उन लोगों के हृदय को जीत लिया।
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