शान्तं पद्मासनस्थं शशिमुकुटधरं मुण्डमालं त्रिनेत्रं शूलं खड्गं च वज्रं परशमुसलके दक्षिणाङ्गे वहन्तम् ।
नागं घण्टां कपालं नलिनकरयुतं साङ्ङ्कुशं पाशमन्ये नानालङ्कारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं नौमि बालं शिवाख्यम् ।।
प्रिय पाठकवृन्द,
सर्वप्रथम श्रीवटुकनाथ के चरणकमल की वन्दना करता हूं जिनके कृपा कटाक्ष से इस ग्रन्थ का प्रणयन सम्भव हुआ। तदनन्तर भगवती कालसंकर्षिणी के चरणकमलों की वन्दना करता हूं जिनके अनुग्रह से इस ग्रन्थ का प्रकाशन संभव हो पाया।
अपने श्रीगुरू त्रय श्रीविमलानन्दनाथ, श्रीआनन्दानन्दनाथ एवं श्रीशिवानन्दनाथ की श्रीपादुकाओं का द्वादशान्त में पुनः पुनः स्मरण करता हूं जिनके अनुग्रह एवं आशीर्वाद से इस ग्रन्थ का प्रणयन हो पाया। अर्धत्र्यम्बकमत की आचार्या माता प्रभा देवी की श्रीपादुकाओं का हृदय में विमर्श करता हूं। अपने अपर गुरू श्रीकालीदासानन्दनाथ तथा स्व. पं प्रदीप मेहता जी वेदाचार्य के पादाम्बुजों की वन्दना करता हूं।
मां चामुण्डा-काली के अनन्य उपासक अपने पितामाह श्रीमोहनलाल नागर (बावजी) एवं पितामही श्रीमति शकुन्तला नागर (बई) के चरणकमलों में नमस्कार करता हूं, जिनके द्वारा बाल्यकाल में ही शाक्त संस्कारों का आधान करने से मैं इस साधना मार्ग का आलम्बन कर पाया। शाक्तमार्ग का बोध करवाने वाले शिवस्वरूप पिता श्री दिलीप नागर एवं शक्ति स्वरूपा माता श्रीमति ज्योति नागर के पदकमलों में कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं। सहधर्मिणी श्रीमती शिवानी नागर के प्रति भी कृतज्ञ हूं जिनके द्वारा इस कार्य में अपार सहयोग प्रदान किया गया।
अपने गुरूभाई श्रीसुन्दरवेलन् (श्रीदुर्वासानन्दनाथ) द्वारा प्रदान किये गये सहयोग के लिए कृतज्ञ हूं। अग्रज एवं मित्र श्रीशिवम तेलंग शास्त्री के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिनके द्वारा कई मूल्यवान सुझाव प्रदान किये गये। अनुज एवं मित्र पं. अनुराग गौड़ तथा पं. रचित गौड़ की सहायता के लिए आभारी हूं। अपने अनुजद्वय चि. रजत नागर एवं चि. आराध्य नागर को इस कार्य में सहायता के लिए विशेष धन्यवाद देता हूं। मां भगवती उभय भ्राताओं पर अपना अनुग्रह करें एवं वे उत्तरोत्तर वृद्धि करें।
कालीक्रम प्रचारिणी सभा के समस्त सदस्यों के प्रति आभारी हूं जो कि उज्जयिनी महापीठ एवं अन्य स्थलों पर क्रमनय की पुनः प्रतिष्ठा के लिए दिन-रात कार्यरत हैं।
श्रीप्रमोद शर्मा जी के निर्देशन में इस ग्रन्थ के टंकण एवं मुद्रण करने वाली टीम को हृदय से धन्यवाद देता हूं। आप लोगों के सहयोग के बिना यह प्रकाशन कार्य असम्भव था।
सुधीजनों के करकमलों में यह 'श्रीवटुकरहस्यचिन्तामणिः समर्पित है। ग्रन्थ को प्रकाशित करवाने में सहयोग प्रदान करने वाले उल्लिखितानुलिखित समस्त जनों के प्रति हृदय से साधुवाद ज्ञापित करता हूं। इस ग्रन्थ के प्रकाशन से सारस्वत-विद्वत् समाज तथा साधक समाज का उत्कर्ष हो इसी कामना के साथ श्रीवटुकार्पणमस्तु ।
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